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RSS का शताब्दी काल…अधिवक्ता परिषद भारतीय स्वाभिमान और राष्ट्रीय सम्मान के पुनर्स्थापन हेतु प्रतिबद्ध … अधिवक्ता चितरंजय पटेल

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने महाराष्ट्र के नागपुर में 27 सितंबर 1925 को विजयदशमी के अवसर पर किया।
मकसद था, हिंदू समाज को संगठित करना और राष्ट्र का पुनर्निर्माण…
आज हम संघ की शताब्दी वर्ष मना रहे हैं, यह सनातन के लिए गौरव का विषय है… साथ ही इन पलों में चिंतन का प्रमुख विषय यह है कि हर देशवासी में राष्ट्रीय भाव जागरण… और उसके लिए हिंदुओं की एकता और संगठन की आवश्यकता क्यों ? मान्यता है कि समृद्ध समाज हमेशा अपने अतीत से सीखता है… और फिर अतीत की कमजोरियों से सबक लेकर अपनी विकास और समृद्धि सुनिश्चित करने उद्यम करता है… यह बात हमारे युगपुरुष डॉ हेडगेवार के जेहन में शायद इस लिए भी आई, चूंकि अखंड भारत में मुगलों के द्वारा भारतीयों पर अत्याचार की पराकाष्ठा के साथ भारतीय संस्कृति, परंपरा, देवी_देवताओं, मंदिर_देवालयों आदि के साथ ही हमारे मान बिंदुओं पर आक्रमण कर सनातन को छिन्न_ भिन्न कर दिया गया तो वहीं अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में बची_खुची भारतीयता का सर्वनाश तथा भारतीय संस्कृति को समाप्त करने शिक्षा संस्थानों को सर्वाधिक दुष्प्रभावित किया फलस्वरूप हम तथा हमारी भावी पीढ़ी अपने पूर्वजों को भी भूलते चले गए… तथा अपने ही देश में अकबर को महान तथा महाराणा प्रताप को आक्रांता पुकारने लगे और तथाकथित ब्रिटिश शिक्षा से पोषित हमारे तत्कालीन रहनुमा ब्रिटिशर की गुलामी में ही अपने आपको महिमा मंडित कर गौरवान्वित महसूस कर रहे थे… इस प्रकार मुगलों ने अगर हमारे मान बिन्दुओं को छीना तो वहीं अंग्रेजों ने अपने फुट डालो, राज करो की नीति के साथ भारत के संस्कारित शिक्षा व्यवस्था के स्थान पर लार्ड मैकाले की एजुकेशन पॉलिसी देश में लाद दिया, जहां कॉन्वेंट परंपरा से गौरवान्वित हमारे लोगों ने सनातन, गुरुकुल, आश्रम, गुरु_शिष्य परंपरा को लगभग तिलांजलि दे दिया।
अब भारतीय समाज संस्कृति, सभ्यता, संस्कार, वेशभूषा, रहन रहन ही अंग्रेजियत को आत्मसात कर रहा हो तब इस पीड़ा को समझने वाला डा हेडगेवार जैसा युग पुरुष ही हो सकता है जिसने सौ वर्ष पूर्व चंद लोगों को लेकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की बैठक में भारतीय परंपराओं के पुनर्स्थापन पर चिंतन शुरू किया… तब विरोधियों ने जाति, भाषा, संप्रदाय, व्यवसाय आदि के आधार पर बिखरे हुए हिंदुओं को एक करने के डा हेडगेवार के प्रयास को, मेंढकों को तराजू में तौलने से तुलना की गई ।
इन प्रतिकूल परिस्थितियों में अब युगपुरुष की परीक्षा थी और उनने सबके उपहास व विरोध को ही अपनी ताकत बनाया और चरैवेति चरैवेति… का मार्ग चुना …फलस्वरूप आज राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसे विशाल वट वृक्ष के नीचे राष्ट्र प्रथम भाव से अनेकों राष्ट्रवादी संगठन समाज में भलीभांति अपनी भूमिका अदा केआर रहे हैं।
इनमें ही एक अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद (ABAP) की स्थापना 7 सितंबर 1992 को संघ के स्वयं सेवक, सामाजिक चिंतक दत्तोपंत ठेंगड़ी द्वारा की गई ताकि समाज का तथाकथित विद्वान एवं अभिजात्य वर्ग भारतीय परंपराओं और मूल्यों पर आधारित “भारतीय संस्कृति एवं मान्यताओं पर केंद्रित भारतीय कानून प्रणाली विकसित करने हेतु अपना भूमिका सुनिश्चित करे, क्योंकि आजादी के समय से ही भारतीय न्याय प्रणाली और शिक्षा व्यवस्था में अंग्रेजियत के गुलाम तथाकथित कम्युनिस्ट विचारधारा के लोग हावी थे जिनमें सनातन और भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान भाव कभी नहीं रहा ।
फलस्वरूप दत्तोपंत के सिपाही, हम सभी “न्याय: मम धर्म:” इस ध्येय के साथ के साथ भारतीय विधिक प्रणाली में सुधार, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु कटिबद्ध हैं…
आज अधिवक्ता परिषद हमेशा विधिक अनुसंधान, प्रकाशन और समाज के अंतिम छोर में खड़े व्यक्ति को समुचित न्याय दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है ।
हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध एक ऐसे राष्ट्रवादी संगठन के योद्धा हैं जो राष्ट्र प्रथम भाव के साथ भारतीय संस्कृति, मान्यताओं एवं परंपराओं को आत्मसात करते हुए राष्ट्रवादी अधिवक्ताओं को एक मंच प्रदान कर देश के कानून और न्याय व्यवस्था को भारतीय मूल्यों और मान्यताओं के अनुकूल, भारतीय स्वाभिमान और राष्ट्रीय सम्मान के पुनर्स्थापन कार्य में करने में शामिल है।
….Chitranjay Patel Advocate
CG High Court Bilaspur@Sakti

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