विशेष जन-जागरूकता आलेख – अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी
रायपुर। किसी बच्चे के हाथ में नशीला पदार्थ पहुंचने की कहानी हमेशा नशे से शुरू नहीं होती। कई बार इसकी शुरुआत एक दोस्ती से होती है, कभी किसी चुनौती से, कभी किसी उपहार से और कभी इस विश्वास से कि “यह काम तो बहुत छोटा है।” यही वह बिंदु है जहां माता-पिता की सजगता बच्चे को एक गंभीर खतरे से बचा सकती है।
आज बच्चों को नशे से बचाने की चर्चा करते समय केवल नशे के सेवन पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। उतना ही महत्वपूर्ण सवाल यह है कि बच्चा नशीले पदार्थों के अवैध कारोबार के संपर्क में कैसे आ रहा है और कहीं उसे इस कारोबार में इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा?
नशे का अवैध कारोबार करने वाले लोग अपने लाभ के लिए ऐसे व्यक्तियों की तलाश कर सकते हैं जिन पर संदेह कम हो। किशोरों और युवाओं की उम्र, उनकी जिज्ञासा, मित्रता और सीमित आर्थिक जरूरतों का गलत फायदा उठाया जा सकता है। इसलिए बच्चों को नशे का सेवन करने से रोकने के साथ-साथ उन्हें यह भी सिखाना होगा कि किसी अनजान व्यक्ति का सामान, पैकेट, पार्सल या संदिग्ध वस्तु किसी दूसरे स्थान तक पहुंचाने का काम कभी स्वीकार न करें।
“सिर्फ एक बार” वाली सोच से शुरू होता खतरा
किशोरावस्था में निर्णय लेने की क्षमता अभी विकसित हो रही होती है। दोस्त का दबाव कई बार परिवार की सलाह से अधिक प्रभावी लग सकता है। बच्चा सोचता है कि एक बार प्रयोग करने में कोई नुकसान नहीं है।
लेकिन नशे की समस्या में सबसे खतरनाक बात यही है कि शुरुआत अक्सर गंभीर दिखाई नहीं देती।
एक बार का प्रयोग आदत में बदल सकता है और आदत आर्थिक तथा सामाजिक निर्भरता में। इसके बाद बच्चा ऐसे लोगों के संपर्क में आ सकता है जिनका उद्देश्य केवल नशा कराना नहीं, बल्कि नशे के लिए नए ग्राहक और माध्यम तैयार करना होता है।
नशे का कारोबार बच्चों को कैसे अपने घेरे में ला सकता है?
बच्चे को शुरुआत में यह कहा जा सकता है कि किसी व्यक्ति तक एक पैकेट पहुंचाना है, किसी को सामान देना है या किसी के लिए कुछ लेकर जाना है। बदले में पैसे या किसी अन्य लाभ का लालच दिया जा सकता है।
किशोर को यह भी बताया जा सकता है कि “इसमें कोई जोखिम नहीं है” या “तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा।”
यहीं अभिभावकों को अपने बच्चों को स्पष्ट रूप से समझाना चाहिए कि किसी अनजान व्यक्ति का पैकेट या सामान बिना जाने-समझे ले जाना अथवा पहुंचाना सुरक्षित नहीं है।
बच्चे को यह अधिकार और आत्मविश्वास दिया जाना चाहिए कि वह ऐसी स्थिति में सीधे “नहीं” कह सके और परिवार या किसी भरोसेमंद वयस्क को इसकी जानकारी दे।
बच्चे से निगरानी नहीं, विश्वास का रिश्ता बनाइए
नशे के खतरे से निपटने में परिवार की सबसे बड़ी ताकत है—संवाद।
यदि बच्चा यह सोचता है कि कोई समस्या बताने पर उसे तुरंत डांटा जाएगा, मोबाइल छीन लिया जाएगा या उसकी पिटाई होगी, तो वह समस्या छिपाने की कोशिश कर सकता है।
इसके विपरीत यदि उसे यह भरोसा हो कि—
“पहले मुझे बताओ, समाधान बाद में मिलकर निकालेंगे”
तो वह खतरे की स्थिति में परिवार तक जल्दी पहुंच सकता है।
माता-पिता को बच्चों के मित्रों, उनकी दिनचर्या, स्कूल के बाहर की गतिविधियों और ऑनलाइन संपर्कों को समझना चाहिए। इसका उद्देश्य बच्चे की निजता समाप्त करना नहीं, बल्कि उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिए।
मोबाइल की स्क्रीन के पीछे भी हो सकती है गलत संगति
बच्चों की दुनिया अब घर और स्कूल तक सीमित नहीं है। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने संपर्क की दुनिया को बहुत बड़ा बना दिया है।
इसलिए बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि इंटरनेट पर किसी अनजान व्यक्ति से मिली दोस्ती अपने-आप में विश्वास का आधार नहीं है। किसी व्यक्ति द्वारा पैसे, नशीला पदार्थ, संदिग्ध सामान या “आसान कमाई” का प्रस्ताव दिया जाए तो तुरंत परिवार को बताना चाहिए।
माता-पिता को भी बच्चों के ऑनलाइन व्यवहार को लेकर केवल प्रतिबंध लगाने के बजाय डिजिटल सुरक्षा के बारे में समझाना चाहिए।
स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं, सुरक्षा का केंद्र भी है
स्कूल में नशा-विरोधी शिक्षा केवल पोस्टर और भाषण तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
बच्चों को व्यावहारिक परिस्थितियों के उदाहरण देकर समझाया जाना चाहिए—
यदि कोई दोस्त नशा करने को कहे तो क्या करें?
