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एक अदद छत की तलाश में ‘नेकी की दीवार’

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बसंत राघव
          वह केवल ईंट-सीमेंट की बनी दो दीवारें नहीं हैं, बल्कि शहर के दो छोरों पर बिखरी इंसानी संवेदनाओं के अधूरे दस्तावेज हैं। जब भी मैं आकाशवाणी रोड या स्टेशन रोड से गुजरता हूँ, मन में एक अजीब सी छटपटाहट और बेचैनी होने लगती है। रमेश शर्मा जी की कहानी ‘नेकी की दीवार’ याद आ जाती है, लेकिन हकीकत के धरातल पर दिखती तस्वीरें दिल को कचोटने लगती हैं।
         रायगढ़ के आकाशवाणी रोड की सुबह से रात तक की बात करें, तो सुबह के समय पेड़ों की ठंडी हवाओं के साथ मॉर्निंग वॉक पर निकले लोग दिखाई दे जाते हैं, आकाशवाणी के आसपास नुक्कड़ की केतली से चाय की खुशबू उठती है और अखबार पर देश-दुनिया की बहस चलती रहती है। हवा में ठंडक और सुकून रहता है। दस बजते-बजते यहाँ का नक्शा बदल जाता है। सरकारी दफ्तर, बैंक और शोरूम खुलते हैं। स्कूली बसें, फाइलें लिए बाबू और ग्राहकों से भरी दुकानें नज़र आती हैं। इन सबके बीच सिर ऊँचा किए खड़ा है आकाशवाणी का टावर, जो पूरे इलाके को बौद्धिक गरिमा देता है। चारों ओर हॉर्न की आवाज़, भीड़ और धूप बढ़ जाती है। वहीं शाम होते-होते लाइटें जलते ही रोड का रंग बदल जाता है। स्ट्रीट लाइट और नियॉन रोशनी में नहाई पेड़ों की हिलती-डुलती डालियाँ आकर्षक लगती हैं। फुटपाथ पर चाट, गुपचुप और मोमोज के ठेले सज जाते हैं। बर्तनों की खनक और युवाओं की हँसी गूँजने लगती है। मुख्य मार्ग से दो कदम पीछे मुड़ते ही आवासीय गलियों में दूसरी दुनिया दिखाई देती है। वहाँ बच्चों के खेलने की आवाज़, रसोई से आती दाल-तड़के की खुशबू और सुकून भरा रहता है। रात बढ़ते ही यह इलाका सुनसान सन्नाटे में तब्दील हो जाता है।
        आकाशवाणी रोड पर फॉरेस्ट ऑफिसर के आलीशान बंगले की बाउंड्री वॉल पर भित्तिचित्र उकेरे गए हैं, और उसी के एक कोने पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है- ‘नेकी की दीवार’। यद्यपि स्लोगन सुंदर है और सोच भी नेक है, तथापि उसके ठीक नीचे का दृश्य मानवीय लापरवाही को दर्शाता है।
       दीवार के नीचे आवारा कुत्ते गंदगी फैलाकर बैठे रहते हैं। कोई सहृदय व्यक्ति अपने घर से ढेरों उम्मीदों के साथ जरूरतमंदों के लिए नए-पुराने कपड़े छोड़ जाता है। लेकिन, खुले आसमान के नीचे पड़े वे कपड़े कुछ ही घंटों में धूप से बदरंग हो जाते हैं और बारिश के पानी से भीगकर कीचड़ में तब्दील हो जाते हैं। देने वाले की ‘नेकी’ और लेने वाले की ‘मजबूरी’, दोनों यहाँ धूल-धूसरित होती दिखाई देती हैं।
