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शासनादेश के बाद भी प्रभार का विवाद: DIET जांजगीर में आखिर किसके इशारे पर चल रही अव्यवस्था?

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-प्रतिनियुक्ति समाप्त होने के बाद भी प्रभारी प्राचार्य के रूप में कार्य करने के आरोप,

-वित्तीय प्रभार और वेतन व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

जिला जांजगीर-चांपा : जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान* (DIET) जांजगीर में प्रभारी प्राचार्य की भूमिका को लेकर उठ रहा विवाद अब केवल संस्थागत मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह शासन के आदेशों के पालन, प्रशासनिक जवाबदेही और संस्थागत व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आरोप है कि शासन द्वारा 11 जून 2026 को भुनेश्वर प्रसाद साहू की प्रतिनियुक्ति समाप्त कर उन्हें शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पौड़ी दलहा में प्राचार्य के रूप में पदस्थ किए जाने के बावजूद वे लंबे समय तक DIET जांजगीर में प्रभारी प्राचार्य की भूमिका में बने रहे।

जबकि आदेश जारी होते ही वह प्रभारी प्राचार्य न रहकर मात्र सहायक प्राध्यापक रह जाते हैं भुनेश्वर प्रसाद साहू आदेश जारी होने के चार दिन बाद अघोषित अवकाश पर चले जाते हैं 94 दिन बाद संस्था में आकर प्रभारी प्राचार्य के रूप में विभिन्न आदेश एवं सूचनाओं प्रसारित करते हैं आश्चर्य की बात यह कि वह उच्च कार्यालय को मैंने जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान जांजगीर में कार्यभार ग्रहण कर लिया करके सूचना पत्र प्रेषित करते हैं लेकिन उच्च कार्यालय द्वारा कोई भी कार्यवाही नहीं की जाती है सवाल यह है कि जब वह कार्यभार ग्रहण कर लिया करके सूचना भिजवा रहे हैं तो कार्य मुक्त होने का आवेदन देने में कितना समय लग जाता सवाल यह है कि शासन का आदेश लागू कराने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों की थी, उन्होंने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की?
प्रतिनियुक्ति समाप्त, फिर भी पुराना प्रभार कैसे?

बताया जा रहा है कि 11 जून 2026 को जारी शासन आदेश के बाद भुनेश्वर प्रसाद साहू को DIET जांजगीर से कार्यमुक्त होकर नई पदस्थापना स्थल पर जाना था। आरोप है कि इसके बजाय वे 16 जून से अवकाश पर चले गए और संस्था में अपनी पूर्व भूमिका को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं की गई।

सबसे गंभीर आरोप वित्तीय कार्यों से जुड़ा है। आरोप है कि 16 से 19 जून के बीच अवकाश में रहते हुए भी DIET जांजगीर के वित्तीय कार्य उनके द्वारा घर से किए गए तथा चेक जारी किए गए। यदि ऐसा हुआ है तो इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है कि उस अवधि में वित्तीय अधिकार किसके पास थे, किस प्राधिकरण के आधार पर चेक जारी हुए और संबंधित अभिलेखों पर किसके हस्ताक्षर हैं। सवाल यह भी है कि यदि भुवनेश्वर प्रसाद साहू अवकाश पर 16 जून 2026 को गए तो उन्होंने वित्तीय प्रभार उपप्राचार्य डाइट जांजगीर को क्यों नहीं सोपा

94 दिन के अवकाश स्वीकृति और पुनः मेडिकल लीव पर सवाल
मामले में यह भी दावा किया जा रहा है कि लंबे अंतराल के बाद संस्था में वापसी करने के पश्चात उनके 94 दिनों के लघुकृत अवकाश को स्वीकृति दी गई। यहां भी विभागीय नियमों के पालन और सक्षम अधिकारी की भूमिका की जांच जरूरी है।

