अन्ततः इंसान हार जाता है,
दुनिया से लड़ लेता है, पर अपनों से हार जाता है।
हर किसी का सामना कर लेता है,
पर अपनों के आगे समर्पण कर जाता है।
हर किसी को समझा लेता है,
पर अपनों को समझा नहीं पाता है।
तर्क और प्रमाण बहुत होते हैं उसके पास,
फिर भी रिश्तों के आगे मौन हो जाता है।
दूसरों की भूलें आसानी से गिना देता है,
पर अपनों की ख़ातिर सब कुछ भुला जाता है।
जीत सकता है वह अनेक संघर्षों को,
पर प्रेम के बंधन में स्वयं हार जाता है।
अपनों की एक मुस्कान के लिए,
अपने कितने ही दुःख छिपा जाता है।
उनकी ख़ुशियों की ख़ातिर अक्सर,
अपनी इच्छाओं का त्याग कर जाता है।
कभी शब्द कम पड़ जाते हैं,
कभी भाव व्यक्त नहीं हो पाते हैं।
जो सबसे अधिक अपने होते हैं,
वही कभी-कभी सबसे कम समझ पाते हैं।
रिश्तों का गणित बड़ा अनोखा होता है,
यहाँ हर हिसाब अधूरा रह जाता है।
जहाँ प्रेम सच्चा और गहरा होता है,
वहाँ इंसान जीतकर भी हार जाता है।
दूसरों की बुराइयाँ देख लेता है,
पर अपनों की कमियों पर पर्दा डाल जाता है।
अपनों की ख़ुशी में ख़ुद को भूल जाता है,
उनके दुःख में हर दर्द अपना मान जाता है।
दुनिया के सामने कितना भी मज़बूत दिखे,
अपनों के आगे अक्सर कमज़ोर पड़ जाता है।
यही तो रिश्तों की सच्चाई है,
यही प्रेम का अनोखा नाता है।
अन्ततः इंसान हार ही जाता है,
क्योंकि वह अपनों से हार जाता है।
✍️: राजकुमार सोनी, रायपुर (छत्तीसगढ़)








