इंसान के अनेक रूप और स्वरूप होते हैं,
उसके अनगिन रंग और प्रतिरूप होते हैं।
वह कभी एक ही रूप में दिखाई नहीं देता,
जब चाहे अपना रूप और रंग बदल लेता है।
कभी कठोर तो कभी कोमल हो जाता है,
कभी उग्र तो कभी विनम्र नज़र आता है।
बातों में कभी मिठास, कभी कड़वाहट होती है,
व्यवहार में कभी आत्मीयता, कभी कुटिलता होती है।
रिश्ते कभी मधुर, तो कभी कटु बना लेता है,
जब सब उसके मन का हो, तब खुश होता है।
स्वार्थ की आँधी चले तो रंग बदल जाता है,
मतलब निकलते ही अपना भी पराया हो जाता है।
चेहरे पर मुस्कान, मन में कितने राज़ रखता है,
हर किसी के सामने अलग-अलग अंदाज़ रखता है।
वक़्त बदलते ही रिश्तों के मायने बदल जाते हैं,
जो कल अपने थे, आज बेगाने नज़र आते हैं।
इंसान को पहचानना सचमुच कठिन होता है,
उसके बदलते रूप को देख हर कोई चकित होता है।
वह चाहता है कोई उसकी बुराई न करे,
उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई बात न करे।
चाहे वह स्वयं सही हो या फिर ग़लत,
बस उसकी हर बात में सबकी “हाँ” हो हर वक़्त।
यही तो मनुष्य-स्वभाव का अनोखा रंग होता है,
बाहर कुछ और, भीतर कुछ और ढंग होता है।
चेहरे नहीं, चरित्र की पहचान कीजिए,
इंसान को सदा उसके कर्मों से जानिए।
समय ही इंसान का असली परिचय कराता है,
हर चेहरा धीरे-धीरे अपना सच बताता है।
रूप, रंग और वाणी से धोखा मत खाइए,
इंसान को उसके चरित्र और कर्मों से पहचानिए।
✍️: राजकुमार सोनी, नया रायपुर