विशेष रूप से यह स्पष्ट होना चाहिए कि अवकाश आवेदन किस कार्यालय को प्रस्तुत किया गया था, उसे स्वीकृत करने का अधिकार किस अधिकारी के पास था यदि यह अधिकारी लघु कृत अवकाश स्वीकृत कर सकते हैं तो फिर इनके द्वारा भुनेश्वर प्रसाद साहू को कार्य मुक्त क्यों नहीं किया गया सवाल यह है कि क्या संबंधित कर्मचारी उस अवधि में वास्तव में DIET की प्रशासनिक जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे थे। यह भी देखा गया कि राज्य शैक्षिक प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान रायपुर के व्हाट्सएप ग्रुप में भुनेश्वर प्रसाद साहू अवकाश में रहकर मैसेज भी कर रहे थे
इतना ही नहीं, सूत्रों के अनुसार बी. पी. साहू ने अपने 94 दिनों के लघुकृत अवकाश (Commuted Leave) का वेतन आहरित कर लिया और इसके तुरंत बाद, 10 अगस्त से वे पुनः मेडिकल लीव (चिकित्सा अवकाश) पर चले गए। भुनेश्वर प्रसाद साहू पिछले दो दिन से संस्था में अपनी उपस्थिति नहीं दे रहे हैं लेकिन इस बार भी संस्था में कर्मचारियों को इस बात की सूचना प्रेषित करना भुनेश्वर प्रसाद साहू ने आवश्यक नहीं समझा स्पष्ट है कि उनका प्रतिनियुक्ति समाप्त होने का आदेश आने के बाद भी वह तानाशाही पूर्वक डाइट जांजगीर में राज कर रहे हैं और सबको संदेश दे रहे हैं की डाइट जांजगीर उनकी निजी संपत्ति है इस तरह लगातार अवकाश और वेतन आहरण की प्रक्रिया ने प्रशासनिक हलकों में नए सवालों को जन्म दे दिया है।

वित्तीय प्रभार न सौंपने से वेतन का संकट: अन्य व्याख्याताओं के एरियर/अवकाश भुगतान भी ठप्प?
विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू संस्था की वित्तीय व्यवस्था से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि लंबे समय तक वित्तीय प्रभार अथवा DDO संबंधी अधिकार किसी अन्य सक्षम अधिकारी को नहीं सौंपे गए, जिसके कारण संस्था के कर्मचारियों को जुलाई माह का वेतन 7 अगस्त को प्राप्त हुआ।

यदि वित्तीय प्रभार उपलब्ध न होने के कारण वेतन भुगतान में विलंब हुआ है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि कर्मचारियों के हितों से जुड़ा गंभीर विषय है।

पक्षपातपूर्ण रवैये का एक और उदाहरण संस्था के अन्य कर्मचारियों के भुगतानों में देखने को मिल रहा है। बताया जा रहा है कि DIET जांजगीर में कार्यरत व्याख्याता सुरेश साहू द्वारा जून 2025 में नियमपूर्वक 6 दिनों का अर्जित अवकाश (Earned Leave) लिया गया था। परंतु, नियमानुसार आवेदन प्रस्तुत करने के बावजूद आज तक उन्हें इस 6 दिनों के अवकाश का भुगतान (पेमेंट) नहीं किया गया और इसे रोक कर रखा गया । एक तरफ जहां बी. पी. साहू के लघुकृत अवकाश का भुगतान तत्काल प्रभाव से कर दिया जाता है ज्ञात होगी सुरेश प्रसाद साहू व्याख्याता डायट जांजगीर ने भुनेश्वर प्रसाद साहू की विभिन्न शिकायत की थी उन्होंने बार-बार उच्च कार्यालय में आवेदन दिया था कि भुनेश्वर प्रसाद साहू के तानाशाह रवैया से वह बहुत परेशान है मानसिक रूप से बहुत प्रताड़ित हैं और राष्ट्रपति से इच्छा मृत्यु की मांग की थी, शासन ने पीड़ित को ही संस्था से हटा दिया और जिस दिन आदेश जारी हुआ उसी दिन उन्हें कार्य मुक्त भी कर दिया गया व्याख्याता सुरेश प्रसाद साहू के दूसरी संस्था में जाने के बाद ही उनका 6 दिन का वेतन भुगतान किया गया यह भुवनेश्वर प्रसाद साहू के तानाशाह का जीता जागता उदाहरण है व्याख्याता के वैध अवकाश भुगतान को लटकाए रखना दोहरे मापदंड की ओर इशारा करता है।

