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अभिव्यक्ति की मर्यादा एवं पेंशनर्स संघर्ष यात्रा का हुआ विमोचन …

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संवाददाता – लक्ष्मी नारायण लहरे

रायपुर ।संकेत साहित्य समिति के बैनर तले वृंदावन हॉल रायपुर में कार्यक्रम के मुख्य आतिथि डॉ.चित्तरंजन कर,कार्यक्रम अध्यक्ष गिरीश पंकज ,विशिष्ट अतिथि द्वय डुमनलाल ध्रुव व सुरेंद्र रावल एवं समिति के संस्थापक व प्रांतीय अध्यक्ष डॉ.माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग के कर कमलों से वरिष्ठ साहित्यकार चेतन भारती की दो कृतियों – अभिव्यक्ति की मर्यादा और पेंशनर्स संघर्ष यात्रा का विमोचन संपन्न हुआ।कार्यक्रम के आरंभ में माँ सरस्वती की पूजा अर्चना के पश्चात अतिथियों एवं लेखक का अंगवस्त्र एवं श्रीफल से सम्मान किया गया। अपनी कृतियों पर प्रकाश डालते हुए चेतन भारती ने पेंशनधारियों की पीड़ा एवं अभिव्यक्ति की आज़ादी की हो रही सरे आम अवहेलना ने मुझे इस विषय पर लिखने के लिए प्रेरित किया कहा। डॉ.माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ ने अपने उद्बोधन में कहा कि चेतन भारती का का चिंतन हवाई न होकर जमीन एवं परिवेश से जुड़ा है।सतह से शिखर तक की यात्रा उन्होंने अपने बलबूते पूरी की है। चिंतन से विचार एवं विचार से इच्छाएँ जन्म लेती हैं। भारती द्वारा प्रयुक्त भाषा एवं कथ्य में पूरी ईमानदारी एवं सत्यनिष्ठा झलकती है।कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे गिरिश पंकज ने कहा कि अभिव्यक्ति की मर्यादा’ के पक्षधर लेखक चेतन भारती अपनी इच्छाशक्ति के अनुसार सबकी अपनी कहानी कहते हैं।दरअसल अनुभव ही सच्चा ज्ञान है, ऐसे ही लोगों का उजास भरा उज्ज्वल भविष्य होता है।कर्म करने से ऊर्जा प्राप्त होती है, बशर्तें विश्वास कायम रहे। आपने लम्बा संघर्ष करके पेंशनरों को न्याय दिलाया। मुख्य अतिथि डॉ.कर ने कहा कि मनुष्य जन्म लेने से व्यक्ति नहीं होता जो व्यक्त होता है वही व्यक्ति कहलाता है।अभिव्यक्ति मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती होती है और जो लोग उसकी मर्यादा का ध्यान रखते है वो हमेशा लोगों के प्रिय पात्र बने रहते हैं।अपने सारगर्भित उद्बोधन में विशिष्ट अतिथि डुमनलाल ध्रुव ने कहा कि विचारों की गरिमा और सामाजिक उत्तरदायित्व अभिव्यक्ति की मर्यादा होती है साहित्य मानवीय संवेदनाओं को जागृत करने और जीवन-मूल्यों की स्थापना करने का सशक्त माध्यम है ।साहित्यकार अपने शब्दों के माध्यम से समाज की विसंगतियों, मानवीय व्यवहारों तथा समकालीन परिस्थितियों को अभिव्यक्त करता है। पल्लवी झा ‘रूमा’ के सफल संचालन में प्रांत के विभिन्न जिलों से आए जिन रचनाकारों ने सहभागिता निभाई उनमें डॉ.चितरंजन कर, गिरीश पंकज,डॉ.माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’, डुमनलाल ध्रुव, रामेश्वर शर्मा,राजेश जैन ‘राही’ उदयभान सिंह चौहान,सुरेन्द्र रावल, संजीव ठाकुर, डॉ.रविन्द्र सरकार ,डॉ.महेंद्र कुमार ठाकुर, पल्लवी झा ‘रूमा’, पूर्वा श्रीवास्तव, सुषमा पटेल, हरीश कोटक. राजकुमार सोनी, छबिलाल सोनी,गणेशदत्त झा,यशवंत यदु, राजेन्द्र रायपुरी ,विवेक राहटगाँवकर, एच.एल. चन्द्राकर,डॉ.सिद्धार्थ श्रीवास्तव ,राजेन्द्रओझा, कुमार जगदली,नर्मदाप्रसाद विश्वकर्मा ,माधुरी कर,मुरलीधर गोंडाने ‘नीर’, कल्याणी तिवारी’ कोकि’,गोपाल सोलंकी,मंजूषा अग्रवाल, शशांक खरे,शकुंतला तरार,जुगल किशोर सेन, रवि भोई,आर.बी.साहू,रामस्वरूप साहू, लतिका भावे,लतिका साहू,डॉ.मनीष श्रीवास्तव,उदयराम साहू,चन्द्रशेखर साहू, वीरेंद्र सिंह साहू,नीलिमा मिश्रा,डॉ.गोपा शर्मा, अनिता झा एवं शकुंतला तिवारी के नाम प्रमुख हैं। काव्य गोष्ठी में विविध विधाओं की पढ़ी गईं रोचक रचनाओं के प्रमुख अंश निम्नानुसार हैं-
● ज़िन्दगी हँसाने का, रुलाने का नहीं,
दिल में जगह बनाने का, दुखाने का नहीं।
