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रायगढ़ कथक की विरासत में डॉ. बलदेव का योगदान, जिसे इतिहास कभी नहीं भुला सकता

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बसंत राघव –

किसी सांस्कृतिक परंपरा का इतिहास सिर्फ मंच पर अपना कला प्रदर्शन करने वाले कलाकारों से ही नहीं बनता। इसके पीछे वे लोग भी होते हैं जो उसकी बारीकियों को समझते हैं और अपनी किताबों या लेखों के ज़रिए उन्हें इतिहास का हिस्सा बनाते हैं। लेकिन दुख की बात है कि ऐसे लोगों के योगदान को अक्सर भुला दिया जाता है। आज की नई पीढ़ी उनके द्वारा रचित ग्रंथों का उपयोग करके अपनी समझ तो दिखाती है, लेकिन मूल लेखक और उनकी कृति को श्रेय देना भूल जाती है। डॉ. बलदेव के साथ जो हुआ, वह इसी कड़वी सच्चाई का एक बड़ा उदाहरण है।

अगर देखें तो रायगढ़ की कथक परंपरा का सफ़र भी सीधा-सपाट नहीं रहा है।
इस पूरे सफर में महाराजा चक्रधर सिंह का नाम सबसे पहले और बहुत ही स्वाभाविक रूप से जुबान पर आता है। वे सिर्फ कला का शौक रखने वाले राजा भर नहीं थे, बल्कि संगीत और नाच-गान को गहराई से समझने वाले एक सच्चे साधक और खोजी स्वभाव के थे। गाँव-देहात की गम्मत में भाग लेने वाले बालक कार्तिक और बर्मन उनकी खोज के परिणाम थे। उनके दरबार में देश के कोने-कोने से बड़े-बड़े गुणी कलाकार और कथक के उस्ताद खिंचे चले आते थे। उनके बीच जो बातचीत होती थी, रोज़ का रियाज़ और जो नए-नए तजुर्बे किए जाते थे, उसी ने रायगढ़ में कथक को एक बिल्कुल नया रास्ता दिखाया। इस नई शैली में कथक के पुराने घरानों की छाप तो साफ़ दिखती ही थी, साथ ही रायगढ़ की अपनी मौलिकता और रचने का नया अंदाज़ भी खुलकर सामने आया।

डॉ. बलदेव ने बाद में रायगढ़ कथक घराना अपने लेख की पृष्ठभूमि बताते हुए कहा था कि देश के अनेक प्रसिद्ध नर्तकों की प्रस्तुतियाँ देखने-परखने ,संगीत और नृत्य संबंधी साहित्य पढ़ने तथा नृत्यविदों से संवाद करने के साथ-साथ रायगढ़ के नर्तकों को देखने पर उन्हें उनकी शैली में एक पृथक विशिष्टता और नव्यता दिखाई दी। प्रसिद्ध कला-समीक्षक स्व. अनिल कुमार की प्रेरणा से उन्होंने इसी विशिष्टता और पार्थक्य पर लेख लिखा।

वर्ष 1979 में ‘रंग-संधान’ संपादक अनिल कुमार के द्वारा डॉ. बलदेव को भेजे गए पत्र में उनकी रचना का विषय स्पष्ट रूप से “मध्यप्रदेश में कथक : रायगढ़ घराना” दर्ज है। पत्र में उनकी रचना के प्रकाशन की सूचना भी मिलती है। यह दस्तावेज इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि इससे यह संकेत मिलता है कि सन्1979 तक रायगढ़ की कथक परंपरा को ‘रायगढ़ घराना’ के रूप में देखने और प्रस्तुत करने की अवधारणा उनके लेखन में स्पष्टत: से मूर्त रूप ले चुकी थी।

इसके बाद सितंबर 1980 में ‘संगीत’ पत्रिका में उनका मूल लेख ‘कथक : रायगढ़ घराना’ प्रकाशित हुआ।