3 अगस्त की उपस्थिति और हस्ताक्षर पर भी उठे प्रश्न
आरोप यह भी है कि भुनेश्वर प्रसाद साहू ने 3 अगस्त 2026 को DIET में कार्यभार ग्रहण करने संबंधी कार्रवाई की, जबकि संस्था के कुछ कर्मचारियों के अनुसार उस दिन वे कार्यालय में उपस्थित नहीं थे। यदि यह दावा सही है तो उपस्थिति पंजिका, कार्यभार ग्रहण पत्र, जावक पंजी, CCTV फुटेज और संबंधित दस्तावेजों की जांच से स्थिति स्वतः स्पष्ट हो सकती है।

ऐसे मामलों में आरोप-प्रत्यारोप से अधिक महत्वपूर्ण है कि रिकॉर्ड की जांच कर वास्तविक तथ्य जनता के सामने रखे जाएं।

‘प्रभारी प्राचार्य’ की भूमिका को लेकर मूल सवाल
पूरे विवाद का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि शासन द्वारा प्रतिनियुक्ति समाप्त किए जाने के बाद भुनेश्वर प्रसाद साहू की DIET में वास्तविक प्रशासनिक स्थिति क्या थी?

यदि वे प्रतिनियुक्ति समाप्त होने के बाद सहायक प्राध्यापक के पद पर वापस आ चुके थे, तो उन्हें प्रभारी प्राचार्य के अधिकार किस आदेश के तहत प्राप्त थे?* यदि कोई लिखित आदेश था तो वह सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? और यदि कोई लिखित आदेश नहीं था तो उनके द्वारा प्रभारी प्राचार्य की सील, हस्ताक्षर अथवा प्रशासनिक आदेश जारी किए जाने का आधार क्या था? क्या उच्च कार्यालय ने ठान लिया है कि भुनेश्वर प्रसाद साहू जो मनचाहे वह करें उन पर किसी भी प्रकार की कार्यवाही नहीं की जाएगी इसके पूर्व भी पॉलिटेक्निक परीक्षा के दौरान भुनेश्वर प्रसाद साहू ने बिना सील लगाएं परीक्षा की जानकारी प्रेषित की थी और उसमें भी जानकारियां सही नहीं थी जिसके कारण कलेक्टर से भुनेश्वर प्रसाद साहू को कारण बताओं नोटिस जारी हुआ था इतनी बड़ी घोर लापरवाही के बावजूद भुनेश्वर प्रसाद साहू पर कोई कार्यवाही नहीं की गई उनके कारण बताओं नोटिस के जवाब और माफी नामा से ही उच्च अधिकारी संतुष्ट हो गए
यह प्रश्न केवल भुनेश्वर प्रसाद साहू से नहीं, बल्कि उन सभी अधिकारियों से पूछा जाना चाहिए जिनके संज्ञान में यह स्थिति होने के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई।

जिला शिक्षा अधिकारी एवं उपप्राचार्य की भूमिका पर सवाल
इस मामले में जिला शिक्षा अधिकारी अशोक सिन्हा की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि उच्च अधिकारियों द्वारा कार्यमुक्त करने के निर्देश दिए जाने की बात सामने आने के बावजूद कार्रवाई में विलंब हुआ।
यदि कलेक्टर स्तर से कार्यमुक्त करने का निर्देश दिया गया था, तो उसकी लिखित प्रति, आदेश की तारीख और अनुपालन की स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। वहीं यदि जिला शिक्षा अधिकारी का मत था कि दोनों अधिकारी समकक्ष हैं और इसलिए कार्यमुक्त नहीं किया जा सकता, तो इस संबंध में विभागीय नियम और सक्षम प्राधिकारी का स्पष्ट आदेश सामने आना चाहिए।

