संवाददाता – मोहन वैष्णव
कोरबा/करतला। करतला विकासखंड के ग्राम पंचायत दमखांचा से सामने आई तस्वीरें और ग्रामीणों के आरोप शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। जहां एक ओर सरकार गरीबों तक खाद्यान्न पहुंचाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर दमखांचा में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) पूरी तरह लचर और संदिग्ध नजर आ रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें समय पर राशन नहीं मिल रहा। महीनों से शक्कर और चना का वितरण बंद है, जबकि चावल वितरण भी अनियमित और मनमाने ढंग से किया जा रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि राशन लेने पहुंचे हितग्राहियों का पहले ई-पॉस मशीन में अंगूठा लगवा लिया जाता है और उन्हें बिना राशन दिए वापस भेज दिया जाता है। कई दिनों बाद राशन दिया जाता है, जिससे यह आशंका गहराती है कि रिकॉर्ड में हेरफेर कर खाद्यान्न की बंदरबांट की जा रही है।

गांव की महिला ग्रामीण महेतरीन बाई ने बताया कि वे कई बार राशन लेने गईं, लेकिन हर बार उन्हें “बाद में आना” कहकर लौटा दिया गया। उनका कहना है कि पहले ई-पॉस मशीन में अंगूठा लगवा लिया जाता है, लेकिन उसी समय राशन नहीं दिया जाता। “हम मजदूरी छोड़कर जाते हैं, लेकिन खाली हाथ वापस आना पड़ता है,” उन्होंने दुख जताया।
शांति बाई ने बताया कि महीनों से शक्कर और चना का वितरण बंद है, जिससे घर चलाना मुश्किल हो गया है। उन्होंने कहा कि कई बार चक्कर लगाने के बाद भी पूरा राशन नहीं मिलता। “हम गरीब लोग हैं, बार-बार दुकान के चक्कर कैसे लगाएं? हमारा हक हमें समय पर मिलना चाहिए,” उन्होंने नाराजगी जताई।
स्थिति उस वक्त और गंभीर हो गई जब इस पूरे मामले की जानकारी लेने पहुंचे स्थानीय पत्रकारों के साथ पंचायत प्रतिनिधियों ने अभद्र व्यवहार किया। ग्रामीणों के सामने ही सरपंच और सचिव ने पत्रकारों से तू-तड़ाक की, गाली-गलौज की और किसी भी प्रकार की जानकारी देने से साफ इनकार कर दिया। एक महिला पत्रकार के साथ भी दुर्व्यवहार की घटना सामने आई है, जिसने पूरे मामले को और शर्मनाक बना दिया है।
ग्रामीणों ने पंचायत सचिव पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वह अक्सर शराब के नशे में कार्यालय पहुंचते हैं और उसी हालत में काम करते हैं। चावल वितरण के दौरान भी उनका व्यवहार संदिग्ध और गैर-जिम्मेदाराना बताया जा रहा है। इससे साफ है कि पंचायत स्तर पर जवाबदेही का अभाव है और व्यवस्था पूरी तरह मनमानी के भरोसे चल रही है।
हैरानी की बात यह है कि जब इस पूरे मामले की जानकारी जनपद पंचायत करतला के सीईओ को दी गई, तो उन्होंने तत्काल जांच या कार्रवाई के बजाय “पहले लिखित शिकायत करो” कहकर मामले से किनारा कर लिया। इससे प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या अब कार्रवाई के लिए केवल कागजी औपचारिकताएं ही जरूरी रह गई हैं?
इधर, पंचायत सचिव का यह बयान—“जो छापना है छाप लो, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता”—यह दर्शाता है कि उसे किसी प्रकार की कार्रवाई का डर नहीं है। यह बयान न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को चुनौती देता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि कहीं न कहीं उसे किसी बड़े संरक्षण का भरोसा है।
जब प्रदेश में “सुशासन” के दावे किए जा रहे हैं और गांव-गांव तक योजनाओं के क्रियान्वयन की बात हो रही है, ऐसे में दमखांचा पंचायत की यह स्थिति उन दावों पर सीधा सवाल खड़ा करती है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में गंभीरता दिखाता है या फिर यह मामला भी अन्य शिकायतों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।








