जांजगीर-चांपा संवाददाता – राजेन्द्र जायसवाल
जिला मुख्यालय से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम पंचायत कुलीपोटा में सार्वजनिक निस्तारी तालाब पर कथित रूप से अवैध कब्जा कर तालाब को पाटकर दुकान निर्माण किए जाने का मामला सामने आया है। इस घटना ने जल संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि लगातार हो रहे अतिक्रमण के कारण तालाब का मूल स्वरूप तेजी से समाप्त होता जा रहा है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, जिस तालाब का उपयोग वर्षों से ग्रामीण निस्तारी, पशुओं के पेयजल तथा वर्षा जल संचयन के लिए करते रहे हैं, उसी तालाब की भूमि पर कुछ लोगों द्वारा अवैध रूप से कब्जा कर निर्माण कार्य किया जा रहा है। यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगी, तो आने वाले दिनों में तालाब पूरी तरह अपने अस्तित्व से हाथ धो सकता है।
ग्रामीणों का कहना है कि शासन के दिशा-निर्देशों तथा उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर दिए गए निर्देशों की भावना यही रही है कि सार्वजनिक जल स्रोतों, तालाबों और निस्तारी भूमि का संरक्षण किया जाए तथा उनके मूल स्वरूप से किसी प्रकार की छेड़छाड़ न हो। ऐसे में यदि तालाब की भूमि पर अवैध निर्माण किया जा रहा है, तो यह गंभीर जांच का विषय है।
मामले को लेकर जब
अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), जांजगीर से चर्चा की गई तो उन्होंने कहा, “मैं तहसीलदार एवं संबंधित पटवारी से जांच प्रतिवेदन मंगा रहा हूं। यदि जांच में तालाब का स्वरूप बदला जाना अथवा अवैध बेजा कब्जा पाया जाता है, तो नियमानुसार उचित कार्रवाई की जाएगी।”
एसडीएम के इस बयान से यह स्पष्ट है कि प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लिया है। अब लोगों की निगाहें जांच प्रतिवेदन पर टिकी हैं और उम्मीद की जा रही है कि यदि शिकायत सही पाई जाती है तो अतिक्रमण हटाकर तालाब को उसके मूल स्वरूप में संरक्षित किया जाएगा।
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन, राजस्व विभाग एवं जनपद पंचायत से मांग की है कि राजस्व अभिलेखों के आधार पर सीमांकन कराकर तालाब की वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जाए तथा यदि किसी भी प्रकार का अवैध कब्जा पाया जाए तो तत्काल हटाने की कार्रवाई की जाए। उनका कहना है कि सार्वजनिक जल स्रोतों की रक्षा करना केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति सामाजिक दायित्व भी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि तालाब केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि भू-जल स्तर बनाए रखने, पर्यावरण संतुलन कायम रखने और ग्रामीण जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। ऐसे जल स्रोतों पर बढ़ते अतिक्रमण को समय रहते नहीं रोका गया तो भविष्य में जल संकट और पर्यावरणीय समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच प्रतिवेदन में क्या तथ्य सामने आते हैं और जिला प्रशासन सार्वजनिक हित से जुड़े इस मामले में कितनी शीघ्र एवं प्रभावी कार्रवाई करता है।







