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नगर निगम मुख्यालय की छत से टपका पानी, पार्षदों की जगह सोफे पर बैठे गमले; जलभराव पर चर्चा के लिए बुलाई गई सामान्य सभा खुद हुई जलमग्न

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रायपुर संवाददाता – रघुराज
राजधानी के नगर निगम मुख्यालय में आज एक ऐसा नजारा देखने को मिला, जिसने न केवल पार्षदों को लज्जित किया बल्कि निगम प्रशासन की दावों की पोल खोलकर रख दी। शहर में मानसून की पहली भारी बारिश क्या हुई, नगर निगम का आलीशान मुख्यालय खुद जलभराव का शिकार हो गया। विडंबना यह थी कि आज निगम में शहर के अलग-अलग वार्डों में होने वाले जलभराव और ड्रेनेज सिस्टम की बदहाली पर चर्चा करने के लिए विशेष सामान्य सभा बुलाई गई थी। लेकिन सभा शुरू होने से ठीक पहले सदन के भीतर और गैलरी में इस कदर पानी टपकने लगा कि वहां बैठना मुहाल हो गया। स्थिति इतनी हास्यास्पद और गंभीर हो गई कि जिस सोफे पर पार्षदों को बैठकर जनता की समस्याओं पर मंथन करना था, वहां पानी से बचने के लिए पार्षदों की जगह पेड़-पौधों के गमले रखने पड़ गए।
सामान्य सभा की बैठक शुरू होने से पहले ही शहर में झमाझम बारिश शुरू हो गई थी। देखते ही देखते नगर निगम भवन की छत से पानी का रिसाव होने लगा। सदन के भीतर मुख्य सोफे और कुर्सियों के ठीक ऊपर से पानी की मोटी धारें गिरने लगीं। कर्मचारी आनन-फानन में बाल्टियां और टब लेकर दौड़े, लेकिन पानी का बहाव इतना तेज था कि कुछ ही देर में फर्श पर पानी जमा हो गया। सबसे ज्यादा फजीहत उस वक्त हुई जब विपक्ष और सत्ता पक्ष के पार्षदों के बैठने के लिए लगाए गए वीआईपी सोफों पर पानी सीधे गिरने लगा। सोफे पूरी तरह भीग न जाएं और वहां कोई बैठ न सके, इसलिए कर्मचारियों ने सूझबूझ (या शायद मजबूरी) दिखाते हुए वहां रखे बड़े-बड़े इनडोर प्लांट्स के गमलों को सोफे के ऊपर लाकर रख दिया। देखते ही देखते यह नजारा सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे।
 
इस पूरे घटनाक्रम के बाद विपक्ष को बैठे-बिठाए एक बड़ा मुद्दा मिल गया। मुख्य विपक्षी दल के पार्षदों ने सदन के भीतर और बाहर जमकर हंगामा किया। विपक्ष के नेता ने तीखा तंज कसते हुए कहा कि जो नगर निगम करोड़ों रुपये का बजट पास करके पूरे शहर को जलभराव से मुक्ति दिलाने का दावा करता है, वह अपनी खुद की छत की मरम्मत नहीं करा पा रहा है। उन्होंने कहा कि आज जब शहर की जनता घुटने भर पानी में डूब रही है, तब निगम के भीतर पार्षदों की जगह गमलों को सोफे पर बिठाया जा रहा है। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि निगम प्रशासन पूरी तरह से खोखला हो चुका है और प्री-मानसून तैयारियों के नाम पर केवल कागजी खानापूर्ति की गई है।
दूसरी ओर, इस अजीबोगरीब स्थिति से सत्ता पक्ष और निगम के आला अधिकारी पूरी तरह असहज नजर आए। महापौर और निगम कमिश्नर ने स्थिति को संभालने की कोशिश की, लेकिन पानी की बूंदों के सामने उनके तर्क भी बहते नजर आए। महापौर ने सफाई देते हुए कहा कि भवन काफी पुराना हो चुका है और इस बार की बारिश अत्यधिक तीव्र थी, जिसके कारण वॉटरप्रूफिंग में कुछ समस्या आ गई। उन्होंने तुरंत लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों को तलब किया और कड़ी फटकार लगाते हुए जांच के आदेश दिए। कमिश्नर ने भी माना कि यह एक गंभीर चूक है और इसके लिए जिम्मेदार इंजीनियरों और ठेकेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
इस घटना ने न केवल निगम की साख पर बट्टा लगाया है, बल्कि आम जनता के बीच भी एक बेहद नकारात्मक संदेश दिया है। शहर के नागरिकों का कहना है कि जब नगर निगम अपने खुद के दफ्तर को बारिश के पानी से नहीं बचा पा रहा है, तो वह पूरे शहर के ड्रेनेज सिस्टम को कैसे ठीक रखेगा। टैक्सपेयर्स के पैसों से बने इस आलीशान भवन की यह दुर्दशा देखकर लोग सोशल मीडिया पर जमकर भड़ास निकाल रहे हैं। लोगों का कहना है कि हर साल नालियों की सफाई और सड़कों के सुधार के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं, लेकिन पहली ही जोरदार बारिश में भ्रष्टाचार और लापरवाही की परतें खुलकर सामने आ जाती हैं।
हंगामे और पानी के टपकने के बीच सामान्य सभा की कार्रवाई को कुछ देर के लिए स्थगित भी करना पड़ा। बाद में जैसे-तैसे कुर्सियों को खिसकाकर और सुरक्षित स्थानों पर बैठकर बैठक की औपचारिकता पूरी की गई। लेकिन इस बैठक का जो मुख्य उद्देश्य था यानी शहर के जलभराव की समस्या का समाधान ढूंढना, वह पूरी तरह से इस ‘गमला कांड’ की भेंट चढ़ गया। विपक्ष ने इस मामले में उच्च स्तरीय जांच और जिम्मेदार अधिकारियों के निलंबन की मांग की है। अब देखना यह होगा कि इस फजीहत के बाद क्या निगम प्रशासन जागता है या फिर अगली बारिश में फिर से पार्षदों की जगह गमले ही सोफे की शोभा बढ़ाते नजर आएंगे।

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