मैं कुछ न चाहूँ,
गर कुछ चाहूँ भी तो बस,
प्रियजनों के दिल में उतर जाऊँ,
और प्रभु में मन लगाऊँ।
कोई ख़्वाहिश न पालूँ,
न ऊँचे सपने सजाऊँ,
बस इतना भय रहता है,
कहीं अप्रिय न बन जाऊँ।
फिर जीवन मिले न मिले,
इस जीवन में कुछ कर जाऊँ,
गर हित न कर पाऊँ,
तो कम से कम प्रीत कर जाऊँ।
गर कुछ न कर पाऊँ,
तो किसी का भला कर जाऊँ,
किसी के चेहरे की मुस्कान बनूँ,
किसी के काम आ जाऊँ।
यही कामना लेकर जीवन बिताऊँ,
प्रियजनों के दिल में उतर जाऊँ,
और प्रभु में मन लगाऊँ।
✍️: राजकुमार सोनी, रायपुर (छत्तीसगढ़)








