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“छत्तीसगढ़ की मिट्टी में विराजे राम: रामनामी समाज की अनूठी भक्ति और जीवन दर्शन”

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संवाददाता – लक्ष्मी नारायण लहरे

रामनवमी पर विशेष/ आलेख
राम नाम की अलख:
देह को देवालय बनाने वाला छत्तीसगढ़ का रामनामी समाज …

“राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहिरहुँ जौं चाहसि उजिआर।।”
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस की यह चौपाई जीवन का साक्षात् सत्य है। वे कहते हैं कि यदि आप अपने भीतर और बाहर दोनों ओर प्रकाश चाहते हैं, तो मुख रूपी द्वार की जीभ रूपी दहलीज पर ‘राम-नाम’ रूपी मणि-दीपक को रख लीजिए। संसार में राम की महिमा अनंत है, लेकिन इस महिमा को जीने का जो अद्भुत ढंग छत्तीसगढ़ की माटी ने दुनिया को दिया है, वह अप्रतिम है।
‘दक्षिण कोसल’ के रूप में प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ जो प्रभु श्री राम की माता कौशल्या की जन्मभूमि है यहाँ राम को ‘भगवान’ से पहले ‘भांजा’ मानकर सम्मान दिया जाता है। यहाँ की लोक परंपराओं में राम का चरित्र एक ऐसे नायक का है, जो महलों को त्यागकर वनवासियों, निषादों और शबरी जैसी माताओं के दुखों को हरने निकला है।
इस पवित्र छत्तीसगढ़ की माटी में राम भक्ति की एक ऐसी अनूठी और विरल परंपरा विद्यमान है, जिसे दुनिया ‘रामनामी समाज’ के नाम से जानती है।
यहाँ एक ऐसा समाज बसता है जिसने राम-नाम के उस दीपक को केवल दहलीज पर नहीं, बल्कि अपने रोम-रोम में प्रज्वलित कर लिया है—यह है रामनामी समाज।

राम महिमा: मर्यादा से आत्मीयता तक
राम केवल एक नाम नहीं, एक ‘चेतना’ हैं। वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, जो राजा होकर भी वनवासी बने ताकि धर्म की स्थापना कर सकें। राम की महिमा उनकी शक्ति में नहीं, बल्कि उनकी करुणा में है। वे वह सेतु हैं जो समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को परमात्मा से जोड़ते हैं। जब राम शबरी के जूठे बेर खाते हैं,तो वे दुनिया को बताते हैं कि ‘जाति-पाति’ झूठी है और ‘भाव’ ही सत्य है। इसी करुणा और समावेशी विचार ने छत्तीसगढ़ के रामनामी संप्रदाय की नींव रखी।

रामनामी समाज: एक मूक और पवित्र क्रांति से जन्मा यह समाज
छत्तीसगढ़ अंचल के —जांजगीर-चांपा, बलौदा बाजार-भाटापारा और रायगढ़ के अंचल में रहने वाला यह समाज भक्ति के इतिहास का सबसे अनोखा अध्याय है। लगभग 150 साल पहले, जब समाज में छुआछूत और ऊंच-नीच का बोलबाला था और तब कुछ वर्गों को मंदिरों में प्रवेश की अनुमति नहीं थी तब परशुराम भारद्वाज नाम के एक युवक ने एक ऐसी क्रांति की शुरुआत की, जिसने अस्त्र-शस्त्र नहीं, बल्कि ‘अध्यात्म’ को अपना हथियार बनाया।
उन्होंने संदेश दिया कि— “यदि तुम हमें मंदिर जाने से रोकते हो, तो हम अपनी देह को ही मंदिर बना लेंगे। यदि तुम हमें मूर्ति छूने नहीं देते, तो हम राम को अपने रक्त और त्वचा में उतार लेंगे।” यहीं से शरीर पर ‘राम-राम’ का गुदना (टैटू) गुदवाने की परंपरा शुरू हुई।

विलक्षण परंपरा और पहचान
रामनामी समाज की पहचान उनके बाहरी स्वरूप से कहीं अधिक उनकी आंतरिक शुद्धता में है। इनकी परंपरा में मान्यता का पालन बहुत श्रद्धा और भक्ति से किया जाता है
नख-शिख राम-नाम: रामनामी समाज के लोग (विशेषकर बुजुर्ग) अपने पूरे शरीर पर ‘राम-राम’ लिखवाते हैं। चेहरे से लेकर पैरों के नाखूनों तक, सुई की नोक से स्याही के जरिए राम का नाम अंकित किया जाता है। इसे ‘अंकन’ कहा जाता है।
श्वेत वस्त्र और रामनामी ओढ़नी इनके पारंपरिक वस्त्र हैं ये लोग हमेशा सफेद वस्त्र पहनते हैं जिन पर लाल या काले रंग से ‘राम-राम’ छपा होता है। यह सादगी और सात्विकता का प्रतीक है।
मोरपंखी मुकुट: विशेष आयोजनों में पुरुष मोरपंख से बना एक सुंदर मुकुट धारण करते हैं, जो उनके आराध्य के प्रति सम्मान का सूचक है।

