पर्यावरण दिवस की सेल्फी बनाम पर्यावरण की सच्चाई
दो पौधे लगाकर खुशियाँ, लेकिन एक बड़ा पेड़ काटकर कितना नुकसान?
विशेष लेख |
5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया। देशभर में लाखों पौधे लगाए गए। नेताओं, अधिकारियों, संस्थाओं और आम नागरिकों ने पौधारोपण किया, तस्वीरें खिंचवाईं, सोशल मीडिया पर पोस्ट डालीं और पर्यावरण बचाने के संकल्प लिए।
लेकिन एक सवाल हर साल वहीं खड़ा रह जाता है—
जो पौधे आज लगाए गए, उनमें से कितने अगले साल तक जीवित रहेंगे? और उनमें से कितने वास्तव में बड़े पेड़ बन पाएंगे?
पौधे लगाना आसान, उन्हें पेड़ बनाना मुश्किल
वन और पर्यावरण विभागों के कई सर्वे तथा शोध बताते हैं कि किसी भी पौधारोपण अभियान की सफलता केवल लगाए गए पौधों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी जीवित रहने की दर (Survival Rate) से मापी जाती है।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के 2025 के एक अध्ययन में पाया गया कि जहां नियमित देखरेख, सिंचाई और सुरक्षा उपलब्ध थी, वहां पौधों की जीवित रहने की दर 70% से 87% तक रही। वहीं खराब प्रबंधन, पानी की कमी, पशुओं द्वारा नुकसान और निगरानी के अभाव को पौधों की मृत्यु का प्रमुख कारण बताया गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि पौधारोपण के बाद पहले तीन वर्ष सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। यदि इस दौरान देखभाल नहीं हुई तो अधिकांश पौधे नष्ट हो जाते हैं।

सिर्फ संख्या नहीं, वास्तविक हरियाली मायने रखती है
हर साल करोड़ों पौधे लगाने के दावे किए जाते हैं।
मध्यप्रदेश सरकार ने 2020 से 2024 के बीच लगभग 16.22 करोड़ पौधे लगाने और लगभग 89% जीवित रहने का दावा किया था।
उत्तर प्रदेश सरकार ने भी करोड़ों पौधे लगाने और 86% से अधिक जीवित रहने की बात कही है।
लेकिन कई जगहों पर वास्तविक स्थिति अलग भी पाई गई। न्यायालयों और ऑडिट रिपोर्टों में ऐसे मामले सामने आए हैं जहां लगाए गए पौधों का बड़ा हिस्सा सूख गया क्योंकि उनकी सुरक्षा, सिंचाई और निगरानी नहीं हुई। महाराष्ट्र में एक मामले में लगाए गए 1,861 पौधों में से 749 पौधे मर चुके थे।
यानी असली सवाल यह नहीं है कि कितने पौधे लगाए गए, बल्कि यह है कि कितने पेड़ बन पाए।
एक बड़ा पेड़ काटकर दो पौधे लगाना बराबरी नहीं
आज शहरों में सड़क चौड़ीकरण, कॉलोनियों, मॉल, उद्योगों और निजी निर्माण के लिए हजारों परिपक्व पेड़ काटे जा रहे हैं।
हाल ही में गुरुग्राम में एक वर्ष के भीतर 12,500 से अधिक पेड़ काटे जाने का मामला सामने आया। इसके बदले लगाए जाने वाले पौधों की संख्या भी लक्ष्य से कम रही।
पर्यावरण वैज्ञानिक वर्षों से बताते रहे हैं कि 30-40 वर्ष पुराने एक बड़े वृक्ष की पर्यावरणीय उपयोगिता को कुछ छोटे पौधे तुरंत प्रतिस्थापित नहीं कर सकते।
एक बड़ा पेड़—
हजारों लीटर वर्षाजल को भूमि में पहुंचाने में मदद करता है।
पक्षियों और जीवों का घर होता है।
गर्मी कम करता है।
छाया देता है।
कार्बन संग्रहित करता है।
निरंतर ऑक्सीजन उत्पादन में योगदान देता है।
जबकि एक नया पौधा इन लाभों तक पहुंचने में कई वर्षों का समय लेता है।
पर्यावरण दिवस का सबसे बड़ा विरोधाभास
एक ओर हम पर्यावरण दिवस पर पौधे लगाते हैं।
दूसरी ओर—
घर बढ़ाने के लिए पेड़ काट देते हैं।
पार्किंग बनाने के लिए पेड़ हटवा देते हैं।
दुकानों और कॉम्प्लेक्सों के लिए हरियाली खत्म कर देते हैं।
सड़कों के विस्तार के नाम पर पुराने वृक्षों की बलि दे देते हैं।
फिर उसी स्थान पर दो-चार पौधे लगाकर अपने कर्तव्य की तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा कर देते हैं।
पर्यावरण संरक्षण का अर्थ केवल पौधारोपण नहीं, बल्कि मौजूद पेड़ों को बचाना भी है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 1000 पौधे लगाकर केवल 200 जीवित रहते हैं, तो उससे बेहतर है 400 पौधे लगाए जाएं लेकिन 300 पेड़ बन जाएं। पौधारोपण की सफलता संख्या नहीं, परिणाम से मापी जानी चाहिए l
जरूरत फोटो अभियान की नहीं, संरक्षण अभियान की है
विश्व पर्यावरण दिवस पर पौधा लगाना अच्छी शुरुआत है, लेकिन असली जिम्मेदारी उसके बाद शुरू होती है।
यदि हर व्यक्ति—
अपने घर या मोहल्ले के एक पुराने पेड़ को बचाने का संकल्प ले,
लगाए गए पौधे की कम से कम तीन वर्ष तक देखभाल करे,
अनावश्यक वृक्ष कटाई का विरोध करे,
स्थानीय प्रजातियों के वृक्ष लगाए,
तो पर्यावरण दिवस वास्तव में सार्थक बन सकता है।
अंतिम बात
पर्यावरण को पौधों की संख्या नहीं, पेड़ों की उम्र बचाती है।
एक 30 साल पुराने फलदार, छायादार वृक्ष को काटकर दो नए पौधे लगा देना पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि आत्म-संतोष हो सकता है।
इस वर्ष पर्यावरण दिवस पर सबसे बड़ा प्रश्न यही है—
क्या हम पेड़ लगा रहे हैं, या केवल तस्वीरें?
क्या हम हरियाली बढ़ा रहे हैं, या केवल आंकड़े?
जब तक पौधारोपण के साथ संरक्षण और देखभाल नहीं जुड़ती, तब तक पर्यावरण दिवस का उत्सव अक्सर मिट्टी में लगाए गए पौधों से अधिक कैमरों में कैद तस्वीरों तक ही सीमित रह जाएगा।








