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तकनीकी खामियों के चलते बस्तर के आदिवासी और मजदूर राशन से वंचित: पूरन सिंह कश्यप

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बस्तर सम्वाददाता – अर्जुन झा 

= केवायसी बनी मुसीबत का सबब, पात्र लोगों को नहीं मिल पा रहा है अनाज=
= केवायसी, ओटीपी के जाल में उलझे बस्तरवासी =
बकावंड। जनपद पंचायत बस्तर अंतर्गत ग्राम पंचायत बड़े चकवा के उप सरपंच पूरन सिंह कश्यप ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए लागू की गई केवाईसी (नो योर कस्टमर) प्रक्रिया पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा है कि शासन की यह व्यवस्था कागजों में भले ही पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से लाई गई हो, लेकिन जमीनी स्तर पर यह गरीब, किसान, आदिवासी और श्रमिक वर्ग के लिए एक बड़ी समस्या बन चुकी है।
उप सरपंच पूरन कश्यप ने कहा है कि तकनीकी खामियों और अशिक्षा के कारण बड़ी संख्या में वास्तविक और पात्र हितग्राही राशन से वंचित हो रहे हैं, जिससे बस्तर अंचल में जनता के बीच गहरा आक्रोश फैल रहा है। वर्तमान व्यवस्था के तहत यदि किसी परिवार में 6–7 सदस्य हैं और उनमें से किसी एक सदस्य की केवाईसी किसी कारणवश पूरी नहीं हो पाती है, तो पूरे परिवार को राशन नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने इसे पूरी तरह अन्यायपूर्ण और अमानवीय करार देते हुए कहा कि एक व्यक्ति की तकनीकी समस्या का दंड पूरे परिवार को देना गरीबों के साथ सरासर अन्याय है। इससे कई परिवारों के सामने भुखमरी जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। बस्तर क्षेत्र की वास्तविक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए पूरन कश्यप ने कहा है कि यहां अधिकांश हितग्राही आदिवासी, छोटे किसान और दिहाड़ी मजदूर हैं। इन परिवारों के पास न तो पर्याप्त तकनीकी साधन हैं और न ही कई लोगों के पास खुद का मोबाइल फोन है। ऐसे में ओटीपी आधारित केवाईसी प्रक्रिया उनके लिए पूरी तरह अव्यवहारिक है। उन्होंने सवाल उठाया कि जिनके पास मोबाइल ही नहीं है, वे ओटीपी कहां से लाएंगे। केवल तकनीकी आधार पर गरीबों को राशन से वंचित करना संवेदनहीनता को दर्शाता है। ग्रामीण इलाकों में बुजुर्गों की फिंगरप्रिंट मशीन में ट्रेस नहीं हो रही है। उम्र अधिक होने, मेहनत-मजदूरी के कारण उंगलियों के निशान घिस जाने और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के चलते बायोमेट्रिक सत्यापन बार-बार असफल हो जाता है। इसके अतिरिक्त, कई हितग्राहियों के आधार कार्ड से जुड़े मोबाइल नंबर पुराने या बंद हो चुके हैं, जिससे ओटीपी प्राप्त नहीं हो पाता और केवाईसी अधूरी रह जाती है। गरीब आदिवासी मजदूरों के लिए बार-बार कार्यालयों और राशन दुकानों के चक्कर काटना भी संभव नहीं है। बस्तर के किसान, आदिवासी और मजदूर पहले से ही आर्थिक तंगी, बेरोजगारी और महंगाई से जूझ रहे हैं। ऐसे में राशन जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित होना उनकी स्थिति को और भी दयनीय बना रहा है। दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे इन परिवारों को केवल तकनीकी कारणों से राशन न देना अमानवीय है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस स्थिति की पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकार की है, क्योंकि नीतियां बनाते समय बस्तर जैसे पिछड़े और आदिवासी बहुल क्षेत्रों की जमीनी हकीकत को नजरअंदाज किया गया है। पूरन कश्यप ने शासन और प्रशासन से मांग की कि जब तक सभी पात्र हितग्राहियों की केवाईसी पूरी नहीं हो जाती, तब तक राशन वितरण किसी भी हालत में बंद न किया जाए। साथ ही बस्तर जैसे क्षेत्रों के लिए विशेष राहत व्यवस्था लागू की जाए और बुजुर्गों, आदिवासियों व तकनीकी रूप से असमर्थ लोगों के लिए मैनुअल सत्यापन या विशेष शिविरों का आयोजन किया जाए, ताकि कोई भी गरीब परिवार भूखा न रहे।

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