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सामाजिक व्यक्तित्व एवं कृतित्व समाज के प्रहरी रहे रामलाल बरिहा … “विंध्यवासिनी पुत्र रामलाल बरिहा : सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के एकमात्र आदिवासी साहित्यकार का अवसान”

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आलेख : वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीनारायण लहरे ‘साहिल’
 सारंगढ़
बिंझवार समाज ही नहीं, पूरे सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के साहित्यिक और शैक्षणिक जगत ने अपना एक आधार स्तंभ खो दिया है। ग्राम सालर में जन्मे और कनकबीरा को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले, विंध्यवासिनी पुत्र के नाम से विख्यात शिक्षाविद, साहित्यकार और समाज सुधारक रामलाल बरिहा जी का 22 सितम्बर 2026 को निधन हो गया। वे 74 वर्ष के थे। उनके निधन से साहित्य और समाज दोनों में एक ऐसा शून्य बना है जिसे भरना आसान नहीं है।
साधारण परिवार से असाधारण शिखर तक
रामलाल बरिहा का जन्म 07 जनवरी 1952 को सारंगढ़ अंचल के ग्राम सालर में एक साधारण जनजाति बिंझवार परिवार में हुआ था। पिता स्व. भागीरथी बरिहा और माता स्व. श्रीमती जगमती बरिहा ने घोर अभावों में भी उन्हें शिक्षा का संस्कार दिया। सोनाखान के अमर शहीद वीर नारायण सिंह के जीवन से प्रेरित होकर उन्होंने शिक्षा को अपना हथियार बनाया। अंग्रेजी में एम.ए. करने के बाद वे 1973 में शिक्षक बने और 2014 तक 41 वर्षों तक शिक्षा की अलख जगाते रहे।
समाज ने दिया सर्वोच्च सम्मान : प्रदेश उपाध्यक्ष से गुरुदेव तक 
रामलाल जी का समाज के प्रति समर्पण देखकर समाज ने भी उन्हें भरपूर सम्मान दिया। उनके संगठनात्मक क्षमता और निष्पक्ष नेतृत्व के कारण समाज ने उन्हें छत्तीसगढ़ प्रदेश स्तर पर बिंझवार समाज का उपाध्यक्ष बनाया। यह पद केवल पद नहीं था, बल्कि पूरे प्रदेश के समाज ने उनके प्रति अपना विश्वास व्यक्त किया था।
इसके साथ ही वे विंध्यवासिनी मंदिर निर्माणकर्ता के रूप में तो जाने ही जाते हैं, साथ ही उन्होंने समाज में सभापति के रूप में भी लंबे समय तक कार्य का निर्वहन किया। सभापति के रूप में उन्होंने समाज के कई जटिल विवादों को सुलझाया, सामाजिक न्याय की स्थापना की और समाज को अनुशासन सिखाया। उनके फैसले को सभी स्वीकार करते थे क्योंकि उसमें निष्पक्षता और अनुभव होता था।
आज यही कारण है कि आज पूरा समाज उन्हें गुरुदेव के रूप में सम्मान करता है। बिंझवार समाज के बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के मुंह पर उनके लिए एक ही शब्द है – गुरुदेव। यह उपाधि उन्हें किसी विश्वविद्यालय ने नहीं, बल्कि समाज ने दी है। यह सम्मान किसी भी उपाधि से बड़ा है।
जिले के एकमात्र आदिवासी साहित्यकार
रामलाल बरिहा जी की एक और ऐतिहासिक पहचान यह है कि वे सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के एकमात्र ऐसे आदिवासी साहित्यकार थे, जिनकी कृति पर विश्वविद्यालय स्तर पर शोध कार्य हुआ। उनकी कालजयी कृति “विंध्यवासिनी पुत्र बिंझवार” (2016) ने बिंझवार समाज को पहली बार लिखित इतिहास, संस्कृति और अस्मिता दी। यह पुस्तक समाज का गौरव-ग्रंथ बन चुकी है।
थीसिस में शामिल हुई कृति, PhD में हुआ मूल्यांकन
उनके साहित्यिक अवदान को अकादमिक मान्यता भी मिली। शिक्षाविद डॉ. पुष्पा बरिहा कहती हैं – “मैंने अपनी PhD थीसिस में बरिहा जी की कृति ‘विंध्यवासिनी पुत्र बिंझवार’ को शामिल किया है। यानि इनकी रचना पर पीएचडी हो चुकी है।”
डॉ. पुष्पा बरिहा की थीसिस का विषय है – “सारंगढ़ बिलाईगढ़ अंचल के रचित निबंध साहित्य में डॉ. गौतमसिंह पटेल की साहित्यिक रचनाओं का मूल्यांकन परक अध्ययन”। इस महत्वपूर्ण शोध-ग्रंथ में उन्होंने रामलाल बरिहा जी के साहित्य को भी एक स्वतंत्र अध्याय के रूप में शामिल कर उनके शिक्षाविद और साहित्यकार व्यक्तित्व का गहन मूल्यांकन किया है। डॉ. पुष्पा बरिहा के अनुसार, उनका साहित्य केवल साहित्य नहीं, बल्कि समाजशास्त्र है।
कनकबीरा में आस्था से एकता का सूत्र
साहित्य के साथ-साथ उन्होंने आस्था के माध्यम से भी समाज को जोड़ा। सारंगढ़ मुख्यालय के समीप ग्राम कनकबीरा में उन्होंने अपनी कुलदेवी माँ विंध्यवासिनी का भव्य मंदिर निर्माण कराया। आज वह मंदिर बिंझवार समाज के सामाजिक एकता का महाकुंभ है। इस पुनीत कार्य में उनके छोटे पुत्र आनंद बरिहा ने कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया।
अंत तक समाज के लिए समर्पित
जीवन के अंतिम वर्षों में वे लकवा ग्रस्त हो गए थे। शरीर शिथिल हो गया था, लेकिन मन कभी थका नहीं। चारपाई पर लेटे-लेटे भी वे युवाओं को एकता का उपदेश देते रहते थे।
एक शिक्षक, एक प्रदेश उपाध्यक्ष, एक सभापति, एक मंदिर निर्माता, एक ऐसा साहित्यकार जिसके साहित्य पर PhD हुई और जिसे आज पूरा समाज गुरुदेव कहता है – ऐसा बहुआयामी व्यक्तित्व बार-बार जन्म नहीं लेता।
विंध्यवासिनी पुत्र, गुरुदेव रामलाल बरिहा जी को शत-शत नमन।

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