उपप्राचार्य एल.के. पाण्डेय की भूमिका को लेकर भी आरोप लगाए गए हैं कि उन्होंने भुनेश्वर प्रसाद साहू को कार्यमुक्त नहीं किया। दूसरी ओर यह तर्क सामने आने की बात कही जा रही है कि वे प्रभारी प्राचार्य हैं और इसलिए उन्हें कार्यमुक्त नहीं किया जा सकता। उपप्राचार्य स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि मैं उप प्राचार्य हूं और वह प्रभारी प्राचार्य है क्या प्रभारी प्राचार्य कोई पद होता है वास्तविक पद में दोनों सहायक प्राध्यापक हैं और पांडे जी भुवनेश्वर प्रसाद साहू से वरिष्ठ हैं यह कहां से यह नियम बता रहे हैं कि एल के पांडे जिनका मूल पद सहायक अध्यापक है वर्तमान में उपप्राचार्य के पद पर हैं भुनेश्वर प्रसाद साहू जो वर्तमान में मूल पद सहायक प्राध्यापक हैं को कार्य मुक्त नहीं कर सकते स्पष्ट है कि पांडे और भुनेश्वर प्रसाद साहू की मिलीभगत चल रही है शासनादेश की व्याख्या मौखिक बातचीत से नहीं, लिखित नियम और आदेश से होनी चाहिए।

अपर कलेक्टर के कथित बयान और हाईकोर्ट की कार्यवाही

मामले में अपर कलेक्टर शशि चौधरी के नाम से यह बात सामने आ रही है कि जब तक नियमित प्राचार्य नहीं आता, तब तक भुनेश्वर प्रसाद साहू प्रभारी प्राचार्य के रूप में कार्य कर सकते हैं। यदि ऐसा कोई प्रशासनिक मत या आदेश वास्तव में दिया गया है, तो उसे लिखित रूप में स्पष्ट किया जाना चाहिए।
यह भी दावा किया जा रहा है कि भुनेश्वर प्रसाद साहू ने अपनी प्रतिनियुक्ति समाप्त किए जाने के शासन आदेश को

चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था और उनकी याचिका WPS 4704 of 2026 खारिज हो गई। यदि न्यायालय मैं याचिका खारिज होने के बावजूद भुनेश्वर प्रसाद साहू स्वयं को प्रभारी प्राचार्य के तौर पर संस्था में पेश कर रहे हैं और प्रभारी प्राचार्य का सी लगाकर हस्ताक्षर किए जा रहे हैं तो वह हाई कोर्ट के आदेश की भी अवहेलना किया जा रहे हैं तब क्या उच्च कार्यालय को इन पर कार्यवाही नहीं की जानी चाहिए वर्तमान पदस्थापना की स्थिति के आधार पर विभाग को तत्काल यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनकी वर्तमान वैधानिक स्थिति क्या है।
दूसरे कर्मचारियों के लिए अलग और साहू के लिए अलग नियम?

मामले में एक कर्मचारी के स्थानांतरण और कार्यमुक्ति का उदाहरण भी सामने रखा जा रहा है। आरोप है कि स्थानांतरण आदेश में नाम संबंधी त्रुटि होने के बावजूद उन्हें तत्काल कार्यमुक्त कर दिया गया, जबकि भुनेश्वर प्रसाद साहू के मामले में लंबे समय से कार्यमुक्ति की प्रक्रिया लंबित है।

