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छत्तीसगढ़ में भारत ग्रुप पर करोड़ों की ठगी का गंभीर आरोप, रोजाना 2000 रुपये कमाने का झांसा देकर 200 से अधिक लोग बने शिकार

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रायपुर संवाददाता – रघुराज
कौन सी कंपनी है और कैसे रचा गया ठगी का पूरा खेल?
इस पूरे मामले में जिस संस्था या कंपनी का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है, उसका नाम भारत ग्रुप है। भारत ग्रुप का कार्यालय रायपुर के फाफाडीह इलाके में स्थित बताया जा रहा है। कंपनी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब डिजिटल न्यूज चैनलों पर बड़े पैमाने पर अपने विज्ञापनों का प्रचार-प्रसार किया। विज्ञापनों में यह दावा किया जाता था कि कोई भी महिला, पुरुष या बेरोजगार व्यक्ति अपने घर में अगरबत्ती बनाने की ऑटोमेटिक मशीन लगाकर हर दिन 100 किलोग्राम तक अगरबत्ती का उत्पादन कर सकता है। इसके एवज में कंपनी का वादा था कि उत्पादित पूरा माल वह खुद ही वापस खरीदेगी (बायबैक पॉलिसी) और इसके बदले में लोगों को रोजाना 2000 रुपये तक की सीधी कमाई होगी। यानी महीने के 60,000 रुपये कमाने का लुभावना लालच दिया गया।
विज्ञापनों का मायाजाल और बायबैक का फर्जी एग्रीमेंट
चिटफंड कंपनियों के बंद होने के बाद छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में इस तरह के बायबैक स्कैम का एक नया जरिया बन गया है। भारत ग्रुप ने आम लोगों का भरोसा जीतने के लिए 10 रुपये या मामूली स्टाम्प पेपर पर 2 से 5 साल तक का एग्रीमेंट साइन कराया। इस एग्रीमेंट में यह लिखा होता था कि कंपनी द्वारा कच्चा माल (रॉ मटेरियल) उपलब्ध कराया जाएगा और तैयार माल की डिलीवरी मिलने के 7 दिनों के भीतर भुगतान कर दिया जाएगा।
हालांकि, जब लोग मशीन खरीदकर अपने घर ले गए, तब एग्रीमेंट की शर्तें पूरी तरह बेमानी साबित हुईं। लोगों को झांसा देकर 100 किलो daily प्रोडक्शन का दावा किया गया था, लेकिन हकीकत में 8 से 10 घंटे मशीन चलाने के बाद भी मुश्किल से 8 से 15 किलो माल ही बन पाता था।
कितने का है यह स्कैम और कैसे हुआ आर्थिक शोषण?
इस घोटाले का दायरा केवल एक या दो शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे छत्तीसगढ़ में फैल चुका है। पीड़ितों के अनुसार, अब तक प्रदेश के 200 से भी अधिक लोग इस ठगी के शिकार हो चुके हैं। यदि आर्थिक नुकसान का हिसाब लगाया जाए, तो प्रति व्यक्ति 1.25 लाख रुपये से लेकर 2.50 लाख रुपये तक की चपत लगी है। इस हिसाब से यह घोटाला करोड़ों रुपये का बैठता है।
ठगी का गणित इस प्रकार है:
बाजार में जिस ऑटोमेटिक अगरबत्ती मशीन की असली कीमत 40,000 से 50,000 रुपये के बीच होती है, उसे भारत ग्रुप द्वारा 1,15,000 रुपये से लेकर 1,25,000 रुपये तक में बेचा गया। इसके अलावा, कच्चे माल (रॉ मटेरियल) के नाम पर अलग से 1,00,000 रुपये से 1,48,000 रुपये तक वसूले गए। इतना ही नहीं, मशीन खराब होने पर पार्ट्स बदलने के नाम पर जो सामान बाजार में 200 रुपये का मिलता था, उसके लिए कंपनी 1200 से 1500 रुपये तक ऐंठती थी। इसके बाद भी कोई कुशल तकनीशियन (टेक्निशियन) मदद के लिए नहीं भेजा जाता था।
घटिया मशीनरी और मेंटेनेंस के नाम पर अलग से वसूली
पीड़ितों ने बताया कि जब वे मशीन ले जाकर अपने घरों में स्थापित करते थे, तो पहले या दूसरे दिन ही मशीन का पिस्टल टूट जाता था, सेंसर खराब हो जाता था या स्टिक फंसने लगती थी। मशीन में उपयोग किया जाने वाला कच्चा माल भी बेहद घटिया गुणवत्ता का था। जब मशीन ठीक कराने के लिए कंपनी के एचआर या कस्टमर केयर से संपर्क किया जाता था, तो कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिलता था।
तकनीशियन को बुलाने के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता था और आने पर भी 1000 से 2000 रुपये तक सर्विस चार्ज के रूप में वसूले जाते थे। इसके बावजूद मशीन दोबारा दो दिन बाद बंद पड़ जाती थी। जब पीड़ित अपना तैयार माल लेकर कंपनी के दफ्तर या गोडाउन पहुंचते थे, तो उन्हें यह कहकर लौटा दिया जाता था कि अभी माल की छंटाई नहीं हुई है या बाद में आना। महीनों तक चक्कर काटने के बाद भी उनके पैसे का भुगतान नहीं किया जाता था।
पीड़ित परिवारों की दर्दनाक आपबीती: कर्ज, गिरवी जेवर और पारिवारिक तनाव
इस ठगी ने कई हंसते-खेलते परिवारों को बर्बादी की कगार पर पहुंचा दिया है। छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों से आए पीड़ितों ने रोते-बिलखते अपनी दास्तान साझा की:
रायपुर के गोंदवारा निवासी संजू राम ने बताया कि उन्हें सोशल मीडिया के जरिए झांसा दिया गया। जब मशीन नहीं चली तो कंपनी के लोग अब उल्टा उन्हीं पर झूठे आरोप लगा रहे हैं।
जांजगीर-चांपा की बबली (सुशीला पनका) ने बताया कि वे 5 क्विंटल कच्चा माल लेकर गई थीं, लेकिन दिनभर में 2 से 4 किलो से ज्यादा माल नहीं बनता था। चार बोरी माल आज भी उनके घर में सड़ रहा है।
बेमेतरा की राखी जोबा ने बताया कि उनके पास नकद पैसे नहीं थे। उन्होंने बैंक से लोन लिया और अब हर महीने भारी ब्याज चुका रही हैं। एक महीने मेहनत करके 3 क्विंटल माल बनाकर दिया, लेकिन आज तक एक भी पैसा नहीं मिला।
कवर्धा की विजय कुमार साहू और रमतला के घनश्याम साहू ने बताया कि उन्होंने अपने सोने-चांदी के जेवर गिरवी रखकर मशीन खरीदी थी। तनाव के कारण परिवार में स्थिति बेहद गंभीर हो गई। महाजन और बैंक वाले ब्याज के लिए लगातार फोन कर रहे हैं, जिससे घर में रोज कलह और तनाव का माहौल रहता है।
कवर्धा की एक अन्य पीड़िता ने नम आंखों से बताया कि उनके पति अपने बच्चे के भविष्य और घर में स्वरोजगार के लिए मशीन खरीदने रायपुर आए थे। उन्होंने जेवर गिरवी रखकर पैसे जुटाए थे। लेकिन इस ठगी के तनाव और कर्ज के बोझ तले उनके पति का निधन हो गया। अब वे अपनी छोटी बच्ची के साथ बेसहारा होकर मायके में रहने को मजबूर हैं।
बलौदाबाजार के लक्ष्मण साहू ने बताया कि उन्होंने बंधन बैंक से अपनी पत्नी के नाम पर लोन लिया था, जिसकी 10,000 रुपये महीने की किश्त उन्हें पटानी पड़ रही है। कमाई एक रुपये की नहीं हो रही, उल्टा घर से पैसा जा रहा है।
पूरे छत्तीसगढ़ के अनेक जिलों में फैला ठगी का जाल
यह मामला किसी एक क्षेत्र का नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, रायपुर, जांजगीर-चांपा, बेमेतरा, राजनांदगांव, कवर्धा (कबीरधाम), पंडरिया, बलौदाबाजार, दुर्ग, धमतरी और महासमुंद सहित छत्तीसगढ़ के कई जिलों के सीधे-साधे ग्रामीण और महिलाएं इस झांसे में फंस चुके हैं। ठगों ने सोशल मीडिया विज्ञापनों का सहारा लेकर दूर-दराज के गांव-गांव तक अपना जाल फैलाया।
प्रशासनिक उदासीनता और पीड़ितों की लाचारी
ठगी के शिकार दर्जनों लोग जब एकजुट होकर अपनी फरियाद लेकर रायपुर के कलेक्टर और पुलिस कमिश्नर (एसएसपी) दफ्तर पहुंचे, तो उन्हें वहां से भी निराशा ही हाथ लगी। पीड़ितों का आरोप है कि अधिकारियों ने उनकी शिकायत पर ठोस एफआईआर दर्ज करने के बजाय उल्टा उन्हें ही फटकार लगा दी कि आप लोग बच्चे थोड़ी हैं जो इस तरह के झांसे में आ गए। कलेक्टर ऑफिस से कमिश्नर ऑफिस और कमिश्नर ऑफिस से उपभोक्ता फोरम (कंज्यूमर फोरम) जाने की सलाह देकर अधिकारियों ने अपना पल्ला झाड़ लिया।
न्याय की कोई उम्मीद न दिखने पर अब सभी पीड़ित संगठित होकर उपभोक्ता फोरम और अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं।
ठगी के इस नए पैटर्न से कैसे बचें और क्या सबक लें?
यह मामला छत्तीसगढ़ की जनता के लिए एक बड़ी चेतावनी है। किसी भी कंपनी का आकर्षक विज्ञापन देखकर या घर बैठे लाखों रुपये कमाने के वादे पर आंख मूंदकर भरोसा न करें।
बायबैक गारंटी वाले विज्ञापनों से सतर्क रहें: अगर कोई कंपनी आपको मशीन बेचकर खुद ही माल खरीदने का दावा करती है, तो उसकी कानूनी मान्यता और बाजार दर की गहन जांच-पड़ताल करें।
बाजार दर से दोगुनी कीमत न दें: जिस मशीन की कीमत बाजार में 40,000 रुपये है, उसके लिए 1.25 लाख रुपये कभी न दें।
एग्रीमेंट की कानूनी वैधता जांचें: 10 रुपये के साधारण कागज पर किया गया एग्रीमेंट अक्सर कानूनी रूप से कमजोर होता है।
लोन या जेवर गिरवी रखकर निवेश न करें: बिना पूरी जानकारी के बैंक लोन या जेवर गिरवी रखकर किसी अनजान बिजनेस मॉडल में पैसा न लगाएं।

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