हारून रशीद –
दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल के वार्ड नंबर 1, बंगाली कैंप में एक सामुदायिक भवन पिछले 14 वर्षों से अधूरा पड़ा है, जो अब स्थानीय लोगों के लिए विकास की बजाय सवालों का प्रतीक बन चुका है।
अधूरा सपना, खड़ा ढांचा
करीब 14 साल पहले इस भवन की नींव इस वादे के साथ रखी गई थी कि—
- यहाँ सामुदायिक कार्यक्रम होंगे
- शादियाँ और सामाजिक आयोजन होंगे
- मोहल्ले को एक सार्वजनिक स्थान मिलेगा
लेकिन आज स्थिति यह है कि:
- दीवारें खड़ी हैं, पर छत नहीं है
- ढांचा बना है, पर उपयोग नहीं हो रहा
- समय बीत गया, लेकिन काम अधूरा है
सबसे बड़ा सवाल: पैसा कहाँ गया?
स्थानीय लोगों के अनुसार परियोजना में बार-बार देरी हुई और काम पूरा नहीं हो सका। अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि—
आखिर निर्माण के लिए स्वीकृत धनराशि का सही उपयोग हुआ या नहीं?
लोगों का आरोप है कि काम बीच में ही रुक गया और जिम्मेदारी तय नहीं हुई।
प्रशासनिक चुप्पी पर सवाल
14 वर्षों में न तो कोई ठोस जांच सामने आई, न ही परियोजना को पूरा करने की कोई स्पष्ट समयसीमा तय हुई। इस लंबे समय से जारी स्थिति ने लोगों में निराशा और सवाल दोनों बढ़ा दिए हैं।
विकास या सिर्फ दिखावा?
यह मामला केवल एक भवन का नहीं है, बल्कि यह सवाल खड़ा करता है कि—
क्या योजनाएँ वास्तव में ज़मीन पर उतरती हैं, या सिर्फ कागजों में पूरी होती हैं?
जनता की आवाज़
स्थानीय लोग अब जवाब चाहते हैं—
- परियोजना में देरी क्यों हुई?
- जिम्मेदार कौन है?
- और अधूरा काम कब पूरा होगा?
यह मामला एक बार फिर यह याद दिलाता है कि विकास केवल घोषणा नहीं, बल्कि समय पर पूरा होने वाली जिम्मेदारी है।