उनका लेख चक्रधर कला परिषद, रायगढ़ में भी पढ़ा गया। उनके अनुसार, सेठ महावीर अग्रवाल और किशन डालमिया के संयोजन में आयोजित उस अवसर पर लेख को व्यापक समर्थन मिला। बाद में भोपाल में आयोजित ‘कथक शिविर’ में भी इसका वाचन हुआ।

इस प्रकार वर्ष 1979-80 के दस्तावेज और प्रकाशन एक ऐसी बौद्धिक प्रक्रिया की ओर संकेत करते हैं, जिसमें रायगढ़ की कथक परंपरा को केवल स्थानीय कला न मानकर उसकी विशिष्ट शैलीगत पहचान के साथ समझने और उसे ‘घराना’ के रूप में परिभाषित करने का उनके द्वारा अध्यवसाय किया जा रहा था।

उन्होंने रायगढ़ में विकसित हो रही कथक परंपरा की विशिष्टताओं को पहचानकर उसे नाम और वैचारिक आधारभूमि देने की कोशिश की थी।

【‘रायगढ़ में कथक’ और लेखकत्व का विवाद】

यहीं से इस कथा का दूसरा और अधिक जटिल पक्ष सामने आता है।

डॉ. बलदेव के मूल लेख के प्रकाशन के बाद ‘रायगढ़ में कथक’ नाम से प्रकाशित पुस्तक को लेकर लेखकत्व का विवाद तूल पकड़ा। 6–12 फरवरी 1983 के ‘दिनमान’ में प्रकाशित सतीश जायसवाल का लेख ‘रायगढ़ में कथक : असलियत क्या है?’ इस विवाद का एक महत्त्वपूर्ण समकालीन दस्तावेज है।

जायसवाल के लेख में डॉ. बलदेव साव का यह पक्ष दर्ज है कि ‘रायगढ़ में कथक’ पुस्तक की मूल रचना उनकी थी और उसका मूल शीर्षक ‘कथक : रायगढ़ घराना’ था। उनके अनुसार पुस्तक उनके मूल लेख का ही विस्तार थी।

विवाद से संबंधित समकालीन विवरणों में यह तथ्य भी सामने आता है कि कथक के तकनीकी पक्ष—विशेषकर बोल, परन , बंदिशों और नृत्य की बारीकियों—को समझने के लिए डॉ. बलदेव ने कथक नर्तक कार्तिक राम से सहायता ली थी। दोनों के बीच लेखक और सहयोगी लेखक के रूप में नाम दिए जाने संबंधी समझ बनने की बात भी उस समय सामने आई।

लेकिन पुस्तक प्रकाशित हुई तो डॉ. बलदेव का नाम सहयोगी लेखक के रूप में नहीं था न ही उनकी लिखी भूमिका। कार्तिक राम की भूमिका प्रकाशित हुई और डॉ. बलदेव के अनुसार उनके शोध, संकलन और लेखन संबंधी योगदान को अपेक्षित स्थान नहीं मिला।

यहीं से प्रश्न केवल एक पुस्तक के लेखकत्व का नहीं रहा; उसके भीतर रचनात्मक श्रेय, बौद्धिक अधिकार और साहित्यिक नैतिकता के प्रश्न भी जुड़ गए।

इस प्रश्न को स्थानीय स्तर पर गंभीरता से उठाने वालों में डॉ. देवधर महंत का नाम भी उल्लेखनीय है। जांजगीर से प्रकाशित साप्ताहिक ‘जांजगीरज्योति’ में उनका विचारोत्तेजक लेख ‘रायगढ़ में कथक : कौन असली लेखक?’ प्रकाशित हुआ। इससे पहले ‘नवभारत’ में भी विवाद की चर्चा सामने आ चुकी थी, किंतु अब यह प्रश्न व्यापक साहित्यिक विमर्श की ओर बढ़ रहा था।

