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मनरेगा कांग्रेस की असफलता का स्मारक नहीं, बल्कि गरीब की गरिमा और अधिकार का प्रतीक है”: परवेज़ आलम गांधी

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लखनपुर संवाददाता विकास अग्रवाल।

लखनपुर।

कभी लोकसभा में प्रधानमंत्री द्वारा यह कहा गया था कि “मनरेगा कांग्रेस की असफलताओं का जीता-जागता स्मारक है”, लेकिन आज वही सरकार कांग्रेस की ऐतिहासिक और जनकल्याणकारी योजनाओं के नाम बदलकर उन पर अपनी तथाकथित ‘ओनरशिप’ जताने की होड़ में लगी हुई है।

मनरेगा कोई साधारण योजना नहीं, बल्कि यह देश के सबसे गरीब, वंचित और मेहनतकश नागरिक को पहली बार काम का कानूनी अधिकार और सम्मान के साथ रोज़गार देने वाली एक क्रांतिकारी पहल है। यह योजना कांग्रेस की सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की दूरदर्शी सोच का परिणाम है।आज मोदी सरकार द्वारा मनरेगा के नाम से ‘महात्मा गांधी’ हटाकर ‘पूज्य बापू’ जोड़ना केवल नाम बदलने की राजनीति और स्टिकर-बाज़ी का नया उदाहरण है। सवाल यह है कि क्या नाम बदलने से मजदूरों की रुकी हुई मजदूरी मिल जाएगी?
क्या मनरेगा के बजट में की गई कटौती वापस आ जाएगी?
क्या इससे ग्रामीण गरीबों को ज़्यादा दिन का काम मिलेगा?

हकीकत यह है कि इस सरकार का काम और मजदूर दोनों से कोई सरोकार नहीं है। बापू के नाम का प्रयोग करने वाली यह सरकार उनके सत्य, श्रम और स्वावलंबन के सिद्धांतों को पहले ही कुचल चुकी है। अब केवल शब्दों के खेल के ज़रिए जनता को भ्रमित किया जा रहा है। मनरेगा, स्वर्गीय डॉ. मनमोहन सिंह जी और कांग्रेस की उस दूरदर्शी सोच की जीत है, जिसने देश के करोड़ों गरीब परिवारों के जीवन में बदलाव लाया। यह विरासत इतनी गहरी है कि इसे नाम बदलकर या इतिहास मिटाकर समाप्त नहीं किया जा सकता। कांग्रेस ने काम दिया, अधिकार दिया और सम्मान दिया
और यह सच किसी भी सरकार के शब्दों के हेर-फेर से बदलने वाला नहीं है।

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