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डॉ. बलदेव जी की 84वीं जयंती: आँखों में नमी और स्मृतियों में ज़िंदा एक महावृक्ष

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बसंत राघव –

पापा जी की आज 84वीं जयंती है। कभी सोचा भी नहीं था कि उनका जन्मदिन एक दिन जयंती के रूप में मनाना पड़ेगा। जीवन में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जिनके लिए मन कभी तैयार नहीं होता। पापा जी को गए हुए आठ वर्ष बीत गए, लेकिन भीतर कहीं लगता है, जैसे वे अभी गए ही नहीं हैं।

आज भी जब रात को सोता हूँ और चुपके से नींद में वे आ जाते हैं। कुछ देर मेरे पास बैठते हैं, ढेर सारा प्यार उँडेलते हैं, अपनी कुछ प्रिय कविताएँ सुनाते हैं और फिर लौट जाते हैं। मैं आँखें खोलता हूँ तो सामने कोई नहीं होता। तब लगता है—पापा जी फिर चले गए। और मैं पहले की तरह उनके लौटने का इंतजार करने लगता हूँ।

काश! भगवान कुछ दिनों के लिए ही सही, पापा जी को हमारे पास लौटा देते। हम उन्हें खूब प्यार करते, खिलाते-पिलाते और बदले में उनका वही लाड़-दुलार पाकर फिर उन्हें लौटा देते। इतना करने से, हे भगवान, तुम्हारा क्या जाता! पर जो हो नहीं सकता, उसके लिए क्या किया जा सकता है?

अब उनकी मुस्कुराहट और स्नेह हमारे आसपास बिखरा पड़ा है—खुले आकाश में, समूची धरती में, घर की दीवारों में, उनके लगाए आम और बीही के पेड़ों में। ठंडी हवा जब चेहरे को छूती है तो लगता है, जैसे पापा जी प्यार से हमारे सिर पर हाथ फेर रहे हों। नदियों के कलकल और झरनों के झरझर में मानो वे हमारे लिए ही कोई गीत गा रहे हों।

मेरे दिलो-दिमाग में उनका चेहरा आज भी उसी तरह बसा हुआ है। वे एक पल के लिए भी मुझसे दूर नहीं हुए। उनका प्यार-दुलार भला कैसे भुलाया जा सकता है?

पिता को याद करना अच्छा लगता है, लेकिन उनके अंतिम दिनों को याद करते ही भीतर एक बेचैनी भर जाती है। दो महीने तक निमोनिया से अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझते रहे। आखिरी समय में वेंटिलेटर पर उनकी लाचारी देखते रहना और कुछ न कर पाना—उस बेबसी को शब्दों में कह पाना संभव नहीं। प्रिय व्यक्ति को मृत्यु के सामने असहाय पड़े देखते रहना शायद मनुष्य की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक है। हम उन्हें बचा नहीं सके। यही पीड़ा आज भी भीतर कहीं जीवित है।

पापा जी बहुत उदात्तमना थे। प्रेम के दो बोल सुनकर किसी के लिए भी कुछ कर देना उनके स्वभाव में था। कोई उनसे कुछ माँगता तो वे उसे मना नहीं कर पाते थे। उनकी इसी सरलता का कई लोगों ने अनुचित लाभ उठाया और उन्हें नुकसान भी सहना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी उदारता नहीं छोड़ी।

मेरे साथ उनका संबंध कुछ अधिक आत्मीय था। दोस्तों के बीच वे मेरी तारीफ बढ़-चढ़कर करते थे। मैं कुछ लिखता या चित्र बनाता तो वे प्रसन्न होते और मेरी हौसला-अफजाई करते। मुझे लगता था कि मैं उनके सपने को पूरा करूँगा, लेकिन उनकी अपेक्षाओं पर पूरा नहीं उतर पाया। इसका पछतावा शायद जीवन भर रहेगा।