दुखिया का दर्द घटाने का, बढ़ाने का नहीं,
गिरते हुए को थाम लेने का, गिराने का नहीं।
-राजकुमार सोनी
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● पहले चम्मच थे स्टील, लकड़ी और बांस के,
अब बनने लगे है चमचे हाड़ मांस के।
-डॉ. रविंद्रनाथ सरकार
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● सजी हुई है भोजन थाली।
माँ ने ममता इसमें डाली।।
चीजें पोषक तत्वों वाली।
मुख की होगी रंगत लाली।।
– पल्लवी झा (रूमा)
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● दीप जलाऊँ उस कुटिया में, जिसमें बूढी मां रहती है । झुकी कमर और जर्जर मन से बेटे की वह राह तकती है ।
-पूर्वा श्रीवास्तव
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● खप्पर वाली अंबे तुम्हरी याद जो आए,याद जो आए मैया बडा दुख पाए,—
मैहर के द्वारे तेरी बाट निहारूं, आजा ओ मैया तुम्हें कब से पुकारुं, चैत्र कुंवार देखूँ मैं आस लगाए रे,आस लगाए।
-शकुंतला तिवारी “कल्पना ”
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●रुला रहा है प्याज।।
प्याज में आई भारी महंगाई।
दूल्हे की होने वाली थीं सगाई।।
उन्हें पसंद थी भजिया
भजिया में नहीं था प्याज।
दुल्हा हुआ नाराज।।
-यशवंत यदु
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● हार गया तन मन
श्रृँगार कर तुम्हें
कितनी खूबसूरत है
ये पूजा के लम्हें।
-एच.एल.चन्द्राकर
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● ऋतु पावस की करें विदाई, सर्दी आने वाली है।धूप सुहानी तन-मन भाए, चंद्र किरण मतवाली है।।अलस पवन में ओस चमकती, सुषमा-सी दिलवाली है। धूप सुहानी तन-मन भाए, चंद्र किरण मतवाली है।।
-सुषमा पटेल’
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● माता जी,आ गयीं, करने खुशियों की बौछार रे।देख लो, हैं खड़ी, सारे भक्तों के ही द्वार रे।
सिंह पर करके,आयीं सवारी।माता रानी की सूरत है प्यारी। पैर दो, उनके हैं,
पर भुजा देखो, हैं चार रे।
– राजेंद्र रायपुरी
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● असत्य के घने काले बादल, छाए चहुं ओर है।
इसकी बारिश कभी रुकती नहीं।
बरसने को हमेशा आतुर, प्रकृति इसी से
लबालब।बरसती है, निरंतर, अनवरत।
-श्रीमती कल्याणी तिवारी”कोकि ”
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● आप में ही कमी होगी कि लोग झुककर आदाब करते हैं।वर्ना देखो जमीं को,आसमां भी झुक गया है उसके सदजे में।
-हरीश कोटक
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● तेरा नाम रटते, रटते ।
गुजरे हैं , दिन हमारे ।
कब दोगे हमको दर्शन ।
तेरी राह हम निहारे ।
-छबि लाल सोनी
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●रेलगाड़ी हर कइसे धकधकाता है रे
तेरा सीट के डब्बा ओमा छप्पनसवारी
नाननान लइका पिचका संग मा महतारी
धकला धकली मा धकला धकली मा बाप को ओरमा डाला है रे
शकुंतला तरार
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● न दुःख की लकीर /पतली है न सुख की/
दुःख के समय हम/दुःख की लकीर को /
गाढ़ा करते रहे सुख के समय /सुख की लकीर को / गाढ़ा करना भूल गए
-राजेंद्र ओझा
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◆छोटी-छोटी खुशियां
धीरे-धीरे बहती,
जैसे धूप की पतली धारा
खिड़की की दरार से
संकोच से तैरती हो ।
-संजीव ठाकुर
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● घर जला दे वो आग मत रखना।
मन दुखा दे वो राग मत रखना ।।
कटघरे में तुम्हें खड़ा कर दे,
भूलकर वो सुराग मत रखना ।।
-डॉ.माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’
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कार्यक्रम के अंत में कुलदीप भारती ने आमंत्रित अतिथियों एवं रचनाकारों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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