हेमचंद्र सोनी/नोएडा/हरिद्वार/पानीपत/फरीदाबाद। अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कामरेड हरिद्वार सिंह ने मई दिवस के अवसर पर मजदूर आंदोलन और आज की परिस्थितियों पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि 1886 के शिकागो के मजदूरों की शहादत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उस समय थी, क्योंकि मजदूरों का शोषण आज भी विभिन्न रूपों में जारी है।
कामरेड हरिद्वार सिंह ने कहा कि 140 वर्ष पहले अमेरिका के शिकागो में मजदूरों ने “8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे मनोरंजन” की मांग को लेकर ऐतिहासिक आंदोलन किया था। उस समय पुलिस गोलीबारी में कई मजदूरों की मौत हुई और कई को फांसी दी गई थी। इसके बाद 1889 में दुनिया के कई देशों ने 1 मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया।
उन्होंने बताया कि भारत में सबसे पहले एटक नेता सिंगार वेलू चेट्टियार ने मद्रास में मजदूर दिवस मनाते हुए यह नारा दिया था और बाद में 1920 में एटक का गठन हुआ, जिसने इसे एक संगठित आंदोलन का रूप दिया।
आज की स्थिति पर गंभीर सवाल
कामरेड हरिद्वार सिंह ने कहा कि आज भी नोएडा, मानेसर, पानीपत और फरीदाबाद जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में मजदूरों को समान अधिकार नहीं मिल रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि नए लेबर कोड के लागू होने के बाद मजदूरों की स्थिति और कमजोर हुई है तथा 12 घंटे काम को कानूनी मान्यता देना चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा कि ट्रेड यूनियन बनाने और आंदोलन करने के अधिकारों को कमजोर किया जा रहा है, जो संविधान में मिले अधिकारों का उल्लंघन है।
उद्योगों में शोषण के आरोप
उन्होंने मध्य प्रदेश के रीवा जिले स्थित अल्ट्राटेक सीमेंट कारखाने का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां मजदूरों से 18-18 घंटे काम कराया जाता है, ओवरटाइम का भुगतान नहीं दिया जाता और साप्ताहिक अवकाश भी नहीं मिलता। विरोध करने पर सैकड़ों मजदूरों को नौकरी से निकाल दिया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि कोयला और अन्य क्षेत्रों में आउटसोर्सिंग के कारण मजदूरों को न तो उचित वेतन मिलता है और न ही सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।
मजदूर आंदोलन का संकल्प
कामरेड हरिद्वार सिंह ने कहा कि देश में निजीकरण और ठेका प्रथा के बढ़ते प्रभाव ने मजदूरों की स्थिति को और कठिन बना दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सार्वजनिक क्षेत्र को कमजोर कर निजी हाथों में सौंपा जा रहा है।
उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में मजदूरों और किसानों के संयुक्त आंदोलन ने सरकार को कई बार झुकने पर मजबूर किया है, जो मजदूर एकता की ताकत को दर्शाता है।








