”मिलते-जुलते रहिए”
एक-दूसरे का दरवाज़ा खटखटाते रहिए,
इसके लिए आपस में प्रतियोगिता न कीजिए।
बिना वजह मिलते रहिए, जब भी मौक़ा मिले,
कोई न आए मिलने, तो ख़ुद ही चले जाइए।
वक़्त का पता नहीं होता, मुस्कुराते रहिए,
और एक-दूसरे का हाल हमेशा पूछते रहिए।
कोई अफ़सोस न रह जाए, कोई बात अधूरी न रह जाए,
इसलिए बहाने बनाते रहिए, संपर्क बनाए रखिए।
बात ‘मैं’ या ‘तू’ पहले की नहीं होती है,
रिश्तों में प्रेम रहे, बस इतना ख़याल रखिए।
✍️: राजकुमार सोनी, रायपुर (छत्तीसगढ़)








