जिला जांजगीर-चांपा,
जांजगीर चांपा के बलौदा जनपद पंचायत में हरियाली अमावस्या और हरेली जैसे प्रकृति-समर्पित पर्वों पर जब आमतौर पर लोग अपने-अपने घरों में पारंपरिक उत्सव मनाने में व्यस्त रहते हैं, ऐसे समय में जांजगीर चांपा जिले के बलौदा ब्लॉक से एक अनुकरणीय उदाहरण सामने आया है। जनपद पंचायत बलौदा के पूर्व अध्यक्ष एवं जिला कांग्रेस कमेटी जांजगीर चांपा के महामंत्री श्री कन्हैया राठौर ने इन पर्वों की सार्थकता को समझते हुए पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सशक्त संदेश दिया।
श्री राठौर ने हरियाली अमावस्या व हरेली के पावन अवसर पर तालाब की मेड़ पर पीपल और बरगद जैसे छायादार व पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत उपयोगी वृक्षों का रोपण किया। पीपल व बरगद दोनों ही वृक्ष न केवल प्राचीन भारतीय संस्कृति में पूजनीय माने जाते हैं, बल्कि ये अधिक मात्रा में ऑक्सीजन छोड़ने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आमजन को दिया संदेश:
राठौर ने इस मौके पर कहा कि—
> “जल है तो जंगल है, जंगल है तो जीवन है।”
उन्होंने क्षेत्रवासियों से आग्रह किया कि हर परिवार का मुखिया कम से कम एक पेड़ प्रतिवर्ष जरूर लगाए। उनका मानना है कि यह संकल्प न केवल पर्यावरण को सुरक्षित रखने में मदद करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी शुद्ध वायु और प्राकृतिक संसाधनों की गारंटी बनेगा।
घर-घर जल संरक्षण की अपील:
श्री राठौर ने जल संकट की ओर भी ध्यान आकर्षित करते हुए सभी नागरिकों से आग्रह किया कि वे अपने घरों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम जरूर बनवाएं। उन्होंने कहा कि—
> “जल संरक्षण और वृक्षारोपण दोनों ही प्रकृति की रक्षा के दो मजबूत स्तंभ हैं। अगर आज हम सावधानी नहीं बरतेंगे, तो भविष्य में जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को लेकर गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।”
हरियाली पर्व को दिया नया अर्थ:
जहां एक ओर हरेली पर्व कृषि संस्कृति और प्रकृति के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है, वहीं श्री कन्हैया राठौर की यह पहल इस पर्व को एक सामाजिक जागरूकता अभियान का रूप देती है। यह प्रेरणास्पद उदाहरण अन्य जनप्रतिनिधियों और आम लोगों के लिए भी एक मार्गदर्शक बन सकता है।
संदेश और कार्य केवल एक प्रतीकात्मक वृक्षारोपण नहीं, बल्कि पर्यावरणीय जागरूकता
श्री राठौर का यह संदेश और कार्य केवल एक प्रतीकात्मक वृक्षारोपण नहीं, बल्कि पर्यावरणीय जागरूकता की एक मजबूत नींव है। अगर हर नागरिक वर्ष में एक वृक्ष लगाए और जल संरक्षण के प्रति सजग हो जाए, तो जांजगीर चांपा ही नहीं, संपूर्ण देश एक हरित क्रांति की ओर अग्रसर हो सकता है।
“प्रकृति की रक्षा = अपनी रक्षा” — यह भाव हमें न केवल समझने, बल्कि अपनाने की आवश्यकता है। 🌱









