-पिता बिसाहूदास महंत को मुख्यमंत्री बनने से रोकने के लिए रची गई थी साजिश—नेता प्रतिपक्ष का सनसनीखेज खुलासा
– पनिका समाज की आदिवासी दर्जे में बहाली के लिए एकजुट संघर्ष का आह्वान
बसंत राघव/जगदलपुर। पनिका समाज की ऐतिहासिक पहचान, आदिवासी अस्मिता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े एक गंभीर प्रश्न को उठाते हुए छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने दावा किया है कि पनिका मूलतः आदिम जनजाति है और उसे 8 दिसंबर 1971 को षड्यंत्रपूर्वक अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर कर दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके पिता स्वर्गीय बिसाहूदास महंत को मुख्यमंत्री बनने से रोकने के राजनीतिक दुराशय से यह कदम उठाया गया था। डॉ. महंत ने पनिका समाज को उसकी आदिवासी पहचान की बहाली के लिए संगठित होकर संघर्ष करने का आह्वान किया।
आंध्रा भवन, जगदलपुर में पनिका समाज बस्तर द्वारा आयोजित सम्मेलन को संबोधित करते हुए डॉ. महंत ने कहा कि पनिका समाज अविभाजित मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजाति की सूची में सम्मिलित रहा था, लेकिन 8 दिसंबर 1971 से उसकी स्थिति बदल गई। उन्होंने इस घटनाक्रम को समाज के ऐतिहासिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय बताते हुए इसके पीछे राजनीतिक षड्यंत्र होने का आरोप लगाया।
पिता की राजनीतिक संभावनाओं से जोड़कर उठाया 1971 का सवाल
डॉ. महंत ने अपने संबोधन में कहा कि उनके पिता स्वर्गीय बिसाहूदास महंत वर्ष 1969 में अविभाजित मध्य प्रदेश की सरकार में कैबिनेट मंत्री बने थे और उस समय वे आदिवासी समुदाय से संबंधित थे। डॉ. महंत के अनुसार, उनके पिता के भविष्य में मुख्यमंत्री बनने की प्रबल संभावनाएँ थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें इस पद तक पहुँचने से रोकने के उद्देश्य से पनिका जाति को अनुसूचित जनजाति की सूची से हटाने की रणनीति अपनाई गई। डॉ. महंत का यह वक्तव्य पनिका समाज की सामाजिक पहचान और राजनीतिक इतिहास से जुड़े सवालों को नए सिरे से चर्चा में लाता है।
पनिका समाज की वापसी से आदिवासी एकता और सशक्त होगी
डॉ. महंत ने कहा कि आज भी कुछ आदिवासी नेता पनिका जाति की अनुसूचित जनजाति की सूची में वापसी के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने इस दृष्टिकोण पर असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि पनिका समाज की बहाली से आदिवासी समाज की एकजुटता और मजबूती बढ़ सकती है।
उन्होंने अपने संबोधन में छत्तीसगढ़ में आदिवासी आबादी का उल्लेख करते हुए कहा कि पनिका समाज को भी इसमें सम्मिलित किए जाने से आदिवासी समाज की संख्या और सामूहिक शक्ति बढ़ेगी। डॉ. महंत ने स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की आबादी 32 प्रतिशत है। इसमें पनिका जाति की 3 प्रतिशत आबादी जुड़ने से कुल आदिवासी आबादी 35 प्रतिशत हो जाएगी।
विधानसभा में अशासकीय संकल्प पारित कराने का किया उल्लेख
डॉ. महंत ने बताया कि छत्तीसगढ़ विधानसभा के अध्यक्ष के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने पनिका जाति को अनुसूचित जनजाति की सूची में पुनः सम्मिलित करने के संबंध में अशासकीय संकल्प पारित कराया था, जिसे आगे की कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार को भेजा गया। उन्होंने यह भी बताया कि सांसद के रूप में उन्होंने इस विषय पर केंद्र सरकार से पत्राचार किया था।
इन प्रयासों का उल्लेख करते हुए उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि पनिका समाज को अपनी माँग के समर्थन में एकजुट होकर लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से संघर्ष करना चाहिए।
बस्तर विधायक लखेश्वर बघेल ने पनिका समाज की ऐतिहासिक भूमिका रेखांकित की
सम्मेलन को संबोधित करते हुए बस्तर के विधायक लखेश्वर बघेल ने पनिका जाति को बुनकर समुदाय बताते हुए उसकी ऐतिहासिक भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पनिका समाज ने आदिवासी समुदायों को वस्त्र उपलब्ध कराने और उन्हें पहनने की परंपरा विकसित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके वक्तव्य ने पनिका समाज की सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक कौशल और जनजातीय जीवन से उसके ऐतिहासिक संबंधों के महत्त्व को रेखांकित किया।
‘द हिस्ट्री ऑफ पणी समुदाय’ का लोकार्पण
सम्मेलन से पूर्व डॉ. चरणदास महंत काछन गुड़ी स्थल पहुँचे, जहाँ उन्होंने पूजा-अर्चना की। इस अवसर पर उन्होंने ‘द हिस्ट्री ऑफ पणी समुदाय’ पुस्तक का लोकार्पण भी किया। पनिका समाज बस्तर की ओर से उन्हें उनके पिता स्वर्गीय बिसाहूदास महंत की आवक्ष काष्ठ प्रतिमा भेंट कर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में सत्य निज नाम बोध संस्थान, पोंडी (राछा), जिला जांजगीर के प्रवर्तक संत कबड्डीदास मंचासीन रहे।
देश के विभिन्न क्षेत्रों से पहुँचे समाज के प्रतिनिधि
सम्मेलन में समाज के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. देवधर महंत, वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. फूलदास महंत तथा कोरबा सांसद ज्योत्सना महंत के प्रतिनिधि पोषक महंत विशेष रूप से उपस्थित रहे। छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के साथ अन्य प्रांतों से भी पनिका समाज के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
इस अवसर पर वंशधारी संवरा, सुमित दास, पुरस्कृत शिक्षक टीकादास, डॉ. बरसाइतदास महंत, सोनभद्र के गायक मुनेश्वर पनिका तथा ओडिशा के भुवनेश्वर मानिकपुरी सहित विभिन्न संगठनों के पदाधिकारी एवं समाजसेवी उपस्थित रहे। कार्यक्रम को सफल बनाने में धरमू कश्यप, प्रेमसागर पंथ, लीलेश्वर पनिका और शंकर राव ने अथक प्रयास किया।
अब केंद्र सरकार की भूमिका पर टिकी निगाहें
जगदलपुर का यह सम्मेलन पनिका समाज की ऐतिहासिक पहचान, अनुसूचित जनजाति की सूची में पुनः शामिल किए जाने की माँग और संवैधानिक अधिकारों के प्रश्न को सामने लाने वाला महत्त्वपूर्ण आयोजन रहा। डॉ. चरणदास महंत के वक्तव्य ने इस मुद्दे पर राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक विमर्श को आगे बढ़ाने की आवश्यकता रेखांकित की है।
अब महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि पनिका समाज की माँग के समर्थन में उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों, पूर्ववर्ती सरकारी सूचियों और विधायी दस्तावेजों की समीक्षा के आधार पर केंद्र सरकार क्या कदम उठाती है। समाज की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि उसकी माँग को संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से किस दिशा में आगे बढ़ाया जाता है।







