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धान की बालियों पर भूरा माहो का हमला, महंगी दवाइयों के बावजूद नियंत्रण नहीं!

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संवाददाता – राजेन्द्र जायसवाल
जांजगीर-चांपा में धान उत्पादक किसानों की बढ़ी चिंता, फसल सूखने और उत्पादन घटने का खतरा; कृषि विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल
जिला जांजगीर-चांपा, छत्तीसगढ़।
जांजगीर चांपा में जिले में धान की फसल पर भूरा माहो कीट का प्रकोप किसानों के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। खेतों में लहलहाती धान की फसल को बचाने के लिए किसान महंगी कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद कई क्षेत्रों में कीटों पर अपेक्षित नियंत्रण नहीं होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। इससे किसानों की मेहनत, लागत और संभावित उपज पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
धान की खेती जिले के हजारों किसानों की आजीविका का प्रमुख आधार है। किसान महीनों तक खेतों में मेहनत करते हैं, खाद, बीज, सिंचाई और दवाइयों पर अपनी जमा पूंजी खर्च करते हैं। ऐसे समय में, जब फसल पकने की ओर बढ़ती है, कीटों का प्रकोप किसानों के लिए दोहरी मार साबित हो सकता है। एक ओर फसल बचाने की चिंता है, तो दूसरी ओर महंगी दवाइयों पर बढ़ता खर्च आर्थिक बोझ को और बढ़ा रहा है।
महंगी दवाइयों का छिड़काव, 
फिर भी  नहीं मिल रही राहत
किसानों की परेशानी यह है कि कीट नियंत्रण के लिए बार-बार दवाइयों का उपयोग करने के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या किसानों को सही दवा, उचित मात्रा और छिड़काव की वैज्ञानिक विधि की जानकारी मिल रही है? कहीं गलत दवा, अनुचित मात्रा, दवा के प्रति कीटों में प्रतिरोध या छिड़काव के गलत तरीके के कारण समस्या तो नहीं बढ़ रही?
हालांकि, इन कारणों की पुष्टि कृषि विशेषज्ञों की जांच के बाद ही हो सकती है। लेकिन किसानों की शिकायतों को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। कृषि विभाग को प्रभावित खेतों का निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और किसानों को तत्काल तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराना चाहिए।
भूरा माहो का प्रकोप फसल को पहुंचा सकता है भारी नुकसान
भूरा माहो धान के पौधों के निचले हिस्से में रहकर उनका रस चूसता है। अधिक प्रकोप होने पर पौधों के हिस्से पीले पड़ने लगते हैं और प्रभावित स्थान सूखकर भूरे रंग के दिखाई दे सकते हैं। गंभीर स्थिति में खेत के हिस्से सूखने लगते हैं, जिसे आम तौर पर ‘हॉपर बर्न’ कहा जाता है। इससे धान की पैदावार और गुणवत्ता प्रभावित होने का खतरा रहता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बिना पहचान किए लगातार कीटनाशकों का छिड़काव करने से लाभ के बजाय नुकसान भी हो सकता है। कुछ परिस्थितियों में अनावश्यक छिड़काव से प्राकृतिक मित्र कीट नष्ट होते हैं और माहो की समस्या बढ़ सकती है। इसलिए कीट की सही पहचान, खेत की स्थिति का आकलन और कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही नियंत्रण उपाय अपनाना जरूरी है।
बलौदा क्षेत्र के गांवों में भी प्रकोप की शिकायत
प्रकाशित समाचार में राजस्व सर्किल बलौदा के अंतर्गत बलौदा, भिलाई और सराईडीह सहित कोरबी क्षेत्र के गांवों में भूरा माहो के प्रकोप का उल्लेख किया गया है। इन क्षेत्रों में वास्तविक नुकसान कितना है, कितने किसान प्रभावित हैं और किन खेतों में तत्काल उपचार की आवश्यकता है, इसकी जानकारी कृषि विभाग के सर्वेक्षण से सामने आनी चाहिए।
यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए प्रशासन को केवल कार्यालयीन रिपोर्ट तक सीमित रहने के बजाय खेतों तक पहुंचकर वास्तविक स्थिति का जायजा लेना चाहिए।
कृषि विभाग की जिम्मेदारी—सलाह ही नहीं, समाधान भी
किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि जब महंगी दवाइयों के इस्तेमाल के बाद भी राहत नहीं मिल रही, तो उन्हें सही समाधान कौन देगा? कृषि विभाग, कृषि विस्तार अधिकारी और संबंधित मैदानी अमले की जिम्मेदारी है कि वे प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचकर खेतों का निरीक्षण करें, कीट की सही पहचान करें और किसानों को वैज्ञानिक तरीके से नियंत्रण के उपाय बताएं।
प्रशासन को चाहिए कि वह प्रभावित गांवों में विशेष कृषि दल भेजे, किसानों को उचित कीटनाशक के चयन और सुरक्षित छिड़काव की जानकारी दे तथा संदिग्ध या अमानक दवाइयों की शिकायत मिलने पर नियमानुसार जांच कराए। यदि फसल नुकसान की पुष्टि होती है, तो संबंधित नियमों के तहत सर्वेक्षण और पात्र किसानों को उपलब्ध सहायता की प्रक्रिया भी स्पष्ट की जानी चाहिए।
किसानों की मांग—खेतों में पहुंचे अधिकारी, मिले वैज्ञानिक सलाह
किसानों को केवल दवाइयां खरीदने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह भी बताया जाना चाहिए कि खेत में कीट का प्रकोप किस स्तर पर है, कौन-सा उपाय उपयुक्त है और छिड़काव के दौरान किन सावधानियों का पालन करना चाहिए। कृषि विभाग को प्रभावित खेतों का निरीक्षण कर सलाह देनी चाहिए, ताकि किसान अनावश्यक खर्च से बच सकें और फसल को समय रहते सुरक्षित कर सकें।
जवाबदेही तय हो, किसानों की मेहनत बर्बाद न होने पाए
धान की फसल पर भूरा माहो का बढ़ता प्रकोप केवल कृषि संबंधी समस्या नहीं, बल्कि किसानों की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है। यदि किसान अपनी मेहनत से तैयार फसल को बचाने के लिए लगातार खर्च कर रहे हैं और फिर भी उन्हें राहत नहीं मिल रही, तो संबंधित विभाग को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए।
अब जरूरत है कि जिला प्रशासन और कृषि विभाग इस मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण कराएं, वास्तविक नुकसान का आकलन करें और किसानों को प्रभावी समाधान उपलब्ध कराएं। किसानों की मेहनत और उनकी लागत को बचाना शासन-प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। समय रहते ठोस कदम उठाए गए, तभी धान की फसल को बचाने और किसानों को संभावित आर्थिक नुकसान से राहत दिलाने की उम्मीद की जा सकती है।

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