पूजा पद्धति: निराकार की उपासना
रामनामी समाज की पूजा पद्धति आडंबरहीन और सीधी है। वे न तो मूर्ति पूजा करते हैं और न ही किसी मंदिर में जाते हैं। उनके लिए ‘रामचरितमानस’ ही सर्वोपरि ग्रंथ है।
निराकार राम की उपासना करते हैं। उनके लिए राम ‘नाम’ ही ब्रह्म है।

उनकी पूजा में केवल राम-नाम का संकीर्तन, मानस का पाठ और आपस में ‘राम-राम’ का अभिवादन शामिल है।
इस समाज में नशापान और मांसाहार पूरी तरह वर्जित है। वे सत्य, अहिंसा और प्रेम के मार्ग पर चलते हैं।
बड़े भजन’ का मेला:
भक्ति का महाकुंभ प्रतिवर्ष पौष मास (जनवरी-फरवरी) में महानदी के किनारे इस समाज का एक विशाल समागम होता है, जिसे ‘बड़े भजन का मेला’ कहा जाता है।
मेला स्थल पर ‘जैतखंभ’ की तरह राम-नाम का एक स्तंभ स्थापित किया जाता है।
तीन दिनों तक यहाँ बिना रुके राम-नाम का कीर्तन और मानस गान चलता है। यहाँ का वातावरण इतना रूहानी होता है कि हवाओं में भी ‘राम-राम’ की प्रतिध्वनि सुनाई देती है।

लोकगीतों में रचे-बसे राम
रामनामी समाज के लोकगीत छत्तीसगढ़ी संस्कृति की धरोहर हैं। जब ये लोग हाथ में मंजीरे लेकर और पैरों में घुँघरू बाँधकर नाचते हुए गाते हैं, तो वह दृश्य अलौकिक होता है।
अनेक आध्यात्मिक

” ओढ़े राम, बिछाए राम, तन मा राम विराजे रे,
राम नाम के ओढ़नी ओढ़े, कतका नीक लागे रे…”

इन गीतों में राम के प्रति समर्पण ऐसा भाव है कि भक्त खुद को राम में विलीन महसूस करता है। यहाँ राम ‘राजा’ नहीं, बल्कि ‘सखा’ और ‘आधार’ हैं।

प्रधानमंत्री मोदी और रामनामी समाज… राष्ट्रीय पहचान
दशकों तक यह समाज गुमनामी में अपनी साधना करता रहा, लेकिन हाल के वर्षों में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने इस समाज की भक्ति और उनके संघर्ष को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पटल पर विशेष सम्मान दिया है।और विभिन्न मंचों पर रामनामी समाज के ‘राम के प्रति अटूट समर्पण’ की सराहना की।
अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के दौरान भी छत्तीसगढ़ के इस समाज को विशेष गौरव प्रदान किया गया।
प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि कैसे यह समाज ‘सामाजिक समरसता’ का सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्होंने बताया कि कैसे अभावों और अपमान के बीच भी इन्होंने नफरत को नहीं, बल्कि ‘राम नाम’ के प्रेम को चुना। आज भी समाज के परिदृश्य में थोड़े बदलाव के साथ यह परम्परा जीवित है।
आज की नई पीढ़ी के रामनामी युवा शरीर पर पूरे गुदने तो नहीं करवाते पर वे अपने सीने या हाथ पर छोटा सा ‘राम’ नाम गुदवाकर अपनी परंपरा को जीवित रख रहे हैं। यह समाज दुनिया को सिखाता है कि भक्ति केवल प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह वह आंतरिक शक्ति है जो आपको विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग रखती है।
रामनामी समाज का अस्तित्व इस बात का प्रमाण है कि राम किसी एक वर्ग या जाति के नहीं हैं; राम तो उसके हैं जिसके हृदय में करुणा है। छत्तीसगढ़ की यह महान परंपरा हमें सिखाती है कि शरीर तो नश्वर है, मिट्टी में मिल जाएगा, लेकिन उस पर अंकित ‘राम-नाम’ उस आत्मा की गवाही देगा जो साक्षात् ब्रह्म में विलीन हो गई।
जब हम इस समाज को देखते हैं, तो अनायास ही कबीर की याद आती है— ” मन मथुरा, दिल द्वारका, काया काशी जान।” रामनामी समाज ने वास्तव में अपनी ‘काया’ को ही काशी और अयोध्या बना लिया है। और तुलसीदास जी के कथन को सत्य कर दिया।
*नहिं कलि करम न भगति बिबेकू ।
राम नाम अवलंबन एकू॥*

लेखिका सीमा पाण्डेय ‘ सीमा, रायपुर( छत्तीसगढ़ )

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