उस समय धोंधाबाबा मंदिर बिलासपुर में साहित्यकारों की नियमित बैठकें होती थीं। द्वारका प्रसाद तिवारी ‘विप्र’ के नेतृत्व में होने वाली इन बैठकों में श्यामलाल चतुर्वेदी, पालेश्वर प्रसाद शर्मा , बाबूलाल सीरिया “दुर्लभ” ,गेंद राम सागर , लक्ष्मीनारायण मिश्र,और अन्य साहित्यकार उपस्थित रहते थे। इन्हीं बैठकों में डॉ. देवधर महंत ने इस मुद्दे को व्यापक स्तर पर उठाने की आवश्यकता पर चर्चा की। डॉ. पालेश्वर प्रसाद, बाबूलाल सीरिया “दुर्लभ”, गेंदराम सागर, लक्ष्मीनारायण मिश्र तथा उपस्थित अन्य साहित्यकारों ने इस पर सहमति व्यक्त की।

इसी क्रम में यह विषय सतीश जायसवाल तक पहुँचा। उन्होंने इसे केवल एक स्थानीय विवाद के रूप में नहीं देखा, बल्कि साहित्यिक ईमानदारी और रचनात्मक श्रेय के प्रश्न के रूप में ग्रहण किया। परिणामतः ‘दिनमान’ में उनका लेख प्रकाशित हुआ और रायगढ़ कथक तथा डॉ. बलदेव से जुड़ा विवाद राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय साहित्यिक-सांस्कृतिक विमर्श में पहुँच गया।

लेख प्रकाशित होते ही अनेक प्रश्न सामने आए—‘डा.बलदेव कौन हैं?’, ‘रायगढ़ घराना है भी या नहीं?’, और यदि है तो उसकी पहचान का आधार क्या है?

इस तरह लेखकत्व का विवाद धीरे-धीरे रायगढ़ कथक की अस्मिता और उसके इतिहास-लेखन के प्रश्न से जुड़ गया।

‘पूर्वग्रह’ का प्रसंग

डॉ. बलदेव के लेखन को लेकर एक अन्य विवाद भी सामने आया।

डॉ. बलदेव के अनुसार, भोपाल में मध्यप्रदेश कला परिषद द्वारा आयोजित ‘कथक प्रसंग’ में उनके लेख के वाचन को लेकर उस समय शासकीय महाविद्यालय रायगढ़ के हिंदी के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर प्रमोद वर्मा के साथ एक समझ बनी थी। उनके अनुसार, कार्यक्रम में ‘कथक : रायगढ़ घराना’ आलेख का वाचन प्रमोद वर्मा करेंगे और उससे संबंधित प्रश्नों के उत्तर डा.बलदेव स्वयं देंगे।

डॉ. बलदेव का आरोप था कि बाद में प्रमोद वर्मा अकेले भोपाल गए और वहाँ उक्त लेख का पाठ किया। उनका यह भी कहना था कि बाद में लेख में कुछ फेरबदल करके उसे मध्यप्रदेश कला परिषद की साहित्यिक पत्रिका ‘पूर्वग्रह-34’ में प्रमोद वर्मा के नाम से प्रकाशित करा दिया गया।

यह भी विवाद का विषय बना और लेखकत्व संबंधी प्रश्न को और जटिल करता गया।

【‘रायगढ़ घराना’—एक अलग बहस】

यहाँ एक सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है—रायगढ़ कथक घराना आखिर किस अर्थ में ‘घराना’ है? क्या रायगढ़ की कथक परंपरा को स्वतंत्र ‘घराना’ कहा भी जा सकता है?
यही सवाल आगे चलकर विवाद का कारण भी बना। कुछ लोगों ने रायगढ़ को स्वतंत्र कथक घराने के रूप में स्वीकार करने पर आपत्ति की।

‘दिनमान’ में प्रकाशित समाचार के अनुसार, मुंबई की प्रसिद्ध पखावज वादिका डॉ. अबन मिस्त्री ने रायगढ़ को कथक का स्वतंत्र घराना मानने की धारणा पर सवाल उठाया था। उनका मानना था कि रायगढ़ की नृत्य-संगीत परंपरा राजपरिवार के सांस्कृतिक परिवेश तक ही अधिक सीमित रही और वहाँ ऐसी सतत गुरु-शिष्य परंपरा विकसित नहीं हो सकी, जिसके आधार पर उसे एक स्वतंत्र घराने के रूप में स्वीकार किया जाए।

