संवाददाता – राजेन्द्र जायसवाल
बिलासपुर/जांजगीर-चांपा। कानून का उद्देश्य अपराधियों में भय और आम नागरिकों में सुरक्षा की भावना पैदा करना है। लेकिन जब किसी शिकायत में यह आरोप सामने आए कि पुलिस कार्रवाई और जेल भेजने का डर दिखाकर लाखों रुपये की मांग की गई, तब यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं रह जाता, बल्कि कानून के शासन और न्याय व्यवस्था पर जनता के विश्वास का प्रश्न बन जाता है।
तारबाहर थाना क्षेत्र से सामने आए कथित एक्सटॉर्शन प्रकरण ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। शिकायत के अनुसार एक युवक के परिजनों से पहले 5 लाख रुपये की मांग की गई। आरोप है कि पुलिस कार्रवाई और जेल भेजने का भय दिखाकर दबाव बनाया गया। शिकायत में यह भी कहा गया है कि दबाव में आकर परिजनों ने 1 लाख रुपये बैंक खाते में ट्रांसफर किए, लेकिन इसके बाद भी शेष 4 लाख रुपये की मांग और कथित दबाव जारी रहा।
यदि ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो यह साधारण धोखाधड़ी नहीं, बल्कि कानून के नाम का दुरुपयोग कर कथित उगाही का अत्यंत गंभीर मामला होगा।
पत्रकारिता की साख पर भी सवाल
समाचारों के अनुसार इस प्रकरण में चांपा निवासी महेंद्र कुमार देवांगन का नाम भी सामने आने का दावा किया गया है। यह भी कहा गया है कि वे प्रकाश इंडस्ट्रीज लिमिटेड से जुड़े कर्मचारी हैं। हालांकि यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इन आरोपों की पुष्टि निष्पक्ष पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।
यदि जांच में किसी पत्रकार या पत्रकारिता से जुड़े व्यक्ति की भूमिका सिद्ध होती है, तो यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की गरिमा पर गंभीर आघात होगा। पत्रकारिता का उद्देश्य जनता की आवाज़ उठाना और सत्ता से जवाबदेही सुनिश्चित करना है, न कि भय, प्रभाव या पहचान का इस्तेमाल कर किसी प्रकार की अवैध वसूली करना।

एक गिरफ्तारी, बाकी आरोपी कब?
मामले में एक आरोपी की गिरफ्तारी होने की जानकारी सामने आई है, जबकि शिकायत के अनुसार अन्य आरोपियों की तलाश जारी है।
ऐसे में जनता के मन में स्वाभाविक प्रश्न उठ रहे हैं—
यदि पर्याप्त साक्ष्य हैं तो शेष आरोपियों की गिरफ्तारी में देरी क्यों?
क्या बैंक लेन-देन, कॉल डिटेल और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच पूरी हो चुकी है?
क्या सभी संदिग्ध व्यक्तियों से समान रूप से पूछताछ की जा रही है?
क्या जांच किसी दबाव से पूरी तरह मुक्त है?
इन सवालों का उत्तर केवल निष्पक्ष और समयबद्ध जांच ही दे सकती है।
पुलिस की निष्पक्षता ही सबसे बड़ी कसौटी
हर लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होती है। यदि किसी भी मामले में यह धारणा बनने लगे कि प्रभावशाली लोगों को राहत मिल रही है या कार्रवाई में अनावश्यक देरी हो रही है, तो इससे पूरे तंत्र की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
इसलिए आवश्यक है कि—
सभी डिजिटल साक्ष्यों की वैज्ञानिक जांच हो।
बैंक खातों के लेन-देन का परीक्षण किया जाए।
कॉल रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का विश्लेषण किया जाए।
यदि किसी के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं तो कानून के अनुसार तत्काल कार्रवाई की जाए।
यदि किसी व्यक्ति पर लगाए गए आरोप गलत सिद्ध हों, तो उसे भी न्याय मिले।
शासन-प्रशासन से अपेक्षा
ऐसे मामलों में जनता केवल गिरफ्तारी नहीं, बल्कि निष्पक्षता चाहती है। यदि शिकायत में दम है तो दोषियों को कानून के अनुसार कठोर दंड मिलना चाहिए। यदि आरोप निराधार हैं तो निर्दोष व्यक्तियों को अनावश्यक बदनामी से भी बचाया जाना चाहिए।
जांच जितनी पारदर्शी होगी, जनता का विश्वास उतना ही मजबूत होगा।
समाज के लिए संदेश
किसी भी नागरिक से यदि पुलिस, अदालत, पत्रकार या किसी प्रभावशाली व्यक्ति का नाम लेकर धन की मांग की जाती है, तो उसे भयभीत होने के बजाय तत्काल संबंधित पुलिस अधिकारियों को सूचना देनी चाहिए। किसी भी परिस्थिति में अवैध धनराशि देना समस्या का समाधान नहीं है।
यह प्रकरण केवल कथित उगाही का मामला नहीं है, बल्कि कानून, पत्रकारिता और प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा भी है।
यह प्रकरण केवल कथित उगाही का मामला नहीं है, बल्कि कानून, पत्रकारिता और प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा भी है। जनता चाहती है कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और शीघ्र पूरी हो। यदि जांच में किसी भी व्यक्ति की संलिप्तता प्रमाणित होती है, तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि आरोप सिद्ध नहीं होते, तो संबंधित व्यक्तियों की प्रतिष्ठा की भी रक्षा होनी चाहिए।
लोकतंत्र में न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। यही जनता की सबसे बड़ी अपेक्षा है।








