बस्तर संवाददाता – अर्जुन झा
कादोमाली को नहीं मिला राजस्व ग्राम का दर्जा
योजनाओं के लाभ से वंचित हैं आदिवासी
“पाथरी पंचायत से 3 किमी दूर बसा आश्रित गांव, 1950 से पहले से आबाद फिर भी कागज पर अस
बकावंड। इस धरती पर एक गांव आजादी के दशकों पहले से आबाद है, मगर सरकारी दस्तावेजों में उसका नामो निशान नहीं है।यहां के ग्रामीण वोटर भी हैं और लोकतंत्र के महायज्ञ में हिस्सा लेकर सरकार गठन में योगदान भी देते हैं, मगर सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले सकते। वजह सिर्फ इतनी सी है कि सरकारी रिकॉर्ड में इस गांव को स्वतंत्र राजस्व ग्राम का दर्जा नहीं मिल पाया है।
देश की आजादी को 79 साल हो गए, लेकिन बस्तर जिले की तहसील करपावंड की ग्राम पंचायत पाथरी का आश्रित गांव कादोमाली आज भी राजस्व ग्राम का दर्जा पाने को तरस रहा है। पाथरी पंचायत मुख्यालय से 3 किलोमीटर दूर जंगल के बीच बसे कादोमाली के ग्रामीण जीविकोपार्जन के लिए पूरी तरह मजदूरी और वनोपज पर आश्रित हैं। कोई शासकीय काम हो तो यहां के ग्रामीणों को 3 किमी की पैदल यात्रा कर पाथरी जाना पड़ता है। राशन, पेंशन, जाति प्रमाण पत्र, जन्म-मृत्यु पंजीयन, सबके लिए यह सफर उनकी मजबूरी है। ग्रामीणों के अनुसार कादोमाली 1950 से वर्षों पहले से बसा हुआ है। कई पीढ़ियां यहीं पैदा हुईं, यहीं बसीं और इसी माटी में मिल गईं, मगर राजस्व रिकॉर्ड में आज तक इसे स्वतंत्र ग्राम का दर्जा नहीं मिल पाया। नतीजतन गांव का अपना पटवारी नहीं, अपना सचिव नहीं, अपना सरपंच नहीं, है तो सिर्फ पराधीनता का भाव और ग्रामीणों के हताश निराश चेहरे। राजस्व ग्राम न होने के कारण कोदोमाली योजनाओं से वंचित है। यहां नल-जल योजना का काम तो हुआ है, लेकिन पानी उपलब्ध नहीं है। तालाब नाला का सहारा लेकर ग्रामीणों का जीवन यापन चल रहा है। यहां के लोगों को मनरेगा के तहत पृथक से काम नहीं मिलता अलग, पाथरी में मनरेगा का काम शुरू होता है तो वहां कोदोमाली के आदिवासी ग्रामीणों को जरा भी प्राथमिकता नहीं मिलती।वन अधिकार पट्टे के दावे यहां बेदम हो गए हैं, क्योंकि राजस्व नक्शे में गांव है ही नहीं। ग्रामीण फूलसिंग नेताम ने बताया कि उन्होंने मुख्यमंत्री जन शिकायत पोर्टल पर आवेदन दिया। ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से तहसील कार्यालय करपावंड और कलेक्टर कार्यालय जगदलपुर में भी ज्ञापन दिया। मगर आज तक कोई भी अधिकारी निरीक्षण के लिए तक कादोमाली नहीं पहुंचा। फाइलें दफ्तरों में घूम रही हैं, गांव जस के तस अपने हाल पर आंसू बहा रहा है।

ऎसी है ग्रामीणों की पीड़ा
इस संवाददाता से चर्चा करते समय ग्रामीणों का दर्द छलक पड़ा। ग्रामीणों ने कहा- हमारा गांव नक्शे में नहीं है, तो क्या सरकार की नजर में हमारा कोई वजूद नहीं है, या सरकार और प्रशासन ने हमें मरा हुआ मान लिया है? अतिवृष्टि हो जाए, बाढ़ आए, आग लग जाए, कोई मर जाए, तो पाथरी, बकावंड, करपावंड और जगदलपुर से टीम आने में कई दिन लग जाते हैं। 79 साल की आजादी में हमें सिर्फ आश्रित का ठप्पा मिला है।
क्या कहता है नियम ?
छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 73 के तहत 200 से अधिक आबादी और निश्चित मापदंड पूरा करने वाले मजरे-टोले को स्वतंत्र राजस्व ग्राम घोषित किया जा सकता है। इसके लिए कलेक्टर को सर्वे कराकर प्रस्ताव शासन के पास भेजना पड़ता है। कोदोमाली की जनसंख्या करीब 600 है और राजस्व ग्राम का दर्जा पाने के सभी कायदों में यह गांव पूरी तरह खरा उतरता है। फिर भी न जाने क्यों शासन प्रशासन इस गांव को अब तक उपेक्षित किए हुए हैं? ग्रामीणों का कहना है कि अब हम लोगों के पास एक ही रास्ता बचा है और वह है समाचार पत्र। इसके जरिए सरकार, शासन-प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को गहरी नींद से जगाया जाएगा। हमारे आश्रित गांव को राजस्व का दर्जा मिले, ताकि हम भी सरकारी योजनाओं के हकदार बन सकें।








