दुनिया एक रेला है, निराला मेला है,
मिलते हैं लोग, बिछुड़ जाते हैं, यही तो खेला है।
एक दूजे से रिश्ते निभाते हैं,
फिर भी कुछ अरमान अधूरे रह जाते हैं।
कुछ फ़रिश्ते पास आते हैं,
जो मुसीबत में सहारा बन जाते हैं।
कुछ अनजाने भी मिल जाते हैं,
जो जीवन-पथ सुगम बनाते हैं।
जीवन एक संगम है,
अनेकों आते-जाते हैं, कुछ यादें छोड़ जाते हैं।
कोई हँसना सिखा जाता है,
कोई जीने का हुनर बता जाता है।
सुख-दुःख के इस जीवन-सफ़र में,
सब अपने किरदार निभाते हैं।
जो प्रेम और करुणा बो जाते हैं,
वे मरकर भी यादों में मुस्काते हैं।
आखिर यही संसार का मेला है,
मिलन और बिछोह का खेला है।
✍️: राजकुमार सोनी, रायपुर (छत्तीसगढ़)







