एक तरफ राज्य शासन के द्वारा शाल प्रवेश उत्सव की पूर्ण तैयारी तथा दूसरी तरफ शिक्षकों में मायूसी
एक शिक्षक का पीड़ा रामचंद्र सोनवंशी के द्वारा बयान करते हुए हम सभी शिक्षक बच्चों के साथ अन्याय न होने देंगे और जितने दिन तक सेवा में रहेंगे तब तक पूरा तन मन धन से बच्चों की उज्जवल भविष्य का कामना करते हुए शाला प्रवेश उत्सव में तन मन से कार्य करेंगे परंतु सेवा के अनिश्चित को देखते हुए मन में खटास आई है
यह विडंबना ही है कि जो शिक्षक देश के कर्णधारों यानी बच्चों का भविष्य संवारते हैं, उनका अपना भविष्य अक्सर प्रशासनिक अपेक्षा एवं सुप्रीम कोर्ट द्वारा सेवारत शिक्षकों के लिए टेट अनिवार्य करने के कारण उनका भविष्य अनिश्चित है।भारी प्रशासनिक बोझ: गैर-शैक्षणिक कार्यों (जैसे चुनाव ड्यूटी, जनगणना, और अन्य सरकारी काम) के कारण शिक्षकों का ध्यान मूल शिक्षण से भटक जाता है।पारदर्शिता और पदोन्नति का अभाव: कई राज्यों में समय पर पदोन्नति न होना और उचित सम्मान न मिलना शिक्षकों के मनोबल को गिराता है।शिक्षकों को राष्ट्र का निर्माता माना जाता है, इसलिए उनके सामाजिक और आर्थिक हितों की सुरक्षा करना एक विकसित समाज के लिए सबसे जरूरी कदम है।
देश का भविष्य संवारने वाले शिक्षकों का स्वयं असुरक्षित होना हमारी शिक्षा प्रणाली की एक बड़ी विडंबना है。15 से 20 वर्षों का अमूल्य अनुभव रखने वाले शिक्षकों को अक्सर नौकरी की अनिश्चितता, , टीईटी (TET) जैसी अनिवार्य परीक्षाओं का दबाव, और पेंशन की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है。
इस असुरक्षा के प्रमुख कारण
मानसिक तनाव और दबाव: जो शिक्षक वर्षों से पढ़ा रहे हैं, उन पर अचानक टीईटी (TET) जैसी प्रतियोगी परीक्षाएं पास करने का दबाव डालना उन्हें मानसिक तनाव में डालता है
。अनियमित सेवा शर्तें:
कई अनुभवी और योग्य शिक्षक, स्थायी रोजगार अनिश्चितता: लंबे समय के योगदान के बाद भी बुढ़ापे में पेंशन या उचित ग्रेच्युटी न मिलना, शिक्षकों और उनके परिवारों के भविष्य को अंधकारमय बना देता है。
सुप्रीम कोर्ट द्वारा सेवारत शिक्षकों के लिए भी टीईटी (TET) को अनिवार्य करने तथा परीक्षा के कड़े नियमों को लेकर शिक्षकों में भारी चिंता है। इसी भारी तनाव, नौकरी की असुरक्षा और दबाव के कारण छत्तीसगढ़ सहित अन्य राज्यों में स्कूलों और शिक्षकों में किसी भी ‘सर्वश्रेष्ठ उत्सव’ को लेकर उत्साह नजर नहीं आ रहा है।सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भले ही किसी शिक्षक के पास दशकों का अनुभव हो, फिर भी उन्हें अगस्त 2028 तक हर हाल में टीईटी परीक्षा उत्तीर्ण करनी होगी। इसके साथ ही जो शिक्षक इस परीक्षा को पास नहीं कर पाएंगे, उन्हें अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है। वर्तमान में कई राज्यों, विशेषकर छत्तीसगढ़ में लगभग 80,000 से अधिक सेवारत शिक्षक इस बात से परेशान हैं कि जो योग्यता उनकी नियुक्ति के समय लागू नहीं थी, उसे अब उन पर क्यों थोपा जा रहा है
अंत में रामचंद्र सोनवंशी के द्वारा सरकार से करबद्ध निवेदन करते हुए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को तत्काल अध्यादेश लाकर शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2010 एवं संशोधन 2017 के पूर्व शिक्षकों को टेट की अनिवार्यता समाप्त करने हेतु प्रस्ताव करने की मांग करता है








