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बस्तर में उठी “घर वापसी” की लहर

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-ईसाई धर्म छोड़कर हुए मूल धर्म में वापस आए आदिवासी परिवार =
-रंग ला रही है जागरूक आदिवासी जनप्रतिनिधियों की मेहनत अब =

-अर्जुन झा-
जगदलपुर कन्वर्जन के कंटक से जख्मी आदिवासी समाज के जागरूक जनप्रतिनिधियों और मुखियाओं की मेहनत रंग लाती दिख रही है। कन्वर्टेड हो चुके आदिवासी परिवार अब अपने मूल धर्म में लौटने लगे हैं। ग्राम बोटेचांग से उठी घर वापसी की लहर अब आसपास के अन्य गांवों तक पहुंच रही है। आदिवासी समाज के मुखिया इसके लिए प्रणप्राण से काम कर रहे हैं। ग्राम बोटेचांग में तीन भाइयों के परिवारों की घर वापसी से इस मिशन का श्रीगगणेश हुआ है।
बस्तर के आदिवासी एक ओर जहां नक्सलियों के हाथों मारे जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कन्वर्जन उनकी सांस्कृतिक आत्मा पर प्रहार कर रहा है। बड़े पैमाने पर हो चुके और बदस्तूर हो रहे आदिवासियों के कन्वर्जन ने बस्तर की समृद्ध आदिम संस्कृति और परंपराओं के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है। संभाग में हजारों लाखों आदिवासी कन्वर्ट किए जा चुके हैं। साम, दाम, छल प्रपंच का सहारा लेकर भोले भाले आदिवासियों का मतांतरण बेहद ही चिंतनीय विषय बन चुका है, बावजूद आदिवासियों के नाम पर अपनी राजनीति चमकाने वाले दोनों प्रमुख दलों के नेताओं को इसकी जरा भी चिंता नहीं है, जबकि दोनों दलों के बड़े शासन और संगठनात्मक पदों पर आसीन हैं।

ऐसे विषम हालात में जागरूक स्थानीय स्तर के आदिवासी नेताओं और मुखियाओं ने अपने समाज को संक्रमण से बचाने का बीड़ा उठा लिया है। ये लोग न सिर्फ खुलकर कन्वर्जन का विरोध कर रहे हैं, बल्कि कन्वर्जन कराने वालों को अपने गांवों में घुसने भी नहीं दे रहे हैं। अब ये जागरूक लोग कन्वर्ट हो चुके अपनी जाति बिरादरी के लोगों को अपनी प्राचीन संस्कृति और परंपराओं का हवाला देकर उन्हें समझाने बुझाने का कार्य भी कर रहे हैं। जागरूक आदिवासी जनप्रतिनिधियों और मुखियाओं की यह पहल सकारात्मक असर भी दिखाने लगी है। बस्तर संभाग के कांकेर जिला अंतर्गत भानुप्रतापपुर डिवीजन के ग्राम बोटेचांग में आदिवासी समाज के एक ही परिवार के तीन भाई ने अपने परिवार सहित हुए अपने मूल धर्म में वापस हो गए हैं।

कुछ साल पहले पास्टर के बहकावे में आकर उनके माता पिता ईसाई धर्म अपना चुके थे, लेकिन अब पता चला कि घर, गांव, समाज और अपने संस्कृति से बढ़कर कुछ नही है। यह कहते हुए इन लोगों ने अपने मूल धर्म में वापसी कर ली है। उन्होंने ग्रामीणों की भरी सभा में कहा कि हमें उस समय रोकने वाला कोई नही था न ही कोई समझाने वाला। इसलिए दूसरे के बहकावे में आ गए थे और प्रार्थना सभा में जाने लगे थे। जहां अपने कुलदेवी देवता, गांव की शीतला माता व अन्य पूजा पद्धति को नही मानने और केवल उनके प्रभु पर विश्वास करने कहा गया, जिसके कारण गांव में हमेशा विवाद की स्थिति बनी रहती थी। जनप्रतिनिधियों, समाज प्रमुखों व ग्रामवासियों के प्रयास से उनकी घर वापसी हुई है। उन्हे गांव- समाज की परंपरा के अनुसार विधि-विधान पूर्वक ग्राम गायता, पटेल, मांझी मुखिया द्वारा गांव की व्यवस्था में पुनः शामिल कर लिया गया।

इस दौरान मुख्य रूप से जिला पंचायत सदस्य देवेंद्र टेकाम, सर्व आदिवासी समाज के जिला उपाध्यक्ष ज्ञानसिंह गौर, परगना मांझी लखूराम दर्रो, ग्राम गायता सुकलाल दर्रो, पटेल बिरसू दर्रो, गोंडवाना समाज के क्षेत्रीय अध्यक्ष हरून सिंह दर्रो, सरपंच सोनू दर्रो, परवी सरपंच राजेंद्र ध्रुव, रामलाल कोमरा, लालजी कोमरा, जागेश्वर टेकाम, राजेंद्र कोमरा सहित बड़ी संख्या में ग्रामवासी , समाज प्रमुख और क्षेत्रवासी उपस्थित थे।
युवाओं की घर वापसी, ग्रामसभा ने धर्मांतरण गतिविधियों पर लगाई रोक
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अब छेड़ेंगे बड़ा आंदोलन
भानुप्रतापपुर विकासखंड के ग्राम बोटेचांग में ग्रामसभा की बैठक आयोजित की गई, जिसमें ग्रामीणों ने धर्मांतरण के विरुद्ध आंदोलन छेड़ने का निर्णय लिया। इसी बीच गांव के तीन युवाओं ने सार्वजनिक रूप से ईसाई धर्म छोड़कर अपने मूल धर्म में लौटने का ऐलान किया।ग्राम बोटेचांग निवासी नरेश कुमार मंडावी, नरेंद्र कुमार मंडावी और मायाराम मंडावी ने अपने परिवार सहित घर वापसी की। ग्रामीणों ने उनका पारंपरिक रूप से स्वागत करते हुए पगड़ी पहनाई और जिला पंचायत सदस्य देवेंद्र टेकाम ने उनके पैर धोकर सम्मान किया। इस अवसर पर युवाओं ने घोषणा की कि वे अब अपने कुल देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करेंगे और अपनी पारंपरिक आस्था से जुड़े रहेंगे।

अब जाकर हुआ भूल का अहसास
घर वापसी करने वाले नरेंद्र कुमार मंडावी ने कहा कि वर्ष 2020-21 में पिता की बीमारी के इलाज के नाम पर उन पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया गया था। उनसे कहा गया था कि वे कुल देवी-देवताओं की पूजा न करें और प्रसाद या पूजा करने वाले परिवार का भोजन न ग्रहण करें। लेकिन समय के साथ उन्हें अहसास हुआ कि अपनी परंपरा और संस्कृति से जुड़कर ही वे सही मार्ग पर रह सकते हैं। नरेंद्र मंडावी ने कहा- अपने धर्म में वापसी कर हमें गर्व हो रहा है और हम चाहते हैं कि बाकी लोग भी अपने मूल धर्म में लौट आएं।

ग्रामसभा में बड़ा फैसला
ग्रामसभा ने पेसा अधिनियम 1996 और संविधान की पांचवीं अनुसूची का हवाला देते हुए धर्मांतरण गतिविधियों पर सख्त रोक लगाने का प्रस्ताव पारित किया। गांव में सूचना बोर्ड लगाया गया है, जिस पर साफ लिखा है– “पास्टर का धर्मांतरण क्रियाकलाप वर्जित है।” ग्रामसभा ने स्पष्ट किया कि बाहरी पादरी या पास्टर द्वारा किसी भी प्रकार के धार्मिक आयोजन अथवा धर्मांतरण की गतिविधि अब गांव में पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगी।

एकजुट होकर करेंगे धर्म रक्षा
इस अवसर पर जिला पंचायत सदस्य देवेंद्र टेकाम, सर्व आदिवासी समाज जिला उपाध्यक्ष ज्ञान सिंह गौर, सर्व आदिवासी युवा प्रभाग के राजेश गोटा, ग्राम गायता, अशोक उसेंडी, अर्जुन कोमरा राजेंद्र ध्रुव एवं बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद थे।गांव वालों ने तीनों युवाओं की घर वापसी का स्वागत करते हुए इसे अपनी संस्कृति और आस्था की जीत बताया। उनका कहना है कि धर्मांतरण से आदिवासी समाज की परंपरा और देवी-देवताओं की पूजा पद्धति पर खतरा मंडरा रहा था, लेकिन अब गांव एकजुट होकर अपनी संस्कृति की रक्षा करेगा।

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