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नशामुक्ति अभियान की चमक के बीच शिव सहिस की मौत का सवाल

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जांजगीर चांपा संवाददाता – राजेन्द्र जायसवाल
क्या सफाई अभियान से मिट जाएगा कस्टडी मौत का दर्द? जनप्रतिनिधियों और प्रशासन से जनता पूछ रही जवाब
 जिला जांजगीर-चांपा चांपा ।
चांपा मेहंदीपारा में 17 सितंबर को पुलिस प्रशासन द्वारा नशामुक्ति, स्वच्छता और सामाजिक जागरूकता का अभियान चलाया गया। महिला कमांडो का गठन किया गया, नागरिकों को नशे से दूर रहने का संदेश दिया गया और मेहंदीपारा को आदर्श मोहल्ला बनाने का संकल्प लिया गया। अभियान की तस्वीरें और संदेश निश्चित रूप से समाज के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इसी मेहंदीपारा की गलियों में कुछ दिन पहले हुई एक मौत का सवाल अभी भी लोगों के बीच अनुत्तरित है।
शिव सहिस की पुलिस हिरासत में तबीयत बिगड़ने के बाद मौत ने पूरे चांपा को झकझोर दिया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, शिव सहिस को शराब से जुड़े मामले में हिरासत में लिया गया था। बाद में उसकी तबीयत बिगड़ी और अस्पताल में उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। परिजनों ने हिरासत में मारपीट और प्रताड़ना के आरोप लगाए, जबकि पुलिस की ओर से तबीयत बिगड़ने के अलग कारण बताए गए। मामले की वास्तविकता जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से स्पष्ट होना बाकी है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—जिस मेहंदीपारा में आज नशे के खिलाफ जनजागरण किया जा रहा है, उसी मोहल्ले के एक परिवार का बेटा पुलिस हिरासत में जान गंवा बैठा, तो उस परिवार के दर्द और उसके सवालों का समाधान कौन करेगा?
 
सफाई अभियान जरूरी, लेकिन जवाबदेही उससे भी जरूरी
मेहंदीपारा की सड़कों की सफाई होनी चाहिए। नशे के खिलाफ अभियान चलना चाहिए। महिला कमांडो का गठन भी सामाजिक भागीदारी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। लेकिन किसी मोहल्ले की वास्तविक तस्वीर केवल झाड़ू लगाने और जागरूकता कार्यक्रम करने से नहीं बदलती।
जनता के भरोसे की सफाई भी उतनी ही जरूरी है।
कस्टडी में हुई मौत जैसे गंभीर मामले में लोगों को यह जानने का अधिकार है कि आखिर हिरासत में क्या हुआ? शिव सहिस की तबीयत कब बिगड़ी? उसे तत्काल चिकित्सा सहायता कब मिली? पुलिस अभिरक्षा में मौजूद अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका क्या थी? जांच में क्या सामने आया? और यदि किसी स्तर पर लापरवाही या कानून का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
इन सवालों के जवाब जांच पूरी होने के बाद सामने आने चाहिए—और सार्वजनिक रूप से स्पष्ट भी किए जाने चाहिए।
कार्रवाई हुई, लेकिन क्या पीड़ित परिवार को न्याय मिला?
रिपोर्टों के अनुसार मामले में पुलिस अधीक्षक द्वारा एक आरक्षक को निलंबित किया गया तथा बाद में थाना प्रभारी समेत तीन पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर किए जाने की जानकारी सामने आई है।
लेकिन विभागीय कार्रवाई और न्याय दो अलग-अलग बातें हैं।
एक परिवार का कमाने वाला सदस्य चला गया। पत्नी और बच्चों के सामने भविष्य का सवाल खड़ा है। ऐसे में केवल पुलिस विभाग की आंतरिक कार्रवाई को अंतिम समाधान नहीं माना जा सकता। परिवार को कानूनी अधिकारों के अनुरूप सहायता, निष्पक्ष जांच और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई—इन सभी पहलुओं पर स्पष्ट व्यवस्था दिखाई देनी चाहिए।
राजनीति की तस्वीर कहाँ थी?
इस पूरे घटनाक्रम में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की सक्रिय भूमिका को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। जब किसी गरीब परिवार के घर का चिराग बुझ जाता है, तब राजनीतिक दलों के लिए केवल संवेदना व्यक्त करना पर्याप्त नहीं होना चाहिए।
जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी केवल कार्यक्रमों में शामिल होना नहीं, बल्कि संकट के समय पीड़ित परिवार के साथ खड़ा होना भी है।
यदि भाजपा हो या कांग्रेस—जनता के लिए दोनों से सवाल एक ही है: जब एक गरीब परिवार न्याय के लिए दर-दर भटकता है, तब उसकी आवाज कौन बनेगा?
किसी दल विशेष के पक्ष या विपक्ष में जाने के बजाय जनता को यह देखना होगा कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि इस मामले में परिवार की कानूनी, आर्थिक और सामाजिक मदद के लिए क्या ठोस पहल करते हैं।
नशामुक्ति का संदेश तभी प्रभावी होगा, जब भरोसा भी कायम हो
नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस की नहीं, पूरे समाज की लड़ाई है। लेकिन इस लड़ाई की सफलता के लिए पुलिस और जनता के बीच विश्वास जरूरी है।
मेहंदीपारा को आदर्श मोहल्ला बनाने का संकल्प तभी सार्थक होगा, जब वहां रहने वाले लोगों को यह भरोसा भी मिले कि कानून सबके लिए समान है, हिरासत में लिए गए व्यक्ति के अधिकार सुरक्षित हैं और किसी भी शिकायत की निष्पक्ष जांच होगी।
शिव सहिस की मौत को लेकर जो भी आरोप हैं, उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दोषी कौन है, यह जांच तय करे—लेकिन जांच ऐसी हो कि पीड़ित परिवार और आम जनता दोनों को उस पर विश्वास हो।
अब दिखावे की नहीं, जवाबदेही की जरूरत
आज मेहंदीपारा में झाड़ू चल रही है। महिला कमांडो का गठन हो रहा है। नशामुक्त समाज का संकल्प लिया जा रहा है। यह सब अच्छी पहल है।
लेकिन एक तरफ सफाई अभियान और दूसरी तरफ न्याय की तलाश में बैठा परिवार—इन दोनों तस्वीरों को साथ रखकर देखना होगा।
शासन-प्रशासन को यह समझना होगा कि जनता केवल आयोजन नहीं चाहती। जनता जवाब चाहती है। जनता पारदर्शिता चाहती है। जनता चाहती है कि शिव सहिस की मौत की जांच निष्पक्ष तरीके से पूरी हो और यदि किसी की जिम्मेदारी सामने आती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो।
मेहंदीपारा को आदर्श मोहल्ला बनाने से पहले वहां के लोगों के मन में पैदा हुए सवालों का समाधान जरूरी है।
क्योंकि
“नशामुक्त समाज–स्वस्थ समाज” का सपना तभी पूरा होगा, जब उसके साथ “

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