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बलरामपुर में ‘सिक्का बंदी’ से जनता बेहाल — क्या कलेक्टर का आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित?

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युसूफ खान/बलरामपुर। देश भले ही 21वीं सदी के डिजिटल भारत की ओर तेजी से बढ़ रहा हो, लेकिन छत्तीसगढ़ के जिला बलरामपुर में आज भी भारतीय मुद्रा को लेकर अजीब स्थिति देखने को मिल रही है। जिले में एक और दो रुपये के सिक्के मानो अघोषित प्रतिबंध का शिकार हो गए हैं। हालत यह है कि राजधानी रायपुर समेत अन्य शहरों में जो सिक्के सामान्य रूप से चल रहे हैं, उन्हें बलरामपुर के कई दुकानदार लेने से साफ इनकार कर रहे हैं।
हाल ही में जिला कलेक्टर राजेंद्र कटारा ने जनसंपर्क विभाग (PRO) के माध्यम से निर्देश जारी किए थे कि कोई भी दुकानदार भारतीय मुद्रा लेने से इनकार नहीं कर सकता। ऐसा करना कानूनन अपराध की श्रेणी में आता है। बावजूद इसके, जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। कलेक्टर के आदेश की खुलेआम अनदेखी करते हुए कई दुकानदार बेखौफ होकर सिक्के लेने से मना कर रहे हैं, जिससे प्रशासनिक आदेश की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों से बाजार आने वाली जनता को सबसे ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सामान खरीदने पर दुकानदार खुले पैसे न होने का बहाना बनाकर राउंड फिगर में ज्यादा पैसे काट लेते हैं। एक या दो रुपये वापस करने के बजाय ग्राहकों को माचिस का डिब्बा, टॉफी या चॉकलेट थमा दी जाती है। सवाल उठ रहा है कि क्या अब चॉकलेट ही भारत की नई मुद्रा बन गई है?

यही स्थिति बस और रिक्शा चालकों के बीच भी देखने को मिल रही है। चिल्हर न होने का बहाना बनाकर 12 रुपये के किराए के बदले 15 या 20 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। ग्रामीणों और छोटे व्यापारियों का कहना है कि जब तक स्थानीय बैंक सक्रिय रूप से इन सिक्कों का लेन-देन नहीं करेंगे और जनता का विश्वास नहीं बढ़ेगा, तब तक समस्या बनी रहेगी। लोगों को डर है कि अगर बैंक सिक्के नहीं लेगा तो वे इनका क्या करेंगे—यही डर दुकानदारों की मनमानी को बढ़ावा दे रहा है।

बलरामपुर एक अंतरराज्यीय सीमा वाला जिला है। बाहरी राज्यों और शहरों से आने वाले लोग जब यहां सिक्के नहीं चलने की बात सुनते हैं, तो वे जिले की कानून व्यवस्था और प्रशासनिक पकड़ पर सवाल उठाते हैं। जब रायपुर, दुर्ग और भिलाई जैसे शहरों में सिक्के चल सकते हैं, तो बलरामपुर में क्यों नहीं?

सब्जी मंडियों में भी स्थिति चिंताजनक है। दुकानदार खुले पैसे न होने का हवाला देकर सामान का मूल्य मनमाने तरीके से तय कर देते हैं। “सीधा ₹20 का दे रहा हूं, छुट्टा नहीं है” जैसे तर्क देकर ग्राहकों से अधिक राशि ली जा रही है।
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन केवल आदेश जारी कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेगा या फिर भारतीय मुद्रा लेने से इनकार करने वालों पर दंडात्मक कार्रवाई भी की जाएगी? इस खबर के प्रकाशन के बाद क्या प्रशासन जागेगा या फिर दुकानदारों की मनमानी यूं ही जारी रहेगी—इस पर अब जिलेवासियों की निगाहें टिकी हुई हैं।

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