जो कुछ थोड़ा-बहुत लिख पाता हूँ, उसमें उनका ही आशीर्वाद है।

वे मुझे बार-बार लिखने के लिए प्रेरित करते। बहुत दिनों तक कुछ न लिखूँ तो कोई विषय दे देते और कहते—“इस पर लिखो।” कविता लिखने पर कहते—“गद्य में भी लिखो। साहित्यकार की पहचान गद्य लेखन से शुरू होती है। गद्य से भाषा परिमार्जित होती है।”

उनकी एक बात आज भी कानों में गूँजती है—

“दस पेज पढ़ो, फिर एक पैराग्राफ लिखो। भाषा स्वयं माँज जाएगी।”

वे स्वयं किसी विषय पर लिखते तो बहुत परिश्रम करते। संदर्भ-ग्रंथों का अध्ययन करते, संबंधित लोगों से बातचीत करते और तब जाकर लेख पूरा करते। इसके विपरीत मैं एक पंक्ति लिखते ही उन्हें सुनाने दौड़ जाता। वे मुझसे जितना खुश होते, उतना ही कभी-कभी दुःखी भी।

उनका कहना था—“जब भी कुछ लिखो, उसे कई दिनों तक अपने पास पड़ा रहने दो। बार-बार पढ़ो। मन में गुनगुनाओ, चिंतन करो। जब स्वयं संतुष्ट हो जाओ, तभी किसी को सुनाओ। संशोधन की जरूरत ही कम पड़ेगी।”

वे सरल लेखन के पक्षधर थे। कहते—“जितना सरल लिख सकते हो, उतना सरल लिखो। बिंब और प्रतीक के मोह में भाषा को कठिन मत बनाओ। कठिन लिखने के चक्कर में रचना अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है।”

उन्हें उतावलापन बिल्कुल पसंद नहीं था। और मैं उतावलेपन का ही दूसरा नाम था।

अपनी कविता की व्याख्या करने की मेरी आदत उन्हें विशेष रूप से चिढ़ाती थी। मैं कविता सुनाकर उसके अर्थ समझाने लगता तो वे माथा पकड़ लेते। कई बार यह गलती दोहराने के बाद भी मैं सुधरा नहीं।

वे कहते—“अपनी कविता की व्याख्या मत करो। कविता अपनी बात स्वयं कहेगी। अगर उसकी व्याख्या करनी पड़े तो वह कविता कम और दिमागी कसरत ज्यादा है।”

मैं उनकी इन बातों को उस समय उतनी गंभीरता से नहीं ले पाया, जितना लेना चाहिए था।

एक प्रसंग आज भी याद आते ही मुस्कान ला देता है।

एक बार पं. रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ रायगढ़ आए थे। पं. मुकुटधर पांडेय जी से मिलने वे हमारे घर आए और उस समय पापा जी के साथ मैं भी वहाँ मौजूद था। दो शीर्ष साहित्यकारों को सामने देखकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था।

पापा जी ने मेरा परिचय कराते हुए कहा—“यह मेरा कनिष्ठ पुत्र बसंत है। यह कविता और चित्रकारी दोनों करता है।”

अंचल जी ने अपने मोटे चश्मे के पीछे से मुझे देखा और पूछा—“वाह! तुम दोनों कर लेते हो। लेकिन अगर तुम्हारे सामने दोनों में से एक को ही चुनना हो तो?”

मैं घबरा गया। तीनों की निगाहें मेरी ओर थीं। मुझे लगा जैसे जमीन पर नहीं, हवा में लटक रहा हूँ।

मैंने कहा—“जी, मैंने प्रश्न ठीक से समझा नहीं।”

उन्होंने प्रश्न फिर दोहराया।

मैंने संकोच से कहा—“चित्रकारी।”

“चित्रकारी ही क्यों?”