यदि दोनों मामलों में परिस्थितियां समान थीं, तो अलग-अलग प्रशासनिक व्यवहार का कारण भी स्पष्ट किया जाना चाहिए। संस्था की वरिष्ठ व्याख्याता रमा गोस्वामी उनकी प्रताड़ना से प्रताड़ित होकर नींद की गोली खा ली थी SP जांजगीर के आदेश पर इनकी जांच हुई थी यह जांच प्रतिवेदन रमा गोस्वामी को सूचना के अधिकार मांगने पर कई महीने उपरांत प्राप्त हुआ इस जांच प्रतिवेदन को देखकर कोई भी बता सकता है कि यह जांच प्रतिवेदन फर्जी है इस जांच प्रतिवेदन में बीपी साहू को निर्दोष बताया गया है एवं अंतिम में पेन से लिखा गया है की शिकायत तथ्यहीन है जबकि रमा गोस्वामी पुणे 5 दिन प्रशिक्षण में गई थी यह सत्य है प्रशिक्षण में रमा गोस्वामी राज्य शैक्षिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान परिषद रायपुर एवं यशदा पुणे के आदेश से गई थी उच्च कार्यालय के आदेश के बाद भी रिलीविंग ना मिलने पर यह वरिष्ठ व्याख्याता तत्कालीन कलेक्टर के मौखिक आदेश एवं तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी के लिखित मार्किंग से प्रशिक्षण में गई थी जांच के समय रमा गोस्वामी ने इन दस्तावेजों को संलग्न किया था बावजूद इसके पहले ही बिंदु में लिखा गया है कि रमा गोस्वामी का नाम नहीं होने के कारण उन्हें नहीं भेजा गया ऐसी झूठी रिपोर्ट बनाने का दुस्साहस कैसे किया जा सकता है इन वरिष्ठ व्याख्याता का गोपनीय प्रतिवेदन भुनेश्वर प्रसाद साहू द्वारा खराब किया गया जबकि उनके पास अध्यापन के अलावा कोई स्वतंत्र प्रभार नहीं है यहां तक की वरिष्ठ व्याख्याता होने के बावजूद उन्हें किसी भी प्रकार का प्रशिक्षण कार्य न दिया जाता है ना ही प्रशिक्षण लेने के लिए कहीं बाहर भेजा जा रहा है बल्कि वरिष्ठ व्याख्याता संस्था में बैठे रहते हैं और संस्था की प्रयोगशाला सहायिका को प्रशिक्षण लेने के लिए भेजा जाता है इस तरीके का वरिष्ठ व्याख्याता के रहते हुए प्रयोगशाला सहायक को प्रशिक्षण में भेजने का शासकीय नियमों के विरुद्ध कार्य भुनेश्वर प्रसाद साहू करते हैं और जांच प्रतिवेदन बनता है की शिकायत तथ्यहीन है गोपनीय प्रतिवेदन खराब किए जाने का दस्तावेज भी रमा गोस्वामी ने संलग्न किया था जांच प्रतिवेदन के एक बिंदु में लिखा गया है कि रमा गोस्वामी के साथ दुर्व्यवहार की कई कर्मचारियों ने जानकारी में अनभिज्ञता दिखाई है इसका साफ अर्थ है कि कई कर्मचारियों ने बताया है कि रमा गोस्वामी के साथ दुर्व्यवहार होता था यदि किसी महिला के साथ किसी भी प्रकार के मानसिक प्रताड़ना से संबंधित या किसी भी प्रकार का अप्रिय व्यवहार होता है तो किसी एक की गवाही ही पर्याप्त होती है लेकिन जांच अधिकारियों की रिपोर्ट के अनुसार तो यहां बहुमत होना चाहिए अगर बहुमत नहीं है तो फिर इस सत्य नहीं मानेंगे क्या यहां जांच कार्य न होकर किसी भी प्रकार का चुनाव कार्य चल रहा था क्या विभागीय नियम व्यक्ति देखकर बदलते हैं?
जांच प्रतिवेदन की

