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आवाजों का मशीनीकरण: खोता मानवीय स्पर्श और बदलता परिवेश…

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संवाददाता – लक्ष्मी नारायण लहरे
– राजकुमार धर द्विवेदी
समय का पहिया जब घूमता है तो अपने साथ जीवन जीने के सलीके और गलियों के शोर की रंगत भी बदल देता है। एक दौर था, जब सुबह की नींद किसी अलार्म से नहीं, बल्कि मोहल्ले में आने वाले सब्जी वाले की उस खास लयबद्ध पुकार से खुलती थी, जिसमें एक अपनापन और मिठास होती थी। आज वह जीवंत आवाज एक प्लास्टिक के भोंपू (लाउडस्पीकर) से निकलने वाली नीरस रिकॉर्डिंग में तब्दील हो गई है: “पचास रुपए के पांच किलो टमाटर… पचास रुपए के पांच किलो टमाटर।”

स्वर की विशिष्टता और पहचान
पहले हर फेरीवाले की अपनी एक ‘सिग्नेचर ट्यून’ होती थी। रेलवे स्टेशनों पर चाय बेचने वाले की तान, मेलों में खिलौने बेचने वालों का कौतुक जगाता शोर और कबाड़ बीनने वालों की वह भारी आवाज—ये सिर्फ आवाजें नहीं थीं, बल्कि उस व्यक्ति की पहचान थीं। लोग बिना देखे जान जाते थे कि गली में कौन आया है। उस पुकार में उतार-चढ़ाव होता था, ग्राहक को देखकर लहजा बदलता था और उसमें थकावट के बावजूद एक जीवंतता होती थी। सब्जी मंडी में पसीने से तरबतर होने के बावजूद डमरू भाई बराबर बोलता रहता था, “प्याज रुपया किलो, आलू पांच का दो किलो। आओ भैया, आओ बहन, आओ काका। देख क्या रहे हो? झोला भरकर ले जाओ तरकारी।”

सुविधा का पक्ष: रिकॉर्डिंग का बाजार
बदलाव के इस दौर ने सुविधा को प्राथमिकता दी है। आज दुकानदारों और फेरीवालों को अपनी ऊर्जा बचाने का एक जरिया मिल गया है। दिन भर चिल्लाने की थकान अब एक छोटी सी चिप और मशीन ने ले ली है। इसके सकारात्मक पहलू भी हैं; जिन लोगों की आवाज दमदार और स्पष्ट है, उनके लिए ‘वॉयस-ओवर’ और रिकॉर्डिंग के क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर खुले हैं। सार्वजनिक सूचनाओं और सभाओं के लिए भी यह तकनीक सटीक और कम मेहनत वाली साबित हो रही है।

क्या हमने कुछ खो दिया?
सुविधा के इस शोर में जो सबसे बड़ी चीज गुम हुई है, वह है ‘संवाद का आनंद’। मशीनें सूचना तो दे सकती हैं, लेकिन वे उस माहौल में प्राण नहीं फूंक सकतीं जो एक इंसान की आवाज फूंकती थी। रिकॉर्ड की हुई आवाज में न तो उत्साह होता है और न ही वह आग्रह जो किसी को सामान खरीदने के लिए भावनात्मक रूप से आकर्षित करे। वह एक यंत्रवत प्रक्रिया बन गई है जो बार-बार कानों से टकराती है, पर दिल तक नहीं पहुंचती।

वक्त के साथ तालमेल बिठाना जरूरी है, लेकिन मशीनी आवाजों के इस दौर में हम कहीं न कहीं उस ‘मानवीय संगीत’ को याद करते हैं, जो हमारे लोक-जीवन का हिस्सा था। गलियों में गूंजने वाला वह शोर दरअसल समाज के धड़कने की आवाज था। आज सब कुछ रिकॉर्डेड है, सब कुछ नपा-तुला है, लेकिन उस पुराने शोर में जो सुकून और अपनी मिट्टी की गंध थी, वह आज की इन डिजिटल आवाजों में कहीं खो गई है।

राजकुमार धर द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार रायपुर
(लेखक रायपुर स्वदेश रायपुर में सह संपादक हैं )

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