डॉ. मिस्त्री का यह मत रायगढ़ के संदर्भ में एक जरूरी बहस को सामने लाता है। आखिर किसी कला-परंपरा को ‘घराना’ कहने का आधार क्या हो? क्या किसी स्थान विशेष में विकसित हुई विशिष्ट कला-शैली ही उसे घराने का दर्जा देने के लिए पर्याप्त है, या इसके लिए गुरु-शिष्य परंपरा, अपनी अलग शैली, मौलिक रचनाओं, निरंतरता और उस परंपरा के व्यापक प्रसार को भी जरूरी माना जाना चाहिए?

दरअसल, ‘घराना’ शब्द केवल किसी भौगोलिक स्थान की पहचान नहीं है। उसके पीछे वर्षों की साधना, पीढ़ियों के बीच ज्ञान का हस्तांतरण, अपनी विशिष्ट शैली का विकास और उस शैली का आगे की पीढ़ियों तक पहुँचना शामिल होता है। इसी वजह से रायगढ़ को कथक का स्वतंत्र घराना माना जाए या नहीं, यह बहस केवल किसी नाम को लेकर नहीं है। इसके पीछे भारतीय शास्त्रीय नृत्य की परंपराओं को देखने और उनके इतिहास को दर्ज करने का एक बड़ा सवाल भी जुड़ा हुआ था।

फिर भी इस बहस से एक तथ्य स्पष्ट होता है—1980 के दशक के आरंभ तक रायगढ़ की कथक परंपरा की विशिष्टता को लेकर गंभीर सांस्कृतिक और अकादमिक विमर्श प्रारंभ हो चुका था और इस विमर्श के केंद्र में डॉ. बलदेव का लेखन ही था।

किसी परंपरा को लेकर मतभेद होना बुरा नहीं है। बल्कि कई बार मतभेद ही किसी विषय को अधिक गहराई से समझने का रास्ता खोलते हैं। समस्या तब होती है, जब बहस के दौरान मूल सामग्री और उसे सामने लाने वाले व्यक्ति को ही भुला दिया जाए।

डॉ. बलदेव के साथ यही प्रश्न सबसे अधिक बेचैन करता है।
किसी शोधकर्ता का मूल्य केवल इस बात से नहीं आँका जाना चाहिए कि उसके बाद कितने लोगों ने उस विषय पर लिखा। कई बार किसी शोधकर्ता का सबसे बड़ा योगदान यही होता है कि वह किसी ऐसे विषय की ओर पहली बार गंभीरता से देखता है, जिसे तब तक लोग सामान्य मानकर छोड़ देते थे।
रायगढ़ की कथक परंपरा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

राजा चक्रधर सिंह के समय में कलाकारों की साधना और प्रयोगों से जो वातावरण बना, वह समय के साथ बिखर सकता था। राजा चक्रधर सिंह के बाद स्मृतियाँ धुँधली होने लगीं थीं। यहाँ के कलाकार मौन थे। ऐसे में उन स्मृतियों को शब्दों में सुरक्षित करने वालों में डाँ.बलदेव का काम अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
समय बीतने के साथ डॉ. बलदेव के शोध और अन्वेषण की महत्ता को रेखांकित करने वाले स्वर भी सामने आए।

डॉ. राजू पांडेय ने लिखा—

“राजा चक्रधर सिंह और रायगढ़ के कथक घराने पर उनका शोध चमत्कृत कर जाता है। रायगढ़ की साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए केवल एक ही रास्ता है और वह डॉ. बलदेव के अन्वेषणपरक लेखों से होकर गुजरता है।”