यदि कोई संदिग्ध पैकेट पहुंचाने के लिए पैसे दे तो क्या करें?
यदि कोई ऑनलाइन व्यक्ति धमकाए या लालच दे तो किसे बताएं?
इन सवालों के जवाब बच्चे को पहले से मालूम होंगे तो वास्तविक परिस्थिति में उसके गलत निर्णय लेने की संभावना कम होगी।
माता-पिता किन बदलावों को गंभीरता से लें?
बच्चे के व्यवहार में अचानक और लगातार बदलाव दिखाई दे तो उसे केवल “उम्र का असर” मानकर छोड़ना उचित नहीं है।
पढ़ाई में अचानक गिरावट, नई संदिग्ध संगति, असामान्य खर्च, बार-बार पैसे की मांग, परिवार से दूरी, अत्यधिक गोपनीयता, दिनचर्या में बदलाव या किसी नए समूह के प्रति असामान्य आकर्षण जैसे संकेतों पर शांतिपूर्वक ध्यान देना चाहिए।
इनमें से कोई एक संकेत नशे का प्रमाण नहीं है। लेकिन कई बदलाव एक साथ दिखाई दें तो बच्चे से बातचीत और आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञ की सहायता लेना समझदारी होगी।
विशेष बॉक्स | बच्चे को ये 7 बातें जरूर सिखाएं
1. किसी के कहने पर नशे का प्रयोग नहीं करना है।
2. अनजान व्यक्ति का पैकेट या सामान नहीं ले जाना है।
3. “आसान पैसे” के लालच में कोई संदिग्ध काम नहीं करना है।
4. ऑनलाइन मिले व्यक्ति पर बिना जांच भरोसा नहीं करना है।
5. कोई धमकाए तो बात छिपानी नहीं है।
6. परेशानी होने पर तुरंत माता-पिता, शिक्षक या भरोसेमंद व्यक्ति को बताना है।
7. किसी गलत काम में फंस जाने पर डरकर अकेले निर्णय नहीं लेना है।
कानून की जानकारी बच्चों की सुरक्षा का हिस्सा बने
नशीले पदार्थों से संबंधित अवैध गतिविधियों पर भारत में NDPS Act, 1985 के तहत गंभीर कानूनी प्रावधान हैं। इसलिए बच्चों और किशोरों को यह समझाना आवश्यक है कि नशीले पदार्थों से जुड़ी गतिविधियां केवल “मजाक” या “दोस्त की मदद” का विषय नहीं हैं।
हालांकि किसी बच्चे की स्थिति का कानूनी मूल्यांकन हमेशा मामले के विशिष्ट तथ्यों, उसकी उम्र, भूमिका, जानकारी और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए। इसलिए यदि बच्चा किसी संदिग्ध गतिविधि में फंस गया हो तो परिवार को घबराने या उसे छिपाने के बजाय समय पर उचित कानूनी और आवश्यक अन्य सहायता लेनी चाहिए।
समाज को भी बदलना होगा नजरिया
नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस की कार्रवाई से पूरी नहीं होगी। मोहल्ले, स्कूल, अभिभावक, सामाजिक संगठन और युवा स्वयं इस प्रयास का हिस्सा बनें तो परिणाम अधिक प्रभावी हो सकता है।
समाज को यह भी समझना होगा कि नशे की समस्या से प्रभावित बच्चे को केवल बदनाम करना समाधान नहीं है। जहां बच्चा पीड़ित या लत से प्रभावित है, वहां समय पर सहायता, उपचार और पुनर्वास की आवश्यकता हो सकती है। वहीं नशीले पदार्थों के अवैध कारोबार में सक्रिय लोगों के विरुद्ध कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई आवश्यक है।
आज बच्चे से पांच मिनट की बातचीत, कल की बड़ी परेशानी रोक सकती है
बच्चे को यह बताने के लिए किसी घटना का इंतजार करने की जरूरत नहीं कि नशा उसके जीवन को कैसे प्रभावित कर सकता है।
माता-पिता आज ही उससे पूछ सकते हैं—
“अगर कोई तुम्हें नशा करने को कहे तो तुम क्या करोगे?”
“अगर कोई तुम्हें पैसे देकर कोई संदिग्ध पैकेट पहुंचाने को कहे तो तुम किसे बताओगे?”
“अगर कोई तुम्हें धमकाए तो क्या तुम हमसे बात करोगे?”
इन सवालों के जवाब बच्चे को केवल नशे से नहीं, बल्कि नशे के कारोबार के जाल से भी बचाने में मदद कर सकते हैं।
अंतिम संदेश
अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी के अनुसार, बच्चों की सुरक्षा का अर्थ केवल उन्हें गलत चीजों से दूर रखना नहीं है। उन्हें इतना जागरूक और आत्मविश्वासी बनाना भी जरूरी है कि वे गलत प्रस्ताव को पहचान सकें, उसे ठुकरा सकें और खतरे की स्थिति में तुरंत सहायता मांग सकें।
बच्चों को नशे से बचाना उनके आज की रक्षा है, लेकिन उन्हें नशे के कारोबार से दूर रखना उनके पूरे भविष्य की रक्षा है।
“बच्चे को डराकर नहीं, समझाकर सुरक्षित बनाइए; क्योंकि जागरूक बच्चा ही नशे के जाल की सबसे मजबूत कड़ी तोड़ सकता है।”
— देव प्रसाद जोशी
अधिवक्ता, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय
मो.: 9893354327







