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बसवेश्वर जयंती : समानता, न्याय और मानवता के महान अग्रदूत का पावन पर्व

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बसवेश्वर जी का जीवन परिचय

बसवेश्वर जी का जन्म लगभग 1131 ई. में कर्नाटक के बागेवाड़ी (वर्तमान Basavana Bagewadi) में हुआ था। उनके पिता का नाम मदिराज और माता का नाम मदालंबिका था। बचपन से ही वे धार्मिक और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे, लेकिन उन्होंने समाज में फैली जाति व्यवस्था, अंधविश्वास और भेदभाव का विरोध किया।

उन्होंने Kalyana (वर्तमान बसवकल्याण) में राजा बीज्जल के दरबार में मंत्री के रूप में कार्य किया। अपने पद का उपयोग उन्होंने समाज सुधार के लिए किया।

उनके विचार और शिक्षाएं

बसवेश्वर जी ने “कायकवे कैलासा” (काम ही पूजा है) का सिद्धांत दिया। उनका मानना था कि व्यक्ति को ईमानदारी से अपना कार्य करना चाहिए और समाज के लिए योगदान देना चाहिए।
उन्होंने भक्ति को सरल बनाया और कहा कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए किसी विशेष जाति या कर्मकांड की आवश्यकता नहीं है।

उन्होंने “अनुभव मंटप” की स्थापना की, जो एक प्रकार की आध्यात्मिक संसद थी, जहाँ सभी वर्गों के लोग अपने विचार साझा करते थे।

समाज सुधार में योगदान

बसवेश्वर जी ने कई महत्वपूर्ण सामाजिक सुधार किए:

  • जाति व्यवस्था का विरोध
  • महिलाओं को समान अधिकार
  • श्रम और कार्य को सम्मान
  • धार्मिक अंधविश्वासों का खंडन

उनकी शिक्षाओं से Lingayatism धर्म का विकास हुआ, जो समानता और भक्ति पर आधारित है।

बसवेश्वर जयंती का महत्व

बसवेश्वर जयंती हर वर्ष वैशाख महीने में मनाई जाती है। इस दिन उनके अनुयायी और श्रद्धालु:

  • उनके उपदेशों का स्मरण करते हैं
  • शोभायात्राएँ निकालते हैं
  • भजन और प्रवचन आयोजित करते हैं
  • समाज सेवा के कार्य करते हैं

कर्नाटक, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में यह दिन सार्वजनिक अवकाश के रूप में भी मनाया जाता है।

 

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