रायपुर संवाददाता – रघुराज
रायपुर के पास सरकारी जमीनों पर बसे गरीब परिवारों के आशियानों को उजाड़ने की तैयारी चल रही है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सटे नवा रायपुर इलाके में इन दिनों भारी तनाव और डर का माहौल है। पिछले दिनों रायपुर के पास नकटी गांव में हुई तोड़फोड़ की बड़ी कार्रवाई के बाद अब इसके पास ही स्थित तूता गांव में प्रशासन का डंडा चलने वाला है। तूता गांव के करीब 35 परिवारों को प्रशासन की तरफ से घर खाली करने और अतिक्रमण हटाने का कड़ा नोटिस थमा दिया गया है। इस नोटिस के बाद से गांव के इन गरीब परिवारों के घरों में चूल्हे तक नहीं जल रहे हैं और लोग रात-दिन इसी चिंता में डूबे हैं कि उनका सिर छिपाने का एकमात्र सहारा भी अब उनसे छीन लिया जाएगा। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिन मकानों को अवैध और अतिक्रमण बताकर तोड़ने का नोटिस दिया गया है, उनमें से कुछ मकान प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनाए गए हैं। अब लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि अगर यह जमीन पूरी तरह से अवैध और अतिक्रमण की थी, तो सरकारी योजना के तहत यहां मकान बनाने के लिए पैसा और मंजूरी कैसे दे दी गई।
नवा रायपुर विकास प्राधिकरण की कार्रवाई और भूमि अधिग्रहण का पुराना दर्द
इस पूरे विवाद की जड़ें आज से कई साल पहले तब शुरू हुई थीं जब नवा रायपुर को एक चमचमाती और आधुनिक राजधानी के रूप में बसाने की योजना तैयार की गई थी। नवा रायपुर विकास प्राधिकरण यानी एनआरडीए ने इस क्षेत्र को विकसित करने के लिए आस-पास के दर्जनों गांवों की सैकड़ों एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि का अधिग्रहण कर लिया था। तूता गांव के स्थानीय निवासियों और बुजुर्गों का कहना है कि वे और उनके पूर्वज पीढ़ियों से इसी मिट्टी पर रहते आए हैं और यहीं खेती-किसानी करके अपना जीवन यापन करते थे। जब नवा रायपुर का निर्माण शुरू हुआ, तब सरकार ने कानून और भू-अर्जन नीतियों का हवाला देकर उनकी खेती की जमीनें ले लीं। ग्रामीणों का आरोप है कि वे अपनी जमीनें बेचना नहीं चाहते थे क्योंकि उनकी पूरी जिंदगी उसी खेती पर निर्भर थी, लेकिन सरकारी दबाव और विकास के नाम पर उनकी मर्जी के बिना उनकी पुश्तैनी जमीनें हड़प ली गईं। जमीन चले जाने के बाद ये किसान पूरी तरह से भूमिहीन हो गए।
पंच और सरपंच के भरोसे बसी थी गरीब जनता
पुश्तैनी कृषि भूमि छिन जाने के बाद तूता गांव के लोगों के पास कमाई का कोई जरिया नहीं बचा। समय बीतने के साथ-साथ इन परिवारों का आकार बढ़ता गया। जब एक ही घर में रहने वाले भाइयों के परिवार बढ़े और बच्चों की शादियां हुईं, तो उनके पास रहने के लिए जगह कम पड़ने लगी। चूंकि उनकी निजी जमीनें पहले ही सरकार ले चुकी थी, इसलिए उनके पास गांव की सरकारी या खाली पड़ी जमीनों पर शरण लेने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। ग्रामीणों के अनुसार, उस समय स्थानीय ग्राम पंचायत के पंच और सरपंचों ने मानवीय आधार पर और ग्रामीणों की बेबसी को देखते हुए उन्हें गांव की खाली पड़ी जमीनों पर अपने छोटे-छोटे मकान बनाने की मौखिक अनुमति दे दी थी। जनप्रतिनिधियों के कहने पर इन लोगों ने खून-पसीने की कमाई जोड़कर वहां अपने कच्चे-पक्के मकान खड़े कर लिए। लेकिन अब कई साल बीत जाने के बाद प्रशासन उसी जमीन को अवैध कब्जा बता रहा है और उन्हें वहां से बेदखल करने पर आमादा है।
नकटी गांव की तोड़फोड़ के बाद बढ़ा ग्रामीणों का खौफ
तूता गांव के लोगों के मन में यह डर ऐसे ही नहीं बैठा है। बीते दिनों रायपुर के पास ही स्थित नकटी गांव में प्रशासन ने भारी पुलिस बल के साथ मिलकर अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया था। वहां कई सालों से रह रहे गरीबों के घरों को पल भर में मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया गया था। नकटी में हुई इस दर्दनाक कार्रवाई की गूंज अभी शांत भी नहीं हुई थी कि अचानक तूता गांव में एक साथ 35 घरों को नोटिस जारी कर दिया गया। नकटी का मंजर देख चुके तूता गांव के लोग अब दहशत में हैं। उन्हें डर है कि किसी भी दिन प्रशासन के बुलडोज़र उनके गांव में दाखिल होंगे और उनकी जिंदगी भर की कमाई से बने आशियाने को मिट्टी में मिला देंगे। गांव की महिलाएं और बुजुर्ग प्रशासनिक अधिकारियों के सामने गुहार लगा रहे हैं कि वे कहां जाएं।
हम छत्तीसगढ़ के मूल निवासी हैं, फिर हमारे साथ ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों
तूता गांव के पीड़ित परिवारों का कहना है कि वे कोई बाहर से आए हुए घुसपैठिए नहीं हैं, बल्कि छत्तीसगढ़ के मूल निवासी हैं। उनके पास इस राज्य की नागरिकता के सारे दस्तावेज हैं, वे यहीं पैदा हुए और यहीं पले-बढ़े हैं। उनका कहना है कि जब सरकार बड़े-बड़े अमीर लोगों और उद्योगों को कौड़ियों के दाम पर जमीनें आवंटित कर देती है, तो अपने ही राज्य के गरीब और भूमिहीन छत्तीसगढ़िया लोगों के लिए उसके पास कुछ वर्गफुट जमीन भी नहीं है। ग्रामीणों ने रोते हुए अपनी आपबीती सुनाई कि एक तरफ तो सरकार से उनकी उपजाऊ जमीनें छीन लीं, जिससे वे दाने-दाने को मोहताज हो गए और जब उन्होंने अपनी बची-खुची जिंदगी को संवारने के लिए एक छोटा सा आशियाना बनाया, तो उसे भी तोड़ने की तैयारी की जा रही है। उनका सवाल है कि अगर सरकार गरीबों की ही जमीन छीनकर उन्हें बेघर कर देगी, तो गरीब जनता आखिर अपनी फरियाद लेकर किसके पास जाएगी।
पट्टा न मिलने की समस्या ने राज्यभर में बढ़ाई गरीबों की मुसीबत
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और शहरी इलाकों में पट्टा न मिलने की समस्या बहुत पुरानी और गंभीर है। राज्य में ऐसे लाखों परिवार हैं जो दशकों से सरकारी या नजूल जमीनों पर छोटे मकान बनाकर रह रहे हैं। कई बार स्थानीय स्तर पर पंच-सरपंच या पार्षद चुनाव के समय उन्हें आश्वासन दे देते हैं, लेकिन कागजी तौर पर उन्हें जमीन का मालिकाना हक यानी पट्टा नहीं मिल पाता। तूता गांव की यह कहानी भी इसी पट्टा न मिलने की ढुलमुल व्यवस्था का नतीजा है। जिन लोगों के पास पट्टा नहीं है, उनके सिर पर हमेशा बेदखली की तलवार लटकी रहती है। शासन-प्रशासन जब चाहे उन्हें अतिक्रमणकारी घोषित करके बेघर कर सकता है। तूता गांव के लोगों का कहना है कि सरकार को उनकी बेबसी समझनी चाहिए और उन्हें बेघर करने के बजाय उसी स्थान का पट्टा देकर उन्हें वैध कर देना चाहिए ताकि वे सम्मान से जी सकें।
सोशल मीडिया पर उठ रही है पीड़ितों के समर्थन में आवाज
इस पूरे मामले का एक वीडियो सोशल मीडिया पर आने के बाद लोगों में काफी नाराजगी देखी जा रही है। लोग लगातार इस पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं और सरकार से मांग कर रहे हैं कि विकास की इस अंधी दौड़ में गरीबों को इस तरह बेघर न किया जाए। यूज़र्स का कहना है कि यदि नवा रायपुर के निर्माण के समय इन ग्रामीणों की जमीनें ली गई थीं, तो सरकार की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह सबसे पहले इन विस्थापितों के रहने और रोजगार की मुकम्मल व्यवस्था करे। किसी को भूमिहीन बनाकर फिर उसे रहने के ठिकाने से भी वंचित कर देना किसी भी संवेदनशील समाज के लिए ठीक नहीं है।
तूता गांव के इस गंभीर मामले पर आपकी क्या राय है, क्या सरकार को इन गरीब छत्तीसगढ़िया परिवारों के घरों को तोड़ने के बजाय उन्हें पट्टा देकर वहीं बसाना चाहिए, अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें और इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि इन बेजुबान और बेबस लोगों की आवाज शासन के कानों तक पहुंच सके।








