प्रकृति से मिला मानव को वरदान,
प्रकृति का संरक्षण देता जीवन-दान।
मानव कर रहा है प्रकृति का दोहन,
दिन-प्रतिदिन बिगड़ रहा है पर्यावरण।
जब तक बढ़ता रहेगा प्रदूषण,
तब तक संकट में रहेगा जन-जीवन।
कटते जंगल, सूखते जल के स्रोत,
धरती सह रही है हर दिन नए आघात और चोट।
नदियाँ रोती हैं, पर्वत भी मौन हो रहे,
स्वार्थ में इंसान अपने ही घर को खो रहे।
धुआँ, धूल और विषैली हवाओं का विस्तार,
प्रकृति सह रही है मानव का अत्याचार।
जब होगा पर्यावरण पर उचित नियंत्रण,
तब सुरक्षित होंगे जीव-जंतु और जन-जीवन।
हरियाली से फिर महकेगा आँगन,
शुद्ध हवा से मुस्काएगा जन-जन।
जब होगा पर्यावरण का सही प्रबंधन,
तभी बनेगा धरती का संतुलन और संरक्षण।
आओ मिलकर ऐसा अभियान चलाएँ,
धरती माँ का ऋण थोड़ा तो चुकाएँ।
पेड़ लगाएँ, जल और प्रकृति बचाएँ,
आने वाली पीढ़ी को सुंदर संसार दे जाएँ।
नदियों का निर्मल प्रवाह बनाएँ,
धरती को फिर से हरा-भरा बनाएँ।
प्रकृति का सम्मान ही सच्चा धर्म बने,
हर मानव का यही श्रेष्ठ कर्म बने।
यदि आज चेतेंगे, तो कल सँवर जाएगा,
प्रकृति का आँचल फिर से लहलहाएगा।
आओ मिलकर यह संकल्प निभाएँ,
स्वच्छ, सुरक्षित और सुंदर भारत बनाएँ।
राजकुमार सोनी, रायपुर








