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छत्तीसगढ़ पुनर्वास नीति, 2007 लागू करने की मांग, कोल इंडिया की 2012 नीति लागू करना हाईकोर्ट के निर्णय के विपरीत : शशांक दुबे

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कोरबा | 07 अगस्त 2026

इंटक (INTUC) के जिला अध्यक्ष शशांक दुबे ने भारत सरकार के कोयला सचिव को विस्तृत अभ्यावेदन भेजकर मांग की है कि छत्तीसगढ़ में भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं रोजगार से जुड़े सभी मामलों में साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) द्वारा कोल इंडिया पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति, 2012 के स्थान पर छत्तीसगढ़ राज्य की आदर्श पुनर्वास नीति, 2007 को अनिवार्य रूप से लागू कराया जाए।

अभ्यावेदन में उल्लेख किया गया है कि छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर ने 17 जून 2026 को डब्ल्यूपीएस क्रमांक 4381/2019 (ज्योति बनाम एसईसीएल एवं अन्य) तथा डब्ल्यूपीएस क्रमांक 4393/2019 (पवन कुमार शुक्ला बनाम एसईसीएल एवं अन्य) में पारित अपने ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट रूप से कहा है कि जहां राज्य सरकार द्वारा पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन के लिए पृथक नीति बनाई गई है, वहां एसईसीएल उसी छत्तीसगढ़ पुनर्वास नीति, 2007 के अनुसार प्रभावित परिवारों के रोजगार एवं पुनर्वास संबंधी दावों पर निर्णय लेने के लिए बाध्य है। कोल इंडिया की 2012 की नीति को राज्य नीति पर प्राथमिकता देना कानूनन अस्थिर एवं अवैध है।

New Doc 08-06-2026 20.04

उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि जिला पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन समिति (DRRC) को राज्य सरकार की पुनर्वास नीति के प्रावधानों को बदलने, प्रतिस्थापित करने अथवा निष्प्रभावी करने का कोई अधिकार नहीं है। किसी प्रशासनिक निर्णय के आधार पर राज्य नीति के लाभ से प्रभावित परिवारों को वंचित नहीं किया जा सकता।

शशांक दुबे ने अपने अभ्यावेदन में बताया है कि छत्तीसगढ़ राज्य की आदर्श पुनर्वास नीति, 2007 का अंग्रेजी संस्करण 15 मई 2008 को राजपत्र में प्रकाशित हुआ था। इस नीति के खंड 7 (रोजगार एवं अन्य सुविधाएं) में स्पष्ट प्रावधान है कि औद्योगिक अथवा खनन परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहित होने पर पात्र विस्थापित परिवार के एक सदस्य को उसकी योग्यता एवं उपयुक्तता के अनुसार रोजगार दिया जाएगा। नीति में रोजगार के साथ प्रशिक्षण, स्वरोजगार, परिवहन व्यवसाय में प्राथमिकता, स्वयं सहायता समूहों को अवसर तथा अन्य पुनर्वास सुविधाओं का भी विस्तृत प्रावधान किया गया है।

अभ्यावेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय के पैरा 16 में स्पष्ट किया है कि राज्य पुनर्वास नीति, 2007 में कहीं भी रोजगार के लिए न्यूनतम भूमि स्वामित्व अथवा 0.54 एकड़ जैसी किसी सीमा का प्रावधान नहीं है। नीति केवल अधिग्रहित कृषि भूमि के प्रतिशत के आधार पर रोजगार में प्राथमिकता निर्धारित करती है। यदि किसी परिवार की संपूर्ण कृषि भूमि अधिग्रहित हुई है तो वह नीति के अनुसार रोजगार के लिए पात्र है।

उच्च न्यायालय ने एसईसीएल द्वारा 0.54 एकड़ न्यूनतम भूमि की शर्त लगाकर रोजगार से वंचित करने के तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि यह शर्त केवल कोल इंडिया की नीति में है, राज्य पुनर्वास नीति, 2007 में नहीं। इसलिए इस आधार पर रोजगार से इंकार करना विधिसम्मत नहीं है।

शशांक दुबे ने कहा कि उच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्णय के बावजूद यदि एसईसीएल अब भी कोल इंडिया पुनर्वास नीति, 2012 लागू कर प्रभावित परिवारों को रोजगार से वंचित कर रहा है, तो यह न केवल न्यायालय के निर्णय की भावना के विपरीत है बल्कि विस्थापित परिवारों के संवैधानिक एवं वैधानिक अधिकारों का भी उल्लंघन है।

उन्होंने कोयला मंत्रालय से मांग की है कि:

– छत्तीसगढ़ में संचालित कोल इंडिया एवं उसकी सभी सहायक कंपनियों को छत्तीसगढ़ राज्य की आदर्श पुनर्वास नीति, 2007 लागू करने के स्पष्ट निर्देश जारी किए जाएं।
– कोल इंडिया की 2012 की नीति के आधार पर अस्वीकृत सभी रोजगार प्रकरणों की पुनः समीक्षा कर राज्य नीति के अनुसार निर्णय लिया जाए।
– राज्य नीति के विपरीत जारी सभी आंतरिक आदेशों एवं प्रशासनिक निर्देशों को निरस्त किया जाए।
– उच्च न्यायालय के निर्णय का सभी परियोजनाओं में समान रूप से पालन सुनिश्चित किया जाए।

शशांक दुबे ने कहा कि भूमि गंवाने वाले परिवारों का पुनर्वास एवं रोजगार कोई दया या अनुग्रह का विषय नहीं, बल्कि उनका संवैधानिक, वैधानिक एवं मानवीय अधिकार है। उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि न्यायालय के निर्णय का अक्षरशः पालन सुनिश्चित कर हजारों विस्थापित परिवारों को न्याय दिलाया जाए।

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