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रायपुर की नालियों में बहता विकास: बारिश कम कचरा ज्यादा, प्रशासनिक तंत्र और नागरिक जिम्मेदारी दोनों हुए फेल

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रघुराज/रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्मार्ट सिटी की दौड़ में शामिल जरूर है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। मानसून की शुरुआत होते ही शहर की तस्वीरें बदलने लगी हैं और यह बदलाव किसी विकास की नहीं, बल्कि एक गंभीर नागरिक और प्रशासनिक विफलता की कहानी कहता है। शहर के चौक-चौराहों, मोहल्लों और मुख्य मार्गों की नालियों को देखकर अब यह अंतर करना मुश्किल हो गया है कि यह पानी निकासी का जरिया हैं या फिर कचरा फेंकने का कोई खुला डंपिंग यार्ड।

सड़कें बनीं तालाब, नाली में प्लास्टिक का साम्राज्य
रायपुर में इन दिनों एक अजीब सा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। शहर में जितनी बारिश नहीं हो रही है, उससे कहीं ज्यादा सड़कों पर कचरा बरसता हुआ दिखाई दे रहा है। आज रायपुर की नाली, नाले और तालाबों के किनारों की स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि पहली नजर में कोई भी इन्हें कूड़ाघर समझने की भूल कर बैठ। जिन रास्तों और चैनलों से होकर बारिश के पानी को सुरक्षित तरीके से शहर से बाहर निकल जाना चाहिए था, वहां आज पॉलीथीन, प्लास्टिक की बोतलें, थर्माकोल और घरेलू कचरे ने स्थायी कब्जा जमा लिया है।

नतीजा यह है कि हल्की सी बारिश होते ही शहर के कई इलाके जलमग्न हो जाते हैं। पानी को बहने के लिए जगह नहीं मिलती, इसलिए वह सड़कों पर फैल जाता है, जिससे राहगीरों और वाहन चालकों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

कागजी प्रतिबंध और ट्रकों में आती पॉलीथीन की हकीकत
प्रशासनिक दावों की पोल खोलने के लिए शहर का कोई भी बाजार काफी है। कागजों में सिंगल यूज प्लास्टिक और पॉलीथीन पूरी तरह से प्रतिबंधित है। समय-समय पर नगर निगम की टीमें दिखावे के लिए कुछ दुकानों पर चालानी कार्रवाई भी करती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। हर घंटे, हर दिन और हर महीने ट्रकों के हिसाब से प्लास्टिक और पॉलीथीन शहर के भीतर आ रही है और अंततः नालियों तथा तालाबों में जाकर जमा हो रही है।

ऐसा लगता है कि प्लास्टिक पर प्रतिबंध केवल सरकारी फाइलों को चमकाने के लिए है, बाजार के लिए नहीं। सब्जी बाजारों में, ठेलों पर और किराना दुकानों में खुलेआम प्लास्टिक के कैरीबैग बांटे जा रहे हैं। शहर के भीतर और बाहरी इलाकों में बेखौफ होकर व्यापारी घूम-घूमकर प्लास्टिक बेच रहे हैं। सवाल यह उठता है कि जब प्रतिबंध लागू है, तो फैक्ट्रियों में रोज ट्रकों के हिसाब से सिंगल यूज पॉलीथिन कैसे बन रही है और कैसे उसकी खुलेआम सप्लाई हो रही है? क्या प्रशासन के पास इन बड़ी फैक्ट्रियों और सप्लायर्स पर हाथ डालने की ताकत या इच्छाशक्ति नहीं है?

सफाई व्यवस्था का संकट और कर्मचारियों की लापरवाही
शहर को इस बदहाली में धकेलने में केवल पॉलीथीन का व्यापार ही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि नगर निगम की सफाई व्यवस्था भी उतनी ही दोषी है। नाली सफाई के नाम पर सिर्फ औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं। नियमित रूप से नालियों के भीतर जमी गाद और प्लास्टिक को बाहर निकाला ही नहीं जाता। हद तो तब हो जाती है जब सड़कों पर झाड़ू लगाने वाले सफाई कर्मचारी ही सड़क का सारा कचरा उठाकर चुपचाप नाली में धकेल देते हैं। जब जिम्मेदारी संभालने वाले ही इस तरह की लापरवाही करेंगे, तो व्यवस्था का सुधरना नामुमकिन हो जाता है।

हमारी सोच डूब गई है, शहर तो सिर्फ बहाना है
हर साल मानसून आते ही रायपुर में एक घिसा-पिटा संवाद और नाटक शुरू हो जाता है। जैसे ही सड़कें