बसंत राघव
एक कार्यशाला में प्रस्तुतकर्ता ने बताया था कि हमारा मन कुछ शब्दों और छवियों से कैसे ‘कंडीशंड’ हो चुका है। ‘नर्स’ कहते ही स्त्री का चेहरा उभरता है, ‘फूल’ कहते ही गुलाब दिखता है और ‘पुलिस’ कहते ही क्रूरता का बिंब (छवि) उभरकर आता है। दरअसल यही पूर्वाग्रह हमारी सोच को यांत्रिक बनाता है।
रमेश शर्मा की कहानी ‘पंद्रह साल का फासला’ इसी मानसिक अनुकूलन को तोड़ती है। कहानी में एक युवा पुलिस जोड़ा- (इंस्पेक्टर सक्सेना और सुधा तिवारी) मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे प्रेमी जोड़े सूरज और प्रीति का पीछा करता है। पाठक की पहली मानसिक प्रतिक्रिया में पुलिस का चेहरा कठोर और संदेही बनकर उभरता है, परंतु कहानी आगे बढ़ते ही यह जोड़ा प्रेम, विमर्श और मानवीय संवेदना के धरातल पर खड़ा मिलता है। कहानी इस विमर्श को जन्म देती है कि पुलिस भी प्रेम पर विमर्श कर सकती है, रिश्तों को समझ सकती है और सामाजिक पहरेदारी से परे मानवीय दृष्टि रख सकती है। बाजार और राजनीति ने जिस तरह मनुष्य के दिमाग को खांचों में बांध दिया है, यह कथा उसी को चुनौती देती है।

कहानी की शुरुआत एक पति-पत्नी की पहाड़ी यात्रा से होती है। वर्तमान की यह यात्रा उनकी पंद्रह साल पुरानी स्मृति से जुड़ जाती है- जिसमें मेडिकल कॉलेज परिसर, गर्ल्स-बॉयज हॉस्टल, बारिश और ‘कबरा’ पहाड़ पर बने प्रागैतिहासिक काल के शैल चित्र शामिल हैं।
सूरज, एमबीबीए फोर्थ ईयर का छात्र और प्रीति का प्रेम वर्तमान में स्मृति बनकर लौटता है। पुलिस द्वारा उनका पीछा करना कहानी में तनाव पैदा करता है, पर जैसे-जैसे संवाद खुलते हैं, यह स्पष्ट होता है कि यहाँ सवाल प्रेम का है, अपराध का नहीं। प्रीति का सीधा कथन – “सर, हम एक-दूसरे से प्रेम करते हैं” – युवा पीढ़ी के आत्मविश्वास और स्पष्टता को सामने रखता है। सुधा तिवारी का सहज और ममतामयी व्यवहार पुलिस की प्रचलित छवि को मानवीय बनाता है।
कहानी में कथाकार की भाषा शैली सरल, संवादात्मक और प्रवाहपूर्ण है। तत्सम शब्दों के साथ-साथ बोलचाल की हिंदी और आवश्यक अंग्रेजी शब्दों का समावेश उनकी कहानियों को समकालीन बनाता है। इसके अलावा, फ्लैशबैक पद्धति के प्रयोग से अतीत और वर्तमान के दृश्य सहजता से आपस में जुड़ जाते हैं।
प्रकृति यहाँ केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि एक सक्रिय पात्र है। कहानी में बारिश, बादल और पत्थरों में बहती ‘प्रेम की धारा’ तथा पहाड़ का ‘बाहों में भर लेना’ जैसे बिंब भावनात्मक गहराई देते हैं। वहीं दूसरी ओर, ‘पैरों के निशान’, ‘धुंधली होती स्मृतियाँ’, ‘रेस का घोड़ा’ और ‘पैसों का पीछा करते हुए ’ जैसे प्रतीक आधुनिक जीवन की भागदौड़, करियर की अंधी दौड़ और भावशून्यता पर तीखा व्यंग्य करते हैं।
कहानी का केंद्रीय प्रश्न यह है कि क्या प्रेम पर विचार करना और रिश्तों को समझना केवल आम नागरिकों का काम है? लेखक रमेश शर्मा यह दिखाते हैं कि कानून की वर्दी के भीतर भी एक धड़कता हुआ दिल होता है। साथ ही, कहानी यह भी रेखांकित करती है कि बाजार-केंद्रित जीवनशैली किस तरह प्रेम और मानवीय संबंधों को पीछे धकेल देती है। समय बीतने के साथ व्यक्ति के भीतर नैतिक चेतना जागती है, पुराने कर्म ग्लानि बनकर लौटते हैं, और ‘फासला’ केवल समय का नहीं, बल्कि मन की उन परतों का बन जाता है जिन्हें स्मृतियों की बारिश कभी भी भिगो सकती है।
‘पंद्रह साल का फासला’ केवल एक प्रेम-कथा नहीं है, बल्कि यह मानसिक अनुकूलन, बाजार-केंद्रित जीवनशैली और मानवीय संबंधों के क्षरण पर एक गहरी व्यथा कथा भी है।इस कहानी के माध्यम से लेखक ने स्मृति, प्रकृति, मनोवैज्ञानिक द्वंद्व और सामाजिक सरोकारों को एक सूत्र में पिरोकर पाठक को आत्मचिंतन करने के लिए प्रेरित किया है। यह कहानी इसलिए भी याद रह जाती है, क्योंकि यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि कहीं हम सफलता की अंधी दौड़ में अपने ही अहसासों से दूर तो नहीं हो गए हैं।








