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बदलता परिवार और वृद्धजनों की बढ़ती चुनौतियाँ

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हर व्यक्ति किसी न किसी परिवार और समाज में जन्म लेता है। जन्म के बाद उसे संस्कार, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों का ज्ञान मिलता है। बचपन में वह वही सीखता है जो अपने आसपास देखता और सुनता है। समय के साथ शिक्षा, अनुभव और परिवेश के प्रभाव से उसके विचारों और जीवन-दृष्टि में परिवर्तन आता है।
प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उसका परिवार उन्नति करे तथा उसका जीवन सुखमय और आनंदमय बने। इसी उद्देश्य से वह युवावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक निरंतर परिश्रम करता है। चाहे वह गरीब हो, मध्यमवर्गीय हो या संपन्न, अधिकांश लोग अपने परिवार के लिए समर्पित रहते हैं। वे अपने बच्चों और परिवारजनों की आवश्यकताओं तथा इच्छाओं को पूरा करने का प्रयास करते हैं और यह आशा भी रखते हैं कि बुढ़ापे में उन्हें सम्मान, सुरक्षा और सहारा प्राप्त होगा।
अतीत में संयुक्त परिवारों की परंपरा अधिक प्रचलित थी। परिवार के बुज़ुर्गों की सेवा-सुश्रुषा को नैतिक कर्तव्य माना जाता था। उनकी आवश्यकताओं, स्वास्थ्य और इच्छाओं का ध्यान रखा जाता था तथा परिवार में यह भी तय किया जाता था कि वृद्ध माता-पिता की देखभाल कौन करेगा।
वर्तमान समय में परिवार और समाज का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। शिक्षा, रोजगार, शहरीकरण और वैश्वीकरण के कारण संयुक्त परिवारों का स्थान एकल परिवारों ने ले लिया है। अनेक बच्चे रोजगार या शिक्षा के कारण अपने माता-पिता से दूर रहते हैं, चाहे देश में हों या विदेश में। ऐसी परिस्थितियों में वृद्ध माता-पिता के लिए अपने बच्चों के साथ रहना कठिन हो जाता है। समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब बढ़ती आयु के साथ उनका स्वास्थ्य कमजोर होने लगता है।
भारत में वृद्धजनों की संख्या लगातार बढ़ रही है और वर्तमान में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोग कुल जनसंख्या का लगभग 10–12 प्रतिशत हैं। अधिकांश बुज़ुर्ग आज भी अपने परिवारों के साथ रहते हैं, परंतु वृद्धाश्रमों और वरिष्ठ नागरिक आवासों की आवश्यकता धीरे-धीरे बढ़ रही है। इसके पीछे संयुक्त परिवारों का विघटन, पारिवारिक मतभेद, जीवनशैली में बदलाव, रोजगार संबंधी दूरियाँ तथा अन्य सामाजिक कारण प्रमुख हैं।
चिंता की बात यह है कि अब केवल आर्थिक रूप से कमजोर ही नहीं, बल्कि शिक्षित और आर्थिक रूप से सक्षम लोग भी वृद्धाश्रमों की ओर रुख कर रहे हैं। कुछ संस्थाएँ सेवा-भाव से कार्य कर रही हैं, जबकि कुछ स्थानों पर यह क्षेत्र व्यवसाय का रूप भी लेता जा रहा है। इसलिए पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और प्रभावी निगरानी की आवश्यकता है, ताकि किसी प्रकार का शोषण न हो।
भारत सरकार ने वरिष्ठ नागरिकों के संरक्षण हेतु Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 लागू किया है। इस अधिनियम की धारा 19 के अनुसार राज्य सरकारें वृद्धाश्रम स्थापित कर सकती हैं तथा उनके संचालन, प्रबंधन, चिकित्सा सुविधा और अन्य सेवाओं के लिए नियम बना सकती हैं। अधिनियम में प्रत्येक जिले में आवश्यकता अनुसार वृद्धाश्रम स्थापित करने का प्रावधान भी किया गया है।
यद्यपि भारत में वृद्धजनों के लिए अनेक योजनाएँ, पेंशन व्यवस्थाएँ और कल्याणकारी कार्यक्रम संचालित हैं, फिर भी विकसित देशों की तुलना में व्यापक और संस्थागत स्तर पर अभी और सुधार की आवश्यकता है। स्वास्थ्य सेवा, होम-केयर, सामाजिक सुरक्षा और वरिष्ठ नागरिकों के लिए अनुकूल आवासीय सुविधाओं का विस्तार समय की आवश्यकता है।
साथ ही यह भी स्मरण रखना चाहिए कि वृद्धजनों की देखभाल केवल सरकार या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है। माता-पिता और बुज़ुर्ग परिजनों के प्रति सम्मान, संवेदनशीलता और सहयोग प्रत्येक परिवार का नैतिक दायित्व है। वृद्धजनों का अपने बच्चों से स्नेह, सम्मान और सहयोग की अपेक्षा रखना स्वाभाविक है। यदि परिवार, समाज और सरकार मिलकर कार्य करें, तो वृद्धावस्था को अधिक सुरक्षित, सम्मानजनक और सुखद बनाया जा सकता है।
✍️: राजकुमार सोनी, रायपुर (छत्तीसगढ़)

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