आलोचक नंदकिशोर तिवारी ने भी लिखा—

“रायगढ़ के सांगीतिक महत्त्व को प्रकाश में लाने का भगीरथ प्रयास डॉ. बलदेव ने किया। उन्होंने रायगढ़ के कथक के महत्त्व को दर्शाते हुए उसकी सम्यक् विवेचना की।”

इन टिप्पणियों को केवल प्रशस्ति के रूप में नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक शोध-परंपरा की स्वीकृति के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसमें डॉ. बलदेव ने रायगढ़ की मौखिक और सांगीतिक स्मृतियों को अध्ययन का विषय बनाया।

उनकी पुस्तक ‘रायगढ़ का सांस्कृतिक वैभव’ इसी अन्वेषणशील दृष्टि का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है। रायगढ़ की संगीत-परंपरा, कथक और उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने में उनका लेखन एक महत्त्वपूर्ण संदर्भ प्रस्तुत करता है।

【चक्रधर समारोह】

फिर आता है चक्रधर समारोह का प्रसंग।
रायगढ़ में आयोजित चक्रधर समारोह ने रायगढ़ कथक घराने को ही नहीं दूसरे घरानों और अन्य कलाओं को एक व्यापक सार्वजनिक मंच दिया।

1984 में चक्रधर समारोह का पहला आयोजन हुआ। इसके पीछे पं. मुकुटधर पांडेय और किशोरी मोहन त्रिपाठी का संरक्षण तथा तत्कालीन सांसद केयूर भूषण की अध्यक्षता जैसी महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ थीं। डॉ. बलदेव, ठाकुर वेदमणी सिंह, जगदीश मेहर, मनहरण सिंह ठाकुर, गणेश कछवाहा, रजनीकांत मेहता, गुरुदेव चौबे कश्यप, उर्मिला देवी, पं. बर्मन लाल, लाला फूलचंद श्रीवास्तव, बासंती वैष्णव और सुनील वैष्णव सहित अनेक लोगों ने इस आरंभिक प्रयास को आकार देने में अपना योगदान दिया। यह वह दौर था, जब समारोह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि रायगढ़ की सांस्कृतिक स्मृति को सार्वजनिक मंच देने का प्रयास था।

समय के साथ समारोह का मंच बड़ा हुआ, उसकी चमक बढ़ी और उससे जुड़े लोगों की संख्या भी बढ़ती गई। इसी क्रम में वर्षों तक मंच-संचालन से जुड़े एक व्यक्ति पर यह आरोप भी सामने आया कि उन्होंने समारोह की आरंभिक यात्रा के उन लोगों के योगदान को पीछे धकेलने और उनके नामों को स्मृति से हटाने का प्रयास किया, जिन्होंने इसकी नींव रखी थी। पर इतिहास मंच के उद्घोषक की आवाज से नहीं लिखा जाता। नींव के पत्थरों पर चाहे कितनी ही परतें चढ़ा दी जाएँ, भवन की मजबूती में उनकी पहचान बनी रहती है। किसी समारोह की वर्तमान भव्यता उसके आरंभिक श्रम और संकल्प का ऋण कभी नहीं मिटा सकती। चक्रधर समारोह के इतिहास में भी वे नाम केवल सूची के नाम नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक यात्रा की पहली पंक्तियाँ हैं, जिन्हें समय के किसी भी संपादन से मिटाया नहीं जा सकता।

प्रथम चक्रधर समारोह केवल एक आयोजन नहीं था। वह रायगढ़ की दीर्घ सांस्कृतिक स्मृति को सार्वजनिक मंच पर प्रतिष्ठित करने की दिशा में एक निर्णायक कदम था।

आगे चलकर समारोह ने रायगढ़ की संगीत और नृत्य-संपदा को देश के व्यापक सांस्कृतिक परिदृश्य से जोड़ा। देश के विभिन्न हिस्सों से कलाकार यहाँ आने लगे। कथक, शास्त्रीय संगीत और अन्य कलाओं की प्रस्तुतियों ने रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को लगातार विस्तार दिया।

