रघुराज –
छत्तीसगढ़ की जनता के लिए स्वास्थ्य सेवाओं के मोर्चे पर एक बहुत बड़ा झटका लगा है। राजधानी रायपुर समेत प्रदेश के कई जिलों में अब मरीजों को मुफ्त में मिलने वाली जांच सुविधाओं से वंचित होना पड़ सकता है। राज्य सरकार ने शासकीय अस्पतालों में संचालित होने वाले हमर लैब को पूरी तरह से बंद करने का फैसला किया है। अब इन प्रयोगशालाओं में होने वाली तमाम जांचों का जिम्मा एक निजी यानी प्राइवेट कंपनी को सौंप दिया गया है। इस बड़े बदलाव के बाद अब गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के सामने इलाज और जांच को लेकर एक बड़ी चिंता खड़ी हो गई है।
छत्तीसगढ़ में साल 2020 में तत्कालीन भूपेश बघेल सरकार के नेतृत्व में हमर लैब योजना की शुरुआत की गई थी। इस योजना को शुरू करने का मुख्य उद्देश्य यह था कि प्रदेश के हर एक गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार को महंगी जांचों के खर्च से बचाया जा सके। इस योजना के अंतर्गत मरीजों के खून, पेशाब और अन्य जरूरी शारीरिक जांचें पूरी तरह से मुफ्त में की जाती थीं। जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में आने वाले मरीजों को डॉक्टर की पर्ची के आधार पर बिना एक भी रुपया खर्च किए सभी रिपोर्ट मिल जाती थीं। इससे उन परिवारों को बहुत बड़ी राहत मिलती थी, जिनके लिए निजी पैथोलॉजी लैब में जाकर हजारों रुपए खर्च करना मुमकिन नहीं था।
लेकिन अब साल 2026 में वर्तमान सरकार ने इस व्यवस्था को पूरी तरह से बदलने का निर्णय लिया है। सरकार ने हमर लैब की पुरानी व्यवस्था को समाप्त कर दिया है और इस पूरे काम को प्राइवेट हाथों में दे दिया है। जानकारी के अनुसार रायपुर, धमतरी, कांकेर और कुछ अन्य जिलों में हमर लैब की पुरानी सेवाएं पूरी तरह से बंद हो चुकी हैं। बताया जा रहा है कि रायपुर के पंडरी स्थित जिला अस्पताल में अब हमर लैब का नाम बदलकर अटल आरोग्य लैब के माध्यम से सेवाएं संचालित की जा रही हैं। यहां पुरानी मशीनों और उपकरणों को बदला गया है और नई मशीनें लगाई जा रही हैं।
हालांकि वर्तमान में कुछ जगहों पर आरोग्य लैब के माध्यम से अस्थायी राहत दिख रही है, लेकिन यह राहत बहुत लंबे समय तक नहीं रहने वाली है। इस नई व्यवस्था के तहत आने वाले कुछ ही समय में जांच की दरें यानी रेट तय कर दिए जाएंगे। इसका सीधा मतलब यह है कि जो जांचें अब तक मरीजों के लिए पूरी तरह से मुफ्त हुआ करती थीं, अब उनके लिए मरीजों की जेब से पैसे खर्च होंगे। निजी कंपनी द्वारा रेट तय किए जाने के बाद मरीजों को हर एक जांच के लिए निर्धारित शुल्क चुकाना होगा।
इस फैसले के बाद से आम जनता और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल उन गरीब और जरूरतमंद लोगों की सुविधा को लेकर है, जिनके लिए 100 या 200 रुपए का अतिरिक्त खर्च भी बहुत बड़ी बात होती है। दूर-दराज के गांवों और कस्बों से लोग रायपुर के बड़े सरकारी अस्पतालों में इसी उम्मीद के साथ आते हैं कि उन्हें वहां बेहतर और मुफ्त इलाज मिल सकेगा। लेकिन जांच सेवाओं के प्राइवेट कंपनियों के हाथ में जाने से इन गरीब मरीजों पर महंगाई का सीधा और बड़ा झटका लगने वाला है।
सरकारी सूत्रों और खबरों के अनुसार, इस पूरे सिस्टम को बदलने के पीछे उपकरणों और मशीनों की खरीद में हुई गड़बड़ियों को वजह बताया जा रहा है। कथित तौर पर यह बात सामने आ रही है कि पुरानी मशीनों और उपकरणों की खरीदी में लगभग 400 करोड़ रुपए का घोटाला हुआ था। इसी गड़बड़ी और घोटाले के आरोपों के बाद सरकार ने सरकारी स्तर पर इस व्यवस्था को चलाने के बजाय इसका संचालन प्राइवेट कंपनी को सौंपने का फैसला किया है। सरकार का तर्क हो सकता है कि प्राइवेट कंपनी के आने से व्यवस्था ज्यादा पारदर्शी और आधुनिक होगी, लेकिन इसका सीधा नुकसान उन आम नागरिकों को उठाना पड़ेगा जो मुफ्त स्वास्थ्य सेवाओं के भरोसे थे।
अब सबसे बड़ा संकट छत्तीसगढ़ की उस जनता के सामने है जो हर छोटी-बड़ी बीमारी के परीक्षण के लिए सरकारी अस्पतालों पर निर्भर है। यदि आने वाले दिनों में जांच के दाम बढ़ा दिए जाते हैं, तो गरीब मरीज जांच कराने से कतराएंगे, जिससे उनकी बीमारी और गंभीर रूप ले सकती है। पिछले कई सालों से हमर लैब छत्तीसगढ़ के लाखों लोगों के लिए एक लाइफलाइन की तरह काम कर रहा था, लेकिन अब इस पर ताला लगने से और प्राइवेट कंपनी के हाथों में कमान जाने से स्वास्थ्य सुविधाओं का व्यवसायीकरण होने का खतरा बढ़ गया है। जनता के बीच अब इस बात को लेकर गहरी नाराजगी और चिंता है कि जनहित की इस बेहतरीन योजना को बंद करके निजी लाभ कमाने वाली कंपनियों को क्यों बढ़ावा दिया जा रहा है।








