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रायपुर में सजी साहित्य की महफिल: 46वीं काव्य संध्या में कवियों ने बिखेरे शब्दों के रंग, श्रुति संघी के गीतों ने बांधा समां

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 लक्ष्मीनारायण लहरे/ रायपुर । साहित्य सृजन संस्थान की 46 वीं मासिक काव्य संध्या वृंदावन हॉल रायपुर में आयोजित हुई।कार्यक्रम में रायपुर सहित विभिन्न जिलों के कवि और शायर अपनी रचनाओं का पाठ कर जहां तालियां बटोरी वहीं गायिका श्रुति संघी जैन के गाए गीत ने पूरे हॉल में बैठे के श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर दिया।कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रहें पूर्व आईएएस डॉ संजय अलंग एवं विशिष्ठ अतिथि धर्मराज महापात्र राष्ट्रीय अध्यक्ष आल इंडिया इंश्योरेंस एम्पलाईज एसोसिएशन एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री राजकुमार धर द्विवेदी एवं अध्यक्षता वीर अजीत शर्मा, ने की।

इस अवसर पर श्वेता शर्मा मोना सर्वश्रेष्ठ रचनाकार सम्मान,धर्मराज महापात्र समाज सेवा एवं श्रुति संघी को संगीत सेवा सम्मान उनके उत्कृष्ट योगदान हेतु प्रदान किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता वीर अजीत शर्मा एवं सफल संचालन उमेश सोनी नयन द्वारा किया गया।
उपरोक्त जानकारी संस्था की महिला प्रकोष्ठ अध्यक्ष ममता खरे मधु ने दी ।कार्यक्रम में डॉ सुरेंद्र अहलूवालिया,अशोक खरे,शुभम साहू, विजया ठाकुर, एस एन जोशी,डॉक्टर चंद जैन,सतीश गुप्ता,अजय सोनी,आशा मानव,योगेंद्र ठाकुर,राहुल साहू,कल्याणी तिवारी कोकि,सूरज सोनी,लक्ष्मण सिंह राजपूत,विंदा पांचाल,रविश गुप्ता,मनोज जैन,सुरेंद्र रावल,शैलेन्द्र संघी,मंजू जैन,मन्नूलाल यदु,योगेश शर्मा योगी, एच एस ठाकुर,डॉ.सिद्धार्थ श्रीवास्तव,किशोर लालवानी,ने अपनी रचनाओं एवं उपस्थित होकर कार्यक्रम का आनंद लिया। कार्यक्रम में पहुंचे हुए साहित्यकारों ने एक से बढ़कर एक कविता पाठ किए वही वृंदावन हॉल कविताओं से गूंजता रहा । कवियों ने एक दूसरे की कविता का आनंद उठाए वही खूब प्रशंसा भी हुई । वही श्रुति की गीत ने मंच में चार चांद लगा दिए लोग भाव विभोर हो गए काब्य संध्या में प्रमुख रूप से कवियों ने पाठ किया जिसमें
“तलाश”
इस कठिनाई भरी जिंदगी में, खुशी के फुल कहाँ तलाश करूँ?
गर्मी की इस तपति जलती और चिलमिलाती धूप में, बारिश की बुदें कहाँ तलाश करूँ ।

श्रीमती रूनाली चक्रवर्ती
आज का आदमी ,
ऐसे कैसे जी रहा है ,
जबकि वह, एक दूसरे को ,
दूसरा तीसरे को ,
बिल्कुल नहीं पहचानता
उमाशंकर मिश्रा
बिलासपुर
विधि की तुम अनुपम संरचना,
तुम में यह सृष्टि समायी है
सुंदरता की प्रतिमूर्ति अहो
छवि जनमानस में छायी है
धरती से अंबर तलक “सकुति”
यह रूप अनूप सुहाया है
कुंदन सा बदन दमके अंग अंग
घूंघट में चन्द्र समाया है ||

सत्येन्द्र तिवारी ” सकुति “
तपती दोपहरी के बाद
जैसे बरसती भीगी शाम
आकर मृदु स्पंदन जगाए!
वही हां वैसे ही तुम मेरे
सूने से जीवन में आए।
बलजीत कौर
अपने ही अक्स से कतराने लगी हूं
आने वाली हर सुबह से घबराने लगी हूं

सुबह जो ले आता है रोज नई वारदात कहीं हिंसा कंही दहेज की आग।

प्रमदा ठाकुर
छोटी सी प्यारी सी सोन चिरैया
पंख पसारे नाचे ता ता थैया।
खुले नभ में फुर्र फुर्र उड़ती
छोटे नयनों को टुक टुक मटकाती।
डॉ साधना कसार महासमुंद
जनक नंदनी बनी है दुलहन,
हे राम आकर धनुष उठाओ,
हृदय में है बस तुम्हारी सूरत,
नयन बसी है छवि तुम्हारी,
है बाट ताकती जनक दुलारी,
वंदना ठाकुर
अक्सर मन की यह दुविधा मन को विचलित कर देती है
क्या मां ही केवल बच्चों का भविष्य बुन लेती है
पिता भीष्म सी नियती सहता इतिहास तो यही कहता है,
चुप्पी साधे कर्म जो करता,
कर्मयोगी ही पिता होता है।
विजया पांण्डेय
भाव शून्य हो गई है जनता,
अब सब कुछ सह जाती है।
कितना भी अन्याय देख ले,
बोल नहीं कुछ पाती है
शिवशंकर गुप्ता, रायपुर
हमारी महफिल में तुम जो आते
खुदा कसम तुमको मान जाते
नजर से नजरें जो चार होती
दिलों के मौसम भी जान जाते
डाॅ संध्या रानी शुक्ला
कातिलों से बस इतनी सी*गुज़ारिश है
मोहब्बत का नाम लेकर
मोहब्बत को बदनाम ना करो…
अगर निभा नहीं सकते
किसी का साथ तो किसी की जिंदगी का शाम मत करो
,मंजूषा अग्रवाल
जय हो मैया शारदा, दो विद्या सुन्दर टेर।
उजियारा फैलाओ, मिट जाए ये अंधेर।

सरल हृदय हो, मन्दिर सूरत।
जिसके भीतर, आपकी मूरत।
मेरे घर भी आओ, ले सुन्दर सुन्दर पैर।
उजियारा फैलाओ, मिट जाए ये अंधेर।

-अर्चना श्रीवास्तव-
ढूंढते हो अगर मेरे भीतर का मैं,
तुम जो पा जाओगे बात बन जाएगी।

जाने कितनों के ही चेहरे उतरे हुए,
तुम हँसा जाओगे बात बन जाएगी।

-रामचन्द्र श्रीवास्तव-
खुशियों की पोटली में
एक तारा है बेटियां
उम्मीदों की उड़ान भरकर
आसमान को छू रही है बेटियां
डॉ सुनीता पवार
उम्मीद की किरणों से जब सफर शुरू होता है,
मन में अनगिनत सपनों का दीपक जलता है।
हर राह नई लगती है, हर मंज़िल प्यारी होती है,
भोर की पहली आहट-सी दुनिया न्यारी होती है।
श्वेता शर्मा
इस ग्रंथ से बनते हैं आख्यान
इनसे निकलते हैं किस्से
इन किस्सों से सुनाए जाते हैं व्याख्यान
जो बनते हैं पुराख्यान
डॉ.संजय अलंग
कोई आंखों का तारा बन रहा है।
ग़रीबों का सहारा बन रहा है।।
जिसे ठुकरा दिया था वर्षों पहले
वही सेवक हमारा बन रहा है।।

~ राकेश तिवारी
खूबसूरत वादियों का नज़ार‍ा हो गया, यादों का रौशन सितारा हो गया।
न लगने दूँ कश्ती को दुनियां की नज़र बचालूं हर दामन आये जो कहर।
माझी बनकर आये तो किनारा हो गया।

ममता खरे’मधु’
समय की दौलत का,जब भी
बंटवारा होता है
रात के हिस्से में,अक्सर
अंधियारा होता है
दिन को मिल जाता,सूरज
उजियारा होता है
पर अंधकार में,जला दीप
ध्रुव तारा होता है

यशवंत कुमार चतुर्वेदी
उसकी आशिक़ी भी उम्र की तरह थी
जो निकल गयी तो फिर लौटी नही
मेरी मोहब्बत भी जिस्म की तरह थी
उम्र को कभी खुद से जुदा नहीं होने दिया नहीं
मनोज शुक्ला

रात की बाँहें फ़ैलती है
आँखों पर लग जाता हैं
नींद का पहरा ।
और खुल जाती हैं
इक दुकान सपनों की..

उमेश कुमार सोनी ‘नयन’

कंचन कुंडल शोभित कानन,देख यहाँ ऋतुराज लजाए।
झाँझर से लट मोहित सुंदर,रूप सजे प्रभु जी हरसाए।।

स्वर्णिम है ‘सुषमा’ अति सुंदर,यों वसुधा महती गुण पाए।
सौम्य सुधा रस पान करें तव,बाग उड़े भँवरे भरमाए।।

सुषमा प्रेम पटेल

कभी हॅ॑सना, कभी रोना, यही तो ज़िंदगानी है।
कभी खुशियों के आंसू तो, कभी ग़मगीन पानी है।

।। राजेंद्र रायपुरी।।

“अगर तुम प्रीत बन जाओ तुम्हारी रीत बन जाउँ,
जो तुम संगीत बन जाओ मै गजलें गीत बन जाउँ”
जितेंद्र पांचाल
सभी कवियों ने अपनी अपनी कविता से रंग भरा और अपनी कविताओं से नव संदेश दिए

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