विश्वसनीयता एवं निष्पक्ष जांच की मांग
भुनेश्वर प्रसाद साहू से संबंधित पूर्व जांच प्रतिवेदन को लेकर भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि कथित रूप से एक ऐसा प्रतिवेदन प्रसारित किया जा रहा है जिसकी प्रामाणिकता संदिग्ध है। यदि कोई जांच प्रतिवेदन वास्तव में विभाग द्वारा जारी किया गया है तो प्रत्येक पृष्ठ में उसका पत्र क्रमांक, दिनांक और हस्ताक्षर सत्यापित होना चाहिए। परंतु उक्त जांच प्रतिवेदन में दो पृष्ठ में जांच अधिकारियों का हस्ताक्षर ही नहीं है अंतिम पेज में जांच अधिकारियों का हस्ताक्षर है परंतु वह हस्ताक्षर टाइप किए हुए शब्दों से बहुत दूर है इस प्रकार से बहुत गेप में जांच अधिकारी क्यों साइन करेंगे विभिन्न शिकायतों के आधार पर भुनेश्वर प्रसाद साहू की प्रतिनियुक्ति समाप्त कर शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पौड़ी दलहा में उन्हें प्राचार्य पद पर स्थापना दी गई क्या शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पौड़ी दलहा का महत्व नहीं है क्या उस विद्यालय को प्राचार्य की आवश्यकता नहीं है यदि वहां प्राचार्य का पद खाली है और भुनेश्वर प्रसाद साहू को वहां भेजा गया तो शासन को अपनी जिम्मेदारी तय करते हुए भुनेश्वर प्रसाद साहू को उस संस्था के लिए तुरंत ही कार्य मुक्त करना चाहिए था क्या वहां के विद्यार्थियों का कोई महत्व नहीं जो प्राचार्य विहीन विद्यालय में अध्यापन कर रहे हैं

*संस्था की विशाखा समिति में भी भुनेश्वर प्रसाद साहू द्वारा नियम विरुद्ध कार्य किया गया :- डाइट जांजगीर की विशाखा समिति अर्थात महिला उत्पीड़न समिति में शासकीय नियमानुसार संस्था की वरिष्ठ महिला व्याख्याता को इस समिति की पीठासीन अधिकारी बनाया जाता है परंतु भुनेश्वर प्रसाद साहू जब से प्रभारी प्राचार्य के रूप में कार्य कर रहे हैं स्थाई रूप से उन्होंने संस्था की व्याख्याता कल्याणी बोस को पीठासीन अधिकारी बना कर रखा है जबकि कल्याणी बोस से वरिष्ठ व्याख्याता क्रमशः रमा गोस्वामी एवं प्रतिमा साहू है कल्याणी बोस को यह पद स्थाई रूप से 4 साल से प्राप्त है जैसे कि वह इस पद पर नौकरी कर रही है जबकि वह वहां कनिष्ठ व्याख्याता है एवं कल्याणी बोस के पद के बारे में यह भी स्पष्ट नहीं है कि वह प्रतिनियुक्ति में है या संस्था में व्यवस्था के तौर पर कार्यरत हैं
संस्था के कर्मचारियों को प्रभार देने में भी भुवनेश्वर प्रसाद साहू द्वारा मनमानी एवं तानाशाह पूर्ण रवैया अपनाया जाता है :-
संस्था में सात क्लर्क की नियुक्ति है परंतु में क्लर्क को इनके समर्थ के अनुसार कार्य नहीं दिया जाता उनके पद के अनुसार कार्य नहीं दिया जाता प्रभार भी उनके पद के अनुसार नहीं दिया गया है अतः लिपिक खाली बैठे रहते हैं इसका स्पष्ट अर्थ है कि भुनेश्वर प्रसाद साहू लिपिक की उपादेेयता शासन के अनुसार नहीं स्वयं तय करते हैं संस्था में वरिष्ठ व्याख्याता एवं सहायक प्राध्यापक के होते हुए कनिष्ठ व्याख्याता जो मात्र संस्था में 4 महीने पूर्व कार्यभार ग्रहण किए थे एवं संस्था में पहले से कार्यरत व्याख्याता एवं सहायक प्राध्यापक से कनिष्ठ हैं एवं उनके पास M.Ed या एम ए इन एजुकेशन की डिग्री नहीं है परंतु उन्हें विभिन्न गंभीर विषयों से संबंधित प्रभार प्रदान किए गए हैं ज्ञात होगी जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान में कार्य करने की अर्हता M.Ed या एम इन एजुकेशन है यहां पर वरिष्ठ व्याख्याता एवं सहायक प्राध्यापक की उपादेयता भी भुनेश्वर प्रसाद साहू मनमाने ढंग से तय करते हैं इन कर्मचारियों को शासकीय नियम अनुसार स्वयं कार्य नहीं देते फिर बाहर प्रचार करते हैं कि यह खाली बैठे रहते हैं कार्य नहीं करते ज्ञात हो संस्था में वरिष्ठ व्याख्याता के पास संगीत से संबंधित सर्टिफिकेट है बावजूद इसके बाहर से संगीत शिक्षक बुलवाकर विद्यार्थियों को संगीत शिक्षण दिया जा रहा है जबकि व्याख्याता ने स्वयं ही इसकी मांग की थी कि मैं संगीत की शिक्षा प्रदान कर सकती हूं कृपया मुझे सांस्कृतिक प्रभारी का प्रभार दे दीजिए

