”ज़िंदगी की अनकही दौड़”
इंसान के पैदा होने से पहले ही
कितने रिश्ते बन जाते हैं,
कोई उसे अपना कह देता है,
कोई उसमें अपना कल देख लेता है।
इंसान के जन्म के बाद
कितनी योजनाएँ बन जाती हैं,
चलना भी नहीं सीखा होता,
और उसके रास्ते तय कर दिए जाते हैं।
इंसान के बड़ा होने से पहले ही
कितनी अपेक्षाएँ जुड़ जाती हैं,
उसके कंधों पर वे सपने रख दिए जाते हैं
जो कभी उसके अपने थे ही नहीं।
इंसान के मंज़िल तक पहुँचने से पहले
कितनी दुआएँ की जाती हैं,
पर सच तो यह है—
हर दुआ में कहीं न कहीं एक उम्मीद छिपी होती है।
इंसान जब कुछ हासिल कर लेता है,
तो तालियाँ गूँज उठती हैं,
पर उसी शोर में
नई इच्छाएँ जन्म लेने लगती हैं।
इच्छाओं की पूर्ति के बाद
न सुकून मिलता है, न ठहराव,
बस एक और दौड़,
एक और चाह बाकी रह जाती है।
इंसान हासिल तो बहुत कुछ कर लेता है,
पर ख़ुद को कहीं खो देता है।
और फिर…
वक़्त बिना आवाज़ दिए आगे बढ़ जाता है,
अंत क़रीब आ जाता है।
तब इंसान सोचता है—
👉 जिस मक़सद से जन्म लिया था,
वह तो रास्ते में ही कहीं छूट गया।
👉 पूरी ज़िंदगी दूसरों के सपने पूरे करता रहा,
और अपना सपना देखना ही भूल गया।
लेखक ✍️: राजकुमार सोनी, रायपुर (छत्तीसगढ़)