       दूसरी तरफ रायगढ़ का स्टेशन रोड शहर की नब्ज है। नटवर स्कूल के सामने बाईं ओर स्टेशन चौक पर सुबह सबसे पहले रोड पर खड़े हाथ-ठेलों पर चाय की केतली खनकती है। ट्रेन से उतरे यात्री बैग लटकाए बाहर निकलते हैं। ऑटो वाले गला फाड़कर “चक्रधर चौक!, जूटमिल!, घड़ी चौक!, बोईरदादर!,” पुकारते हैं। स्टेशन रोड के ठेलों पर इलायची-अदरक वाली चाय उबलती है- अखबार के साथ गरम समोसा और पोहा। धूप अभी नरम है। नटवर स्कूल के गेट पर साइकिलों और वैन की कतार लग जाती है। सफेद-नीली यूनिफॉर्म वाले बच्चे हँसते-दौड़ते भीतर चले जाते हैं।
        स्टेशन से हटरी रोड की तरफ जाने वाली सड़क पर कपड़े, मोबाइल और होटल की दुकानों में सब जगह भीड़ रहती है। पीरियड की घंटी के साथ मैदान से बच्चों के खेलने की आवाज आती है। यही रोड शाम के समय सबसे ज्यादा जीवंत हो उठता है, जब स्ट्रीट लाइटें जलने लगती हैं। गुपचुप, चाट, मोमोज, पावभाजी और तवे पर सिकते कबाब – छन-छन की आवाज, चटनी की महक, हॉर्न और हँसी सब एक साथ गूँजते हैं। दफ्तर से लौटे लोग, छात्र और परिवार- सब यहाँ रुककर व्यंजनों का स्वाद चखते हैं।
     स्टेशन मुख्य मार्ग पर एसपी ऑफिस के सामने इसी नटवर स्कूल की बाउंड्री वॉल पर भी  ‘नेकी की दीवार’ इबारत लिखी है। यहाँ का नजारा थोड़ा जुदा है। नगरपालिका के सफाईकर्मी रोज सुबह झाड़ू लगाते हैं, जिससे फुटपाथ का वह हिस्सा साफ-सुथरा नजर आता है। सफाई तो है, पर सुरक्षा नदारद है। तेज धूप, उड़ती हुई धूल और अचानक बरसता पानी यहाँ भी ‘नेकी’ को बेदम कर देते हैं। फुटपाथ पर पड़े वे कपड़े धूल की परत ओढ़े किसी लावारिस मलबे की तरह दिखने लगते हैं।
       इन दोनों दृश्यों को देखकर मन में एक प्रश्न कौंध जाता है- क्या सामाजिक संगठन और प्रशासन की जिम्मेदारी सिर्फ दीवार पर चार शब्द लिख देने भर से खत्म हो जाती है?
      शहर के सौंदर्यीकरण, स्वागत द्वारों और होर्डिंग्स पर जहाँ पानी की तरह हजारों-लाखों रुपये बहा दिए जाते हैं, क्या उस नेक पहल को एक मुकम्मल शक्ल नहीं दी जा सकती थी? कितना अच्छा होता अगर इस ‘दीवार’ को एक छोटे से ‘नेकी के घर’ में बदल दिया जाता। एक छोटी सी सुरक्षित छत, सामने काँच का पारदर्शी दरवाजा, जिसके भीतर सलीके से टंगे कपड़े धूप, पानी और धूल से सुरक्षित रहते।
              अगर ऐसा होता, तो अपनी बची-खुची चीजें एवं नये- पुराने कपड़ों को दान करने वाले को भी आत्मसंतुष्टि मिलती और उसे स्वीकार करने वाले जरूरतमंद लोगों के चेहरे पर भी एक वास्तविक और गरिमामय मुस्कान खिल पाती। सच कहूँ तो, शहर की ये दीवारें प्रशासन की बेपरवाही और हमारी सामाजिक जिम्मेदारी की बेरुखी पर सवाल उठा रही हैं। यह सब देखकर मन उदास हो जाता है, पर उम्मीद है कि प्रशासन और हमारे सामाजिक संगठन मिलकर ‘नेकी की दीवार’ को ‘नेकी का घर’ जरूर बनाएंगे।
बसन्त राघव
पंचवटी नगर, मकान नं. 30
कृषि फार्म रोड, बोईरदादर, रायगढ़,
छत्तीसगढ़, basantsao52@gmail.com मो.नं. 8319939396

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