संवाददाता – राजेन्द्र जायसवाल
भीड़ संभालने में नाकाम रहे वॉलंटियर और पुलिस
व्यवस्था पर उठे सवाल, छोटे बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ का आरोप
अगर भगदड़ या मारपीट में किसी की जान चली गई, तो जिम्मेदारी कौन लेगा—दुर्गा उत्सव समिति या पुलिस प्रशासन?
जिला जांजगीर-चांपा नैला-जांजगीर, छत्तीसगढ़।
नवरात्रि का पर्व मां दुर्गा की आराधना, आस्था, श्रद्धा और सामाजिक एकता का प्रतीक है। लेकिन जब धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती और भीड़ के बीच मारपीट की नौबत आ जाती है, तब आस्था के इस पावन पर्व की व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। नैला स्थित श्री श्री श्री दुर्गा उत्सव समिति के आयोजन में सप्तमी की रात सामने आई कथित अव्यवस्था ने श्रद्धालुओं की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, सप्तमी की रात लगभग 8 बजे श्री श्री श्री दुर्गा उत्सव समिति नैला में माता के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए समिति की ओर से वॉलंटियर तैनात किए गए थे तथा पुलिस प्रशासन की मौजूदगी भी बताई गई है। इसके बावजूद भीड़ को व्यवस्थित करने में परेशानी होने और श्रद्धालुओं के बीच लात-घूंसे चलने की घटना सामने आने की बात कही जा रही है।
भीड़ को समझाने के बजाय मारपीट की नौबत क्यों आई?
सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब धार्मिक आयोजन में हजारों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना रहती है, तब भीड़ प्रबंधन की ठोस व्यवस्था क्यों नहीं की गई? यदि किसी स्थान पर भीड़ बढ़ रही थी, तो उसे नियंत्रित करने के लिए वॉलंटियरों और पुलिसकर्मियों ने समय रहते प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए?
आरोप है कि विवाद की स्थिति में कुछ वॉलंटियर श्रद्धालुओं को समझाने और स्थिति शांत करने के बजाय मारपीट पर उतारू हो गए। यदि यह आरोप जांच में सही पाया जाता है, तो यह धार्मिक आयोजन में तैनात जिम्मेदार लोगों की भूमिका पर गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।
वॉलंटियरों की जिम्मेदारी श्रद्धालुओं को सुरक्षित रास्ता दिखाना, भीड़ को कतारबद्ध करना, बुजुर्गों और बच्चों की सहायता करना तथा किसी भी विवाद की स्थिति में शांति बनाए रखने में सहयोग करना है। उन्हें कानून अपने हाथ में लेने या बल प्रयोग करने का अधिकार नहीं है।

छोटे-छोटे बच्चे भी मौजूद थे, हादसा होता तो कौन लेता जिम्मेदारी?
नवरात्रि के दौरान माता के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में महिलाएं, बुजुर्ग और छोटे-छोटे बच्चे पहुंचते हैं। ऐसे में भीड़ के बीच मारपीट की स्थिति पैदा होना किसी बड़े हादसे को निमंत्रण देने जैसा हो सकता है।
यदि मारपीट के दौरान कोई बच्चा गिर जाता, किसी महिला या बुजुर्ग को चोट लग जाती अथवा भीड़ में भगदड़ मच जाती, तो इसका जिम्मेदार कौन होता? क्या आयोजन समिति इसकी जिम्मेदारी लेती या पुलिस प्रशासन जवाबदेह होता?
ये सवाल केवल किसी एक समिति से जवाब मांगने के लिए नहीं, बल्कि धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाए जा रहे हैं।
समिति के बड़े पदाधिकारी कहां थे?
श्रद्धालुओं का आरोप है कि जब आयोजन स्थल पर भीड़ बढ़ रही थी और विवाद की स्थिति बन रही थी, तब समिति के बड़े पदाधिकारी मौके पर उपस्थित नहीं थे। यदि यह बात सही है, तो यह भी जांच का विषय है कि आयोजन की जिम्मेदारी संभालने वाले पदाधिकारी संकट के समय मौके पर क्यों नहीं पहुंचे।
किसी भी बड़े धार्मिक आयोजन की सफलता केवल भव्य पंडाल, आकर्षक सजावट और धार्मिक कार्यक्रमों से तय नहीं होती। वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि श्रद्धालु कितनी सुरक्षित व्यवस्था में दर्शन कर पाते हैं और किसी अप्रिय घटना की स्थिति में आयोजक कितनी तत्परता से स्थिति संभालते हैं।
समिति के पदाधिकारियों को स्पष्ट करना चाहिए कि भीड़ नियंत्रण के लिए कितने वॉलंटियर तैनात किए गए थे, उन्हें क्या निर्देश दिए गए थे और विवाद की स्थिति में शांति स्थापित करने के लिए क्या कदम उठाए गए।
पुलिस प्रशासन की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
धार्मिक आयोजन में कानून-व्यवस्था बनाए रखना और किसी संभावित दुर्घटना को रोकने के लिए समय रहते आवश्यक कदम उठाना महत्वपूर्ण है। यदि आयोजन स्थल पर भीड़ बेकाबू हो रही थी, तो पुलिस प्रशासन ने उसे नियंत्रित करने के लिए क्या व्यवस्था की थी? क्या पर्याप्त पुलिस बल तैनात था? क्या प्रवेश और निकास के लिए अलग-अलग रास्तों की व्यवस्था थी? क्या संवेदनशील स्थानों पर निगरानी रखी जा रही थी?
इन सवालों का जवाब संबंधित अधिकारियों को देना चाहिए।
हालांकि, घटना के संबंध में पुलिस की वास्तविक तैनाती, अधिकारियों की मौजूदगी और कार्रवाई की स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक परिस्थितियों को सामने लाया जाना चाहिए।
आस्था के नाम पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं होनी चाहिए
मां दुर्गा के दरबार में श्रद्धालु शांति, विश्वास और भक्ति के साथ पहुंचते हैं। वे किसी विवाद या मारपीट का सामना करने के लिए नहीं आते। धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा व्यवस्था को केवल औपचारिकता समझना उचित नहीं है।
यदि आयोजक भारी भीड़ जुटाते हैं, तो उनके लिए आवश्यक है कि वे पर्याप्त प्रशिक्षित वॉलंटियर, व्यवस्थित कतारें, आपातकालीन निकास, प्राथमिक उपचार और पुलिस प्रशासन के साथ बेहतर समन्वय सुनिश्चित करें। वहीं प्रशासन को भी आयोजन की परिस्थितियों के अनुसार सुरक्षा व्यवस्था का आकलन करना चाहिए।
निष्पक्ष जांच हो, जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाए
श्री श्री श्री दुर्गा उत्सव समिति नैला में सप्तमी की रात हुई कथित मारपीट और भीड़ प्रबंधन में सामने आई समस्याओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। आयोजन स्थल के सीसीटीवी फुटेज, उपलब्ध वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान के आधार पर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि विवाद कैसे शुरू हुआ, मारपीट में किन लोगों की भूमिका थी और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए गए।
यदि किसी वॉलंटियर, आयोजक या अन्य व्यक्ति की गलती सामने आती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही पुलिस प्रशासन को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आगामी धार्मिक आयोजनों में ऐसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो।
सबसे बड़ा सवाल—श्रद्धालुओं की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?
नैला की इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालुओं की सुरक्षा आखिर किसकी प्राथमिकता है? आयोजन समिति की, वॉलंटियरों की या पुलिस प्रशासन की?
आस्था के इस महापर्व में किसी की जान जाने के बाद जिम्मेदारी तय करने से बेहतर है कि समय रहते व्यवस्थाओं को दुरुस्त किया जाए। मां दुर्गा के दरबार में आने वाला प्रत्येक श्रद्धालु सुरक्षित दर्शन का हकदार है। श्रद्धा के नाम पर अव्यवस्था, मारपीट और सुरक्षा संबंधी लापरवाही के आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
अब देखना यह होगा कि संबंधित समिति और पुलिस प्रशासन इन गंभीर सवालों पर क्या जवाब देते हैं तथा श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या ठोस कदम उठाते हैं।