ज्ञात सूत्रों से जानकारी हुई है
जिसमें विशेष रूप से इन बिंदुओं को शामिल किया जाए:
11 जून 2026 के शासनादेश के बाद भुनेश्वर प्रसाद साहू की वास्तविक पदस्थापना और कार्यमुक्ति की स्थिति।

16 से 19 जून के बीच किए गए कथित वित्तीय कार्य और जारी चेक।

94 दिनों के लघुकृत अवकाश की स्वीकृति, उसका वेतन आहरण तथा 10 अगस्त से पुनः लीव पर जाने की वैधानिकता।

व्याख्याता सुरेश साहू के जून 2025 के 6 दिनों के अर्जित अवकाश (Earned Leave) का भुगतान रोके जाने का कारण।

DDO/वित्तीय प्रभार का हस्तांतरण न होना और कर्मचारियों के जुलाई माह के वेतन में हुई देरी।

3 अगस्त की कथित उपस्थिति, हस्ताक्षर, जावक पंजी एवं CCTV फुटेज की सत्यता।

प्रभारी प्राचार्य की सील हस्ताक्षर से जारी आदेशों की वैधानिकता और हाईकोर्ट के आदेश का अनुपालन।

जांच प्रतिवेदन की वास्तविकता सबके समक्ष आनी चाहिए क्योंकि यही जांच प्रतिवेदन को भुनेश्वर प्रसाद साहू दिखा दिखा कर कहते हैं कि देखो मैं तो निर्दोष हूं

सवाल बड़ा है—व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था के भरोसे का
सरकारी संस्थान किसी व्यक्ति की निजी जागीर नहीं होते। पद, अधिकार और जिम्मेदारियां शासन के नियमों से तय होती हैं उच्च पद पर बैठे जिम्मेदार अधिकारियों को भुनेश्वर प्रसाद साहू के कार्य मुक्त न होने पर भुनेश्वर प्रसाद साहू पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
जांजगीर की जनता और DIET के कर्मचारी अब यही जानना चाहते हैं—आखिर शासन का आदेश बड़ा है या किसी व्यक्ति का प्रभाव?

अशोक सिन्हा जिला शिक्षा अधिकारी जिला जांजगीर चांपा छत्तीसगढ़
उन लोग मेरे अधीनस्थ नहीं आते ज्वाइन डायरेक्टर के अधीनस्थ आते हैं जॉइंट डायरेक्टर उन पर कार्रवाई कर सकता है मेरे को कलेक्टर द्वारा लेटर प्राप्त जरूर हुआ है परंतु हम दोनों अधिकारी समान पद पर है अतःमैं उन पर कारवाई नहीं कर सकता

 कलेक्टर जन्मेजय महोबे जांजगीर चांपा जिला जांजगीर चांपा छत्तीसगढ़
उच्च शिक्षा विभाग से उनके स्थानांतरण की कार्यवाही की जानकारी मिल चुकी है इस संबंध में आप जिला शिक्षा अधिकारी से बात कर लीजिए

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