न कुछ लेकर आया जग में, न कुछ लेकर जाएगा,
फिर किस बात का अभिमान, जो पल में मिट जाएगा?
मुट्ठी बाँधकर आया था, खाली हाथ ही जाएगा,
साथ न धन, न मान, न शोहरत, कर्म ही साथ निभाएगा।
महलों पर मत इतराना, ये महल यहीं रह जाएँगे,
तेरे सारे स्वर्ण-खज़ाने, यहीं धरे रह जाएँगे।
जिस देह पर इतना गर्व है, एक दिन राख बन जाएगी,
काल की एक पुकार सुनो, हर साँस वहीं थम जाएगी।
सिंहासन भी झुक जाते हैं, सत्ता भी ढह जाती है,
समय की आँधी चलती है, हर हस्ती बह जाती है।
रावण का वैभव कहाँ गया? कंस कहाँ रह पाया है?
जिसने जग को अपना समझा, उसने ही पछताया है।
यदि इतराना ही है साथी, अपने सत्कर्मों पर इतराओ,
गिरते हुए किसी निर्धन को, अपने हाथों से उठाओ।
रोते हुए अधरों पर जाकर, मधुर हँसी बिखराओ तुम,
मानव होकर मानवता का, सच्चा धर्म निभाओ तुम।
हरि-नाम का धन जोड़ो, यही साथ तुम्हारे जाएगा,
प्रेम, दया, सेवा का दीपक, जीवनभर उजियारा लाएगा।
बाकी सब माया का मेला, पल में बिखर ही जाएगा,
न कुछ लेकर आया जग में, न कुछ लेकर जाएगा।
अहंकार की ऊँची दीवारें, एक दिन ढह ही जाएँगी,
सिर्फ़ प्रेम और सत्कर्मों की गाथाएँ रह जाएँगी।
न कुछ लेकर आया जग में, न कुछ लेकर जाएगा,
कर्मों से जो अमर हुआ, वही जग में याद आएगा।
✍️: राजकुमार सोनी, नया रायपुर, छत्तीसगढ़







