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कुसमी में धूमधाम से मनाया गया खद्दी मूलही पड़हा सरहुल पर्व, निकली भव्य शोभायात्रा

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बलरामपुर संवाददाता युसूफ खान
बलरामपुर जिले के कुसमी विकासखंड में सर्व आदिवासी समाज द्वारा पारंपरिक हर्षोल्लास और उत्साह के साथ खद्दी मूलही पड़हा सरहुल पर्व मनाया गया। इस अवसर पर पूरे क्षेत्र में आदिवासी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता की अनुपम झलक देखने को मिली। कार्यक्रम में हजारों ग्रामीणों की सहभागिता से वातावरण पूरी तरह उत्सवमय रहा।
सरहुल पर्व के अवसर पर धर्म मंडा कुसमी से हाई स्कूल ग्राउंड तक भव्य शोभायात्रा निकाली गई। पारंपरिक वेशभूषा में सजे युवक-युवतियों ने नृत्य-गान प्रस्तुत करते हुए शोभायात्रा को आकर्षक बनाया। ढोल-मांदर और नगाड़ों की थाप पर लोगों ने पारंपरिक नृत्य किया, जिससे पूरे नगर में उत्साह का माहौल बना रहा।
 
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सामरी विधायक उद्देश्वरी पैकरा उपस्थित रहीं, जबकि अति विशिष्ट अतिथि के रूप में पूर्व विधायक प्रीतम राम शामिल हुए। विधायक पैकरा ने अपने संबोधन में कहा कि सरहुल पर्व आदिवासी समाज की पहचान और प्रकृति के प्रति आस्था का प्रतीक है। उन्होंने नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहने का संदेश दिया। इस दौरान मांदर की थाप पर विधायक पैकरा स्वयं भी नृत्य करती नजर आईं, जिससे कार्यक्रम का उत्साह और बढ़ गया।
कार्यक्रम में जनपद अध्यक्ष बसंती भगत, जिला पंचायत अध्यक्ष हीरामणि निकुंज, मंडल अध्यक्ष शशि टोपो, विधायक प्रतिनिधि लक्ष्मण पैकरा, सरपंच संघ अध्यक्ष संतोष इंजीनियर सहित अनेक जनप्रतिनिधि और समाज के प्रमुख लोग उपस्थित रहे। कुसमी विकासखंड के विभिन्न गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने भाग लेकर आयोजन को सफल बनाया।
कार्यक्रम के समापन पर आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने अपने मूल निवासी अधिकार, सुरक्षा तथा वर्ष 2027 की जनगणना में आदिवासी धर्म कॉलम लागू करने की मांग को लेकर एसडीएम कुसमी के माध्यम से राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा। समाज के लोगों ने मांगों पर शीघ्र कार्रवाई की अपेक्षा जताई।
इस आयोजन में मूली बढ़ा उरांव समाज के लक्ष्मी देवान, अध्यक्ष मंगलसाय, कार्यक्रम अध्यक्ष रामचंद्र निकुंज, पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष गोवर्धन भगत, माइक संचालक धीरजन उरांव, बीडीसी देवधन भगत खसरु बुनकर सहित अनेक समाज प्रमुखों और युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
कुसमी में आयोजित इस भव्य सरहुल पर्व ने न केवल आदिवासी संस्कृति को जीवंत किया, बल्कि सामाजिक एकता, परंपराओं के संरक्षण और सामुदायिक सौहार्द का भी सशक्त संदेश दिया।

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