मैंने कहा—“क्योंकि रंगों को फैला देने से चित्र बन जाता है, जैसे काले बादल। उसमें व्याकरण की कठिनाइयाँ नहीं होतीं।”

मेरी बात सुनकर पं. मुकुटधर पांडेय, अंचल जी और पापा जी—तीनों के चेहरे पर मुस्कान फैल गई।

आज सोचता हूँ तो लगता है, उस समय मैंने अनजाने में अपने भीतर की सबसे बड़ी कमजोरी ही कह दी थी।

पापा जी के कारण मुझे अनेक महान साहित्यकारों, कलाकारों और संगीतज्ञों से मिलने का अवसर मिला। पं. रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, रामकुमार वर्मा, भीष्म साहनी, नीरज, प्रभाकर श्रोत्रिय, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, डॉ. प्रेमशंकर, आचार्य विनय मोहन शर्मा, चित्रकार भाऊ ‘समर्थ’, पं. बिरजू महाराज, उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ, डागर बंधु और अनेक विभूतियों से मिलने या उनके सान्निध्य में रहने का सौभाग्य मिला।

पं. मुकुटधर पांडेय जी तो पापा जी को अपना मानस पुत्र मानते थे। इसलिए उनसे मिलने आने वाले साहित्यकारों और साहित्य-प्रेमियों का हमारे घर आना-जाना लगा रहता था। हमारा घर धीरे-धीरे एक छोटे-से साहित्यिक पड़ाव जैसा हो गया था।

एक बार पं. मुकुटधर पांडेय जी आचार्य विनय मोहन शर्मा को लेकर हमारे घर स्वयं आए। हम लोगों के आश्चर्य और आनंद का ठिकाना नहीं था। उस दिन दोनों वयोवृद्ध साहित्यकारों के सामने संकोच से हमने आँगन का पका हुआ मीठा पपीता काटकर रखा। दोनों ने दो-दो फाँक खाईं। शर्मा जी ने कहा—“पपीता तो बहुत मीठा है, पर इतना ही है क्या?”

मैंने कहा—“पपीता आँगन का है। खूब फला भी है और पका भी।”

वे बोले—“तो देखते क्या हो?”

उस दिन दोनों साहित्यकारों ने पपीते का स्वाद लेते हुए देर तक आत्मीय बातचीत की। हमें लगा, हमारा घर-आँगन धन्य हो गया।

संतकवि पवन दीवान भी एक बार हमारे घर आए और पपीते का भरपूर नाश्ता करके हमें उपकृत किया। आज वे प्रसंग मामूली लग सकते हैं, लेकिन स्मृतियों में मामूली से मामूली दृश्य भी कितना बड़ा हो जाता है!

भीष्म साहनी और ए. के. हंगल के साथ बिताए वे दो दिन भी मेरे जीवन की अविस्मरणीय स्मृतियों में हैं। प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान में बिलासपुर में दो दिवसीय कार्यक्रम था। पापा जी के साथ मैं भी गया था। भीष्म साहनी और ए. के. हंगल के साथ अग्रसेन भवन में भोजन का अवसर मिला। दूसरे दिन एक विद्यालय के प्रांगण में लोकगायिका स्व. सूरज बाई खांडे का कार्यक्रम था। मंच का संचालन वरिष्ठ साहित्यकार कमला प्रसाद पांडेय कर रहे थे। मंच पर भीष्म साहनी और ए. के. हंगल बैठे थे।

मैंने पं. मुकुटधर पांडेय की दो पुस्तकें दोनों को भेंट कीं। ए. के. हंगल ने मुझे गले लगाते हुए कहा था—“जाते समय रास्ते में इसे जरूर पढ़ूँगा।”

इसके बाद सूरज बाई खांडे का कार्यक्रम शुरू हुआ। उनकी लोकगायकी से दोनों इतने प्रभावित हुए कि मंच के एक कोने में नीचे बैठकर कार्यक्रम सुनने लगे। यह दृश्य मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं था।