【रायगढ़ कथक की यात्रा किसी एक व्यक्ति की देन नहीं है।】

राजा चक्रधर सिंह ने संरक्षण और सृजन का वातावरण दिया। अनेक आचार्यों और कलाकारों ने अपनी साधना से कथक को समृद्ध किया। कार्तिक राम, कल्याण दास, फिरतू महाराज, बर्मन लाल, रामलाल, बासंती वैष्णव, सुनील वैष्णव जैसे कलाकारों ने उसे मंचीय जीवन दिया। चक्रधर समारोह उसका सार्वजनिक विस्तार है और डॉ. बलदेव जैसे अध्येताओं का शोध उस पूरी यात्रा की स्मृति को सुरक्षित रखने वाला काम। इनमें से किसी एक को हटाकर रायगढ़ कथक घराने के इतिहास को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। इनमें से कुछ नाम अब भी मंच पर दिखाई देते हैं, कुछ इतिहास की किताबों में और कुछ धीरे-धीरे स्मृति से ओझल हो जाते हैं।

डॉ. बलदेव का प्रसंग हमें इसी विस्मृति से सावधान करता है। मेरा स्पष्ट मत है कि रायगढ़ कथक घराने की चर्चा जब भी हो, चक्रधर समारोह की भव्यता जब भी सामने आए, राजा चक्रधर सिंह और रायगढ़ के कलाकारों का स्मरण जब भी किया जाए, उस इतिहास के एक कोने में डॉ. बलदेव को भी याद किया जाना चाहिए, जिन्होंने उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार 1979 में ही रायगढ़ की कथक परंपरा की विशिष्टता को ‘रायगढ़ घराना’ के रूप में देखने की सबसे पहले स्पष्ट पहल की और 1980 में प्रकाशित ‘कथक : रायगढ़ घराना’ के माध्यम से उसे साहित्यिक-सांस्कृतिक विमर्श में व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया। ‘दिनमान’ जैसी पत्रिकाओं में छपे उनके लेख राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय चर्चा के विषय रहे।

लेकिन इस दावे की ऐतिहासिक पुष्टि भी भावनाओं से नहीं, प्रमाणों से ही होगी। तारीखें, मूल पांडुलिपियाँ, पत्राचार, समकालीन प्रकाशन और प्रत्यक्ष दस्तावेज ही यह निर्धारित कर सकते हैं कि किसने क्या किया, कब किया और किस रूप में किया।

यही कारण है कि डॉ. बलदेव के योगदान का पुनर्मूल्यांकन करते समय उनके पक्ष में उपलब्ध प्रमाणों को सामने रखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उनसे जुड़े विवादों और दूसरे पक्षों को भी ईमानदारी से दर्ज करना।

रायगढ़ के घुँघरुओं की गूँज आज दूर-दूर तक सुनाई देती है। उस गूँज में राजा चक्रधर सिंह की कल्पना और साधना है, कलाकारों का अथक रियाज़ है, गुरुओं की सुदीर्घ परंपरा है और उन अध्येताओं की बेचैनी भी, जिन्होंने इस कला की विशिष्टता को पहचानकर उसे समय के पन्नों पर दर्ज करने का प्रयास किया। इस समूची सांस्कृतिक यात्रा में डॉ. बलदेव का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने रायगढ़ कथक घराने की परंपरा, उसकी विशिष्टताओं और उसके विकासक्रम को समझने, संजोने और साहित्यिक-सांस्कृतिक विमर्श में प्रतिष्ठित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उनके अध्ययन और लेखन ने इस विरासत को केवल स्मृतियों तक सीमित न रहने देकर उसे दस्तावेज़ी स्वरूप प्रदान किया, जिससे आने वाली पीढ़ियाँ रायगढ़ कथक की समृद्ध परंपरा, उसकी साधना और उसके गौरवशाली इतिहास से परिचित हो सकें। अतः रायगढ़ कथक घराने की सांस्कृतिक यात्रा और उसके संरक्षण के संदर्भ में डॉ. बलदेव के योगदान को कभी विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए।

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