छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा संभाग एवं जिला स्तर पर अधिकारियों की मासिक समीक्षा बैठक आयोजित किए जाने के आदेश और वर्तमान प्रशासनिक परिदृश्य पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए, शिक्षक संघ के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष श्री रामचंद्र सोनवंशी ने एक विस्तृत प्रेस विज्ञप्ति जारी की है। उन्होंने सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए शिक्षकों के मन में उपजे संशयों, पीड़ा और आक्रोश को बिंदुवार रेखांकित किया है:
प्रशासनिक समीक्षा का स्वागत, किंतु शिक्षकों के मूल मुद्दों पर स्पष्टता का अभाव:
स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा संभागीय संयुक्त संचालक, जिला शिक्षा अधिकारी और जिला मिशन समन्वयक स्तर पर हर महीने के तीसरे सप्ताह में समीक्षा बैठक आयोजित करने का निर्णय स्वागत योग्य है। हालांकि, इस प्रशासनिक कवायद के बीच प्रदेश के लाखों शिक्षकों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इन बैठकों में शिक्षकों की दीर्घकालिक समस्याओं का भी कोई ठोस समाधान निकलेगा या यह केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह जाएगी।
1998 से 2012 के बीच नियुक्त शिक्षकों की पीड़ा और TET की तलवार:
वर्तमान परिदृश्य में सबसे अधिक मानसिक प्रताड़ना और अनिश्चितता का सामना वे सहायक शिक्षक और शिक्षक कर रहे हैं, जिनकी नियुक्तियां वर्ष 1998 से 2012 के बीच हुई हैं। वर्षों तक पूरी ईमानदारी और निष्ठा से नौनिहालों का भविष्य गढ़ने वाले इन शिक्षकों पर अचानक TET (शिक्षक पात्रता परीक्षा) की अनिवार्यता का संकट खड़ा कर दिया गया है। अपने ही भविष्य को अंधकारमय पाकर आज यह वर्ग अत्यधिक मानसिक दबाव और पीड़ा से गुजर रहा है।
शिक्षक पदोन्नति और विभिन्न कैडर की विसंगतियां:
प्रदेश में शिक्षक पदोन्नति की प्रक्रिया लंबे समय से चर्चा का विषय बनी हुई है। विभिन्न कैडर और पात्रता से जुड़े मामलों के उलझे होने के कारण पात्र शिक्षकों को समय पर उनका अधिकार नहीं मिल पा रहा है। आगामी समीक्षा बैठकों में यदि विभागीय स्तर पर इन लंबित मामलों के त्वरित निराकरण की पारदर्शी रूपरेखा सामने नहीं आती है, तो शिक्षकों में असंतोष और अधिक गहरा सकता है।
VSK एप की तकनीकी बाधाएं और मैदानी हकीकत:
विद्या समीक्षा केंद्र (VSK) आधारित उपस्थिति व्यवस्था को लेकर दूरस्थ और ग्रामीण अंचल के शिक्षकों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। नेटवर्क की समस्या, GPS, OTP और एप से जुड़ी तकनीकी बाधाएं शिक्षकों के दैनिक कार्य में बाधा बन रही हैं। जिला और संभाग स्तर के अधिकारियों को इन मैदानी और व्यावहारिक समस्याओं की गंभीरता को समझते हुए तत्काल प्रभाव से समाधान निकालना चाहिए।
पेंशन मामलों और शिक्षा की गुणवत्ता पर फोकस की आवश्यकता:
समीक्षा बैठकों का दायरा केवल कागजी मॉनिटरिंग तक सीमित न रहकर कर्मचारियों और शिक्षकों के पेंशन संबंधी लंबित मामलों के त्वरित निराकरण पर केंद्रित होना चाहिए। एक तरफ सरकार शिक्षा की गुणवत्ता का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ यदि शिक्षक स्वयं मानसिक प्रताड़ना और प्रशासनिक अनिश्चितता के दौर से गुजरेंगे, तो वे पूरी क्षमता के साथ बच्चों के भविष्य को नहीं संभाल पाएंगे।
क्या यह किसी आगामी राजनीतिक एजेंडे या चुनाव की पृष्ठभूमि तो नहीं?
यह गंभीर शंका पैदा होने लगी है कि कहीं शासन-प्रशासन आने वाले वर्षों के राजनीतिक समीकरणों और चुनावों को ध्यान में रखकर तो शिक्षा जैसी पवित्र व्यवस्था का प्रयोग नहीं कर रहा है? शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र को प्रयोग की वस्तु बनाकर हजारों शिक्षकों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करना और उनका ध्यान मूल मुद्दों से भटकाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। यदि ऐसा है, तो इसका स्पष्ट संदेश जनमानस पटल पर जाएगा। जो शासन या प्रशासन शिक्षा के साथ इस तरह के प्रयोग करेगी, समय आने पर उसे जनता और कर्मचारियों के आक्रोश का सामना करना पड़ेगा।
छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक सच – अन्याय और दमन को जनता ने कभी नहीं सहा:
भारत की दूरदर्शी सोच और इसके अभिन्न अंग छत्तीसगढ़ के इतिहास गवाह हैं कि यहां की जनता ने कभी भी अन्याय या दमन को सहन नहीं किया है। इस पावन धरती पर कई बार सरकारें बदली हैं और अहंकार व जनविरोधी नीतियों के चलते ऐसी कई सरकारें सत्ता से बेदखल होकर पतन के गर्त में समा गईं, जिनका आज नामों-निशान भी नहीं बचा है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि शिक्षकों और शिक्षा व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करने वालों को समय आने पर जनता माकूल जवाब देती है।
शिक्षक संगठनों और नेतृत्व से अपेक्षाएं:
आज प्रदेश के शिक्षक विभिन्न संगठनों के अंतर्गत अपनी आवाज उठा रहे हैं। यह समय आपसी दूरियों को मिटाकर पूरी एकजुटता के साथ शिक्षकों के अधिकारों के लिए वैचारिक और अनुशासित संघर्ष करने का है। संगठन के नेतृत्वकर्ताओं को व्यक्तिगत प्राथमिकताओं से ऊपर उठकर शिक्षकों के इस गंभीर संकटकाल में पूरी मजबूती से खड़ा होना होगा।
शासन-प्रशासन से पुरजोर अपील:
श्री रामचंद्र सोनवंशी ने शासन और शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों से मांग की है कि राजनीतिक और चुनावी प्राथमिकताओं से परे हटकर शिक्षा के मूल स्वरूप और शिक्षकों की मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता दी जाए। शिक्षकों के भविष्य को सुरक्षित और संरक्षित किए बिना एक सशक्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था की कल्पना नहीं की जा सकती। अतः शासन को संवेदनशीलता का परिचय देते हुए TET, पदोन्नति और पेंशन के मामलों का न्यायसंगत और त्वरित निराकरण करना चाहिए।







