“पेट अगर भरा हो तो क्रांति नहीं होती…”* यह पंक्ति आज के दौर में शिक्षा विभाग और उससे जुड़े लाखों शिक्षकों की स्थिति पर बिल्कुल सटीक बैठती है। एक समय था जब शिक्षक का काम सिर्फ पढ़ाना और राष्ट्र का निर्माण करना था। लेकिन आज? आज का शिक्षक समस्याओं के एक ऐसे भंवर में फंसा है, जहाँ से निकलने का रास्ता उसे खुद दिखाई नहीं दे रहा।
स्कूल से घर और घर से स्कूल: सीमित होती जिंदगी
रामचंद्र सोनवंशी एक शिक्षक का आवाज
आज का शिक्षक उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच चुका है जहाँ शरीर थकने लगा है और जिम्मेदारियाँ बढ़ने लगी हैं। किसी को पदोन्नति का इंतजार है, तो कोई क्रमोन्नति के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। किसी की पारिवारिक समस्याएँ हैं, तो कोई कर्ज के बोझ तले दबा है। किसी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता, तो कोई अपने घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थानांतरण की आस में बैठा है।
इस स्थिति में, जब जिंदगी सिर्फ ‘घर से स्कूल और स्कूल से घर’** तक सीमित होकर रह गई है, तो वो थका-हारा शिक्षक अपनी गुहार लेकर आखिर कहाँ-कहाँ जाए? 20 साल पहले की स्थिति और आज की स्थिति में जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है। तब व्यवस्थाओं में थोड़ी आत्मीयता थी, आज सिर्फ नियमों की औपचारिकताएं हैं।
TET का तनाव: आज प्राथमिक, कल उच्च माध्यमिक?
समस्याएँ तो जीवनभर रहेंगी, लेकिन आज के तारीख में जो सबसे बड़ी तलवार शिक्षकों के सिर पर लटक रही है, वह है TET पास होने की अनिवार्यता। आज यह चुनौती प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल के शिक्षकों के सामने खड़ी है। लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (*NEP 2020)का दायरा आंगनबाड़ी से लेकर कॉलेज तक फैल चुका है। ऐसे में वह दिन दूर नहीं जब कल हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी वाले शिक्षकों के लिए भी ऐसे ही कड़े और नए नियम लागू कर दिए जाएं। जो शिक्षक 15-20 साल से अपनी सेवा दे रहे हैं, उन्हें उम्र के इस मोड़ पर परीक्षा के तराजू में तौला जा रहा है। किसी ने भी नहीं सोचा था कि साल 2025-2026 शिक्षकों के लिए इतना मुश्किलों भरा और मानसिक तनाव का समय लेकर आएगा।
एकजुटता ही एकमात्र विकल्प
नियम बदलते रहेंगे, चुनौतियाँ बढ़ती रहेंगी। अगर आज हम अपनी-अपनी व्यक्तिगत समस्याओं (लोन, बीमारी, ट्रांसफर) में ही उलझे रहे, तो आने वाला कल और भी अंधकारमय हो सकता है। अन्यथा जैसा कि डर है—’क्या से क्या हो जाएगा, कोई ठिकाना नहीं है। बढ़िया तब होगा जब पूरे देश और राज्य के शिक्षक अपने छोटे-मोटे मतभेदों और व्यक्तिगत चिंताओं से ऊपर उठकर एकजुट हों। जब तक शिक्षक समाज एक सुर में अपनी आवाज बुलंद नहीं करेगा, तब तक इन अव्यावहारिक कानूनों और नियमों को वापस कराना असंभव होगा। यह लड़ाई सिर्फ एक पद या परीक्षा की नहीं है, यह शिक्षक के आत्मसम्मान और उसके सुरक्षित भविष्य की लड़ाई है। अब समय आ गया है कि घर से स्कूल।के इस सफर को एक बार ‘सड़क के संघर्ष’ में बदला जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित हो सके।
शिक्षक की कलम से








