हिंदू पंचांग के अनुसार, काल भैरव अष्टमी मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। यह दिन भगवान शिव के रौद्र रूप “काल भैरव” की प्रकट तिथि मानी जाती है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने ब्रह्मा जी के अहंकार को शांत करने के लिए काल भैरव रूप धारण किया था। इस दिन भैरवनाथ की पूजा करने से सभी बाधाएं दूर होती हैं और जीवन में सुख, सुरक्षा और शांति का वास होता है।
काल भैरव को “नगर पालिका” भी कहा जाता है, यानी किसी भी क्षेत्र की सुरक्षा का दायित्व उन्हीं पर होता है। भक्त मानते हैं कि भैरव बाबा की कृपा से नकारात्मक शक्तियों और भय का अंत होता है। विशेषकर तंत्र साधना और अदृश्य शक्तियों से रक्षा के लिए इस दिन का बड़ा महत्व है।
पूजन विधि:
इस दिन भक्त प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं। फिर भैरव बाबा को तेल, मदिरा, नारियल, उड़द, काले वस्त्र और सरसों के तेल का दीपक अर्पित करते हैं। रात्रि में जागरण और भैरव चालीसा, स्तोत्र का पाठ करना भी शुभ माना जाता है।
काल भैरव के आठ रूप:
काल भैरव, अष्ठ भैरवों में प्रमुख हैं, इनके अलावा असितांग, चण्ड, कपाल, भीषण, संहार, रूरू, और उन्मत्त भैरव भी पूजे जाते हैं।
मान्यता:
मान्यता है कि काल भैरव की आराधना से अकाल मृत्यु टलती है, कोर्ट-कचहरी के मामले सुलझते हैं, और बुरी नजर से बचाव होता है।









