Home मेरी रचना “रस्म-अदायगी” – राजकुमार सोनी, रायपुर (छत्तीसगढ़)

“रस्म-अदायगी” – राजकुमार सोनी, रायपुर (छत्तीसगढ़)

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क्या ज़माना आ गया है,
हर बात में रस्म-अदायगी नज़र आती है।
अपनापन कम होता जाता है,
औपचारिकता ज़्यादा दिखाई देती है।
शादी-ब्याह कभी बड़े उत्साह से होते थे,
अब कुछ दिनों में ही निपटा दिए जाते हैं।
मिलन की खुशियाँ कम होती जाती हैं,
कार्यक्रम बस निभाए जाते हैं।
मेहमान कभी महीनों तक ठहरा करते थे,
अब बुलाने पर भी अक्सर नहीं आते हैं।
कभी कोई आ भी जाए घर-द्वार,
तो औपचारिकता निभाकर चले जाते हैं।
अपनों का हाल तो पूछा जाता है,
पर उसमें भी रस्म-अदायगी निभाई जाती है।
दिल की बात कम सुनी जाती है,
बस ख़ैर-ख़बर ली जाती है।
अस्पताल में भी मिलने जाते हैं,
पर रस्म-अदायगी निभाकर लौट आते हैं।
दर्द बाँटने का समय किसी के पास नहीं,
बस हाज़िरी लगाकर चले आते हैं।
किसी की जब मदद की जाती है,
उसका भी अक्सर बखान किया जाता है।
नेकी जो कभी चुपचाप की जाती थी,
अब एहसान बनाकर जताई जाती है।
बुढ़ापे में सेवा करने वाले कम मिलते हैं,
कर भी दे कोई, तो विवाद हो जाता है।
जिन हाथों ने जीवन भर सँवारा था,
उन्हीं का सम्मान कम होता जाता है।
पहले चिट्ठियों में हाल-ए-दिल लिखा जाता था,
अब संदेशों में बस हाल पूछा जाता है।
पहले मिलने की खुशी आँखों में दिखती थी,
अब तस्वीरों में मुस्कान सजाई जाती है।
पहले दुःख-सुख में लोग साथ खड़े रहते थे,
अब सलाह तो मिलती है, सहारा कम मिलता है।
रिश्ते आज भी बने हुए हैं,
पर दिलों का फ़ासला बढ़ता जाता है।
समय बदलना प्रकृति की रीत है,
पर प्रेम और अपनापन ही सच्ची प्रीत है।
रिश्तों में यदि स्नेह और विश्वास बना रहे,
तो जीवन का सौंदर्य बना रहता है।
क्या ज़माना आ गया है,
हर बात में रस्म-अदायगी नज़र आती है।
अपनापन कम होता जाता है,
औपचारिकता ज़्यादा दिखाई देती है।
✍️: राजकुमार सोनी, रायपुर (छत्तीसगढ़)

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