भीष्म साहनी जी के दूसरे रायगढ़ प्रवास की स्मृति भी मेरे भीतर सुरक्षित है। नटवर हाईस्कूल और पं. मुकुटधर पांडेय का निवास—इन जगहों से जुड़ी अनेक बातें आज भी याद आती हैं। भीष्म जी मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़े थे, लेकिन उनकी रचनाओं के केंद्र में मनुष्य और मानवीय मूल्य ही थे। वे लेखक, कथाकार, अनुवादक, अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ-साथ अत्यंत संवेदनशील मनुष्य थे। उनकी रचनाओं में भारतीय समाज, संस्कृति, राजनीति, संघर्ष और मनुष्य के अंतर्द्वंद्व का गहरा यथार्थ दिखाई देता है।

पापा जी को याद करते-करते उनसे जुड़े लोगों की स्मृतियाँ भी चली आती हैं। यही स्मृति की प्रकृति है—एक चेहरा दूसरे चेहरे का हाथ पकड़ लेता है और एक घटना दूसरी घटना का दरवाजा खोल देती है।

पापा जी साहित्य को केवल लिखने का कर्म नहीं मानते थे। उनके लिए साहित्य जीवन से जुड़ने का माध्यम था। वे व्यक्तिगत राग-द्वेष को अपने लेखन में स्थान नहीं देते थे। जिन लोगों से उनके संबंध अच्छे नहीं थे, उनके भीतर भी यदि कोई अच्छी रचनात्मकता दिखाई देती तो उसकी प्रशंसा करते।

मैं कभी-कभी उनसे कह देता—“आप बड़े कवियों पर लिखने के बजाय इन नए कवि-लेखकों पर इतना समय क्यों लगाते हैं?”

वे कहते—“बड़े कवियों पर लिखने वाले हजारों हैं, लेकिन हमारे अंचल के रचनाकारों पर लिखने वाले कितने हैं? ये नए लोग कितने विश्वास से सामग्री भेजते हैं। उन्हें निराश करना क्या अच्छी बात है?”

उनका मानना था कि साहित्य का इतिहास केवल प्रसिद्ध नामों से नहीं बनता; उसके पीछे अनगिनत छोटे-बड़े रचनाकारों की आवाजें भी होती हैं। वे उन आवाजों को खोजते थे।

उनका यह खोजी स्वभाव उनके लेखन की बड़ी शक्ति था। किसी विषय पर लिखते समय यदि कोई तथ्य उन्हें रोक देता तो वे संबंधित व्यक्ति से जानकारी लेने में संकोच नहीं करते। किसान हो, गृहिणी हो, संगीत का साधक हो या कम पढ़ा-लिखा कोई सामान्य व्यक्ति—उनके लिए अनुभव और जानकारी का कोई स्रोत छोटा नहीं था।

उन्होंने हिंदी साहित्य की दुर्लभ सामग्री का भी बड़ा संचयन किया था। पुस्तकें और सामग्री दूसरों को देने में उन्हें आनंद आता था। कोई पुस्तक माँगता तो वे तुरंत ढूँढ़कर दे देते। पुस्तक वापस न आती तो दुःखी होते, लेकिन अगली बार फिर पुस्तक दे देते। उनके इसी मुक्तहस्त स्वभाव के कारण धीरे-धीरे उनका अपना पुस्तकालय खाली होता गया।

कई बार संदर्भ के लिए उन्हें अपनी ही पुस्तक खोजनी पड़ती और पता चलता कि वह किसी शोधार्थी को दे रखी है। फिर उसी के पास जाना पड़ता या पुस्तकालयों की खाक छाननी पड़ती। कभी-कभी पुस्तक दोबारा खरीदनी पड़ती। इसके बावजूद उन्होंने पुस्तकें देना बंद नहीं किया।

डॉ. विमल कुमार पाठक अपनी पत्नी और बख्शी जी की नातिन नलिनी श्रीवास्तव के साथ हमारे घर आए थे। नलिनी जी बख्शी जी पर शोध कर रही थीं। पापा जी इलाहाबाद और बनारस से जो सामग्री लेकर आए थे, उसमें बख्शी जी के स्वच्छंदतावादी गीतों से संबंधित दुर्लभ सामग्री भी थी। उन्होंने वह सामग्री उन्हें दे दी। लगभग बीस-पच्चीस शोधार्थियों को उन्होंने दुर्लभ सामग्री उपलब्ध कराई और उनके शोध को दिशा भी दी। छत्तीसगढ़ के बाहर के शोधार्थी भी उनसे लाभान्वित हुए।

पुस्तकों और साहित्यिक सामग्री को संचित करना उनके लिए संग्रह नहीं था; उसे जरूरतमंद तक पहुँचा देना ही उस संग्रह का अंतिम उद्देश्य था।

डाक से आने वाले पत्र-पत्रिकाओं का उन्हें बेसब्री से इंतजार रहता था। सुबह से ही उनकी नजर दरवाजे पर रहती। ग्यारह-बारह बजते और मैं सुनता—“छोटू, पोस्टमैन आया?”

पत्र-पत्रिकाएँ पाकर वे जितना खुश होते थे, शायद किसी और वस्तु को पाकर नहीं। घर पर उनके न रहने पर आने वाली डाक मैं ही संभालता। वे जानते थे कि पत्र पढ़े बिना मैं उन्हें तुरंत नहीं दूँगा। साहित्यिक गतिविधियों की यह छोटी-सी जिम्मेदारी भी जैसे मेरे हिस्से आ गई थी।

जब कभी डाक से कोई पत्र या पत्रिका आती, पापा जी मुझे ही पहले पढ़ने को कहते। साहित्यिक गतिविधियों को वे घर में सबसे अधिक मुझसे साझा करते थे। कोई किताब नहीं मिल रही हो तो मुझे पुकारते। मैं तुरंत खोजकर दे देता। मेरे घर पर न होने पर माँ कभी उलाहना देतीं—“आपका छोटू आएगा, वही ढूँढ़ सकता है।”

और पापा जी के चेहरे पर एक निश्छल मुस्कान फैल जाती।

पापा जी को पौधे लगाने का बहुत शौक था। घर के सामने की वह छोटी-सी बाड़ी आज भी है। एक दिन वे गैंती से मिट्टी खोद रहे थे। पसीने से लथपथ होकर कुछ देर बैठे और माँ खुदाई की हुई मिट्टी में बीज डाल रही थीं। अचानक उन्होंने आवाज लगाई—“छोटू, पेन-कागज लेकर आना।”

मैं दौड़कर पेन और कागज ले आया।

वे कविता की पंक्तियाँ बोलते गए और मैं लिखता गया। लेकिन मैं इतना उतावला था कि कभी कोई अक्षर छोड़ देता, कभी कोई शब्द और कभी पूरी पंक्ति। मुझे खुद नहीं मालूम था कि मैंने क्या लिखा है।

कुछ देर बाद उन्होंने पूछा—“लिख लिया?”

मैंने कहा—“जी।”

उन्होंने कहा—“ऐसी कविता मैंने बहुत कम लिखी है। शायद अब तक नहीं लिखी। संभालकर रखना।”

मैं कागज लेकर घर की ओर भाग आया। लेकिन बाद में जब उसे पढ़ना चाहा तो मेरे लिखे अधूरे शब्दों से कविता का अर्थ ही नहीं बन रहा था। जो छूट गया था, वह मुझे याद नहीं था। पापा जी से दोबारा पूछने का साहस भी नहीं जुटा पाया।

उन्होंने फिर कभी उस कविता के बारे में पूछा नहीं।

आज तक उस घटना का अपराधबोध मेरे भीतर है।

कभी-कभी लगता है, मैं एक अजन्मी कविता का हत्यारा हूँ।

वह कविता, जिसकी रक्षा का भार मुझे सौंपा गया था, मेरी लापरवाही के कारण जन्म लेने से पहले ही मर गई।

पापा जी केवल साहित्य और कला की बातें नहीं करते थे। जीवन के छोटे-छोटे नैतिक सूत्र भी उन्होंने हमें दिए। वे हम भाई-बहनों से कहते—घर में कभी बेईमानी का पैसा नहीं आना चाहिए। “बेईमानी का एक रुपया जीवन भर की कमाई ब्याज सहित ले जाता है।” उनका मानना था कि जिस काम से हमारा जीवन चलता है, उसके प्रति हमारा कर्तव्य सबसे बड़ा है। उसे पूरी निष्ठा और ईमानदारी से करना चाहिए। किसी का अहित नहीं सोचना चाहिए।

उन्होंने हम दोनों भाइयों को हमेशा स्त्री का सम्मान करना सिखाया। दीन-दुखियों की यथासंभव सेवा करने को कहा। प्रकृति के प्रति उनका विश्वास गहरा था। उनका मानना था कि मनुष्य प्रकृति से बाहर कुछ भी नहीं है।

पूर्वाभास को लेकर भी वे एक विचित्र विश्वास रखते थे। उनका कहना था कि जब कोई व्यक्ति जीवन के अंतिम समय में अपने किसी प्रिय से कुछ कहना चाहता है और वह उससे दूर होता है, तब भी किसी न किसी तरह उसकी बात उस तक पहुँच जाती है—कभी किसी दस्तक की तरह, कभी किसी अनजानी अनुभूति की तरह।

आज जब वे नहीं हैं, उनकी कही ऐसी अनेक बातें नए अर्थों में समझ आती हैं।

बचपन में हम उनसे जितना प्यार करते थे, उतना ही डरते भी थे। वेतन के दिन पापा जी मम्मी के हाथ में पूरी तनख्वाह रखने से पहले हम बच्चों को एक-एक रुपया देना कभी नहीं भूलते थे। बाकी दिनों का घर मम्मी चलाती थीं।

वे कवि थे, लेकिन केवल कवि नहीं थे। मूर्तिकार थे, चित्रकार थे और कला के अनेक रूपों से उनका गहरा संबंध था। जब मैं लगभग पाँच वर्ष का था, ‘कर्मा’ गाँव में उन्होंने एक विशाल रावण का पुतला बनाया था। पुतला बनाते समय स्कूल के मैदान में भीड़ लगी हुई थी। वे रावण की नाक बना रहे थे कि उसमें से गोंद बहने लगा।

मैंने जोर से कहा—“पापा जी, देखिए तो, रावण की नाक बह रही है!”

मेरी बात सुनते ही चारों ओर हँसी का फव्वारा फूट पड़ा। मुझे लगा, रावण ही मुझ पर हँस रहा है और मैं डर गया।

उनके भीतर का कलाकार धीरे-धीरे साहित्यकार के भीतर समा गया। एक समय ऐसा आया जब लेखन उन्हें मूर्ति और चित्र बनाने का अवसर ही नहीं देता था। वे लगातार लिखते रहते। कभी-कभी बारह-चौदह घंटे तक। आश्चर्य यह कि इतने लंबे समय तक लिखने के बाद भी उनमें थकान नहीं दिखती थी। पूरा लिख लेने के बाद उनका चेहरा बच्चों की तरह खिल उठता।

ऐसे समय में घर के बच्चे शोर करते तो वे नाराज नहीं होते। उलटे उनके साथ खेलने लगते। टीवी देखने की आजादी भी मिल जाती और बच्चों को उस दिन डाँट का डर नहीं रहता।

जब उन्हें अपनी माँ की याद आती तो मुझसे कहते—“छोटू, एस. डी. बर्मन का ‘ओ माँ’ वाला गाना सुनाओ।”

मैं कैसेट ढूँढ़कर लगा देता। वे खाट पर लेटे रहते और कमरे में बार-बार वही गीत बजता—

“मेरी दुनिया है माँ, तेरे आँचल में,
शीतल छाया है तू, दुख के इस जंगल में…”

वे उस गीत को बार-बार सुनते। शायद उसमें उन्हें अपनी माँ की गोद मिलती थी।

मैंने उनके उसी भाव को वर्षों पहले अपनी कविता में लिखने की कोशिश की थी—

बूढ़ा खोजता है माँ को,
याद करता हुआ बचपन को,
अंडे जैसे सेने लगती है माँ,
छाती से कैसे चिपटा लेती है पेट से,
साँस के संगीत से…

फिल्मों में ‘पाकीजा’, ‘उमराव जान’ और ‘रुदाली’ उन्हें प्रिय थीं। शास्त्रीय संगीत में बेगम अख्तर और कुमार गंधर्व को विशेष लगाव से सुनते। नरेंद्र शर्मा के “संसार से भागे फिरते हो…” और “ज्योति कलश छलके” जैसे गीत उन्हें विशेष रूप से प्रिय थे। धार्मिक ग्रंथों के पाठ भी वे सुनते रहते। उनकी कविताओं के अनेक प्रतीक और मिथकीय संदर्भ उनकी गहरी पठन-परंपरा से आए थे। प्रसाद और निराला उनके आदर्श कवि थे।

पं. मुकुटधर पांडेय के प्रति उनकी श्रद्धा भी अद्भुत थी। उसमें केवल साहित्यिक सम्मान नहीं था; एक महीन पितृ-स्नेह का धागा भी जुड़ा था। पांडेय जी के निधन के बाद पापा जी ने स्वयं को जैसे अनाथ महसूस किया था। दोनों के बीच का संबंध गुरु-शिष्य से कहीं आगे जाकर पिता-पुत्र का हो गया था।

पापा जी के बच्चों के जन्मदिन भी सामान्य ढंग से नहीं मनते थे। घर में कवि-गोष्ठियाँ होतीं। पं. मुकुटधर पांडेय सहित पुरानी पीढ़ी के अनेक साहित्यकार उनमें आते। पं. किशोरी मोहन त्रिपाठी, बंदे अली फातमी, लाला फूलचंद, चंद्रशेखर शर्मा, आनंदी सहाय शुक्ल, मुस्तफा हुसैन जैसे गीतकारों के साथ नई पीढ़ी के कवि भी शामिल होते। देश के दूसरे हिस्सों से भी साहित्यकार उनके आमंत्रण पर रायगढ़ आते।

इस तरह हमारा घर केवल हमारा घर नहीं रह गया था; वह साहित्य और संस्कृति से मिलने-जुलने का एक आत्मीय स्थल बन गया था।

पापा जी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और विशेष रूप से रायगढ़ कथक घराने के अध्ययन और प्रचार-प्रसार से जुड़ा था।

उन्होंने रायगढ़ की संगीत परंपरा और कथक की विशिष्ट शैली को गंभीरता से समझने और सामने लाने का काम बहुत पहले शुरू कर दिया था। 1979-80 के आसपास लिखा उनका ‘कथक रायगढ़ घराना’ संबंधी लेख इस दिशा में महत्त्वपूर्ण पड़ाव था। देश के अनेक सुप्रसिद्ध नर्तकों को देखने, संगीत और नृत्य संबंधी साहित्य पढ़ने तथा रायगढ़ के कलाकारों से संवाद करने के बाद उन्होंने उसमें एक विशिष्टता पहचानी और उसे तर्कपूर्ण ढंग से सामने रखा।

लेख को लेकर समर्थन भी मिला और आलोचना भी हुई। लेकिन यह बहस अपने आप में प्रमाण थी कि उन्होंने एक ऐसे विषय को राष्ट्रीय विमर्श के सामने रखा था, जिसे इससे पहले व्यवस्थित रूप से सामने लाने का प्रयास कम हुआ था।

बाद में उनकी पुस्तक ‘रायगढ़ का सांस्कृतिक वैभव’ और उनके अन्य अन्वेषणपरक लेख रायगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत बने।

डॉ. राजू पांडेय ने उनके लेखन के संबंध में लिखा है कि राजा चक्रधर सिंह और रायगढ़ के कथक घराने पर उनका शोध चमत्कृत करता है और रायगढ़ की साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए उनके अन्वेषणपरक लेखों से गुजरना पड़ता है।

आलोचक नंदकिशोर तिवारी ने भी रायगढ़ के सांगीतिक महत्त्व को सामने लाने में डॉ. बलदेव के प्रयास को महत्त्वपूर्ण माना और कथक के रायगढ़ घराने पर उनकी विवेचना को रेखांकित किया।

सन् 1984 में श्री चक्रधर ललित कला केंद्र की स्थापना के समय भी पापा जी की सक्रिय भूमिका रही। केयूर भूषण जी संरक्षक थे, पं. मुकुटधर पांडेय उपाध्यक्ष, पं. किशोरी मोहन त्रिपाठी अध्यक्ष और जगदीश मेहर सहित अनेक लोग उससे जुड़े थे। पापा जी को प्रचार सचिव का दायित्व सौंपा गया था।

रायगढ़ के सांस्कृतिक जीवन को लेकर उनकी सक्रियता केवल लेखन तक सीमित नहीं थी। वे चाहते थे कि यहाँ की कला, संगीत, नृत्य और साहित्य की अपनी पहचान देश के सामने आए।

आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ आता है कि उन्होंने अपने जीवन का कितना बड़ा हिस्सा इस काम में लगा दिया था।

पापा जी जब लिखते थे तो व्यक्तिगत लाभ की चिंता नहीं करते थे। उन्हें इस बात की भी चिंता नहीं थी कि श्रेय किसे मिलेगा। उनका आग्रह केवल इतना था कि सही तथ्य सामने आएँ और अंचल की उपेक्षित सांस्कृतिक विरासत को उसका उचित स्थान मिले।

आज जब कभी उनके लिखे पुराने पन्ने हाथ लगते हैं, तो लगता है—वे केवल कागज नहीं, हमारे लिए एक पूरा समय बचाकर गए हैं।

माँ आज भी हमें दुखी नहीं देखना चाहतीं। वे पिता को याद करके रोने से स्वयं को रोकती हैं। जब आँसू बहुत भर जाते हैं और रोकना संभव नहीं होता, तो उनकी आँखों में पापा जी का पूरा जीवन उतर आता है। माँ के लिए पिता भगवान थे और हम बच्चों के लिए वे दोनों ही भगवान थे।

पापा जी का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं था। हमारे घर से जैसे एक पूरा संसार उठ गया।

वे उस महावृक्ष की तरह थे जो प्रचंड सूर्य की रश्मियों को स्वयं में समेटकर अपने नीचे खड़े लोगों को छाया, शीतलता और सुरक्षा देता है। हमें कभी यह महसूस ही नहीं हुआ कि धूप कितनी तेज है, क्योंकि हमारे ऊपर उनकी छाया थी।

अब वह महावृक्ष दिखाई नहीं देता।

दूर तक नजर जाती है तो उसकी छाया खोजती है।

लेकिन संतोष इस बात का है कि उसकी जड़ें अभी हमारे भीतर हैं।

उनकी दी हुई सीख, उनकी किताबें, उनके लिखे शब्द, उनकी आवाज, उनकी मुस्कान, उनके लगाए पेड़, उनकी अधूरी कविताएँ, उनके स्पर्श की स्मृति और जीवन को देखने की उनकी दृष्टि—सब हमारे साथ हैं।

कभी ठंडी हवा चेहरे को छूती है तो लगता है, पापा जी पास से गुजरे हैं।

किसी पेड़ की डाल हिलती है तो लगता है, वे कुछ कह रहे हैं। किसी किताब का पन्ना खुलता है तो लगता है, वे अभी कहेंगे—“दस पेज पढ़ो, फिर एक पैराग्राफ लिखो…”और तब लगता है—पापा गए कहाँ हैं?

वे तो अब भी हमारे आसपास हैं—हमारी स्मृतियों में, हमारी भाषा में, हमारी आदतों में, हमारी असफलताओं के पछतावे में, हमारी छोटी-सी सफलता की खुशी में, उनके लगाए पेड़ों की हरियाली में और उस आकाश में, जिसके नीचे खड़े होकर हमने उनसे जीवन जीना सीखा।

पापा जी आज हमारे बीच देह रूप में नहीं हैं, लेकिन उनकी छाया अब भी हमारे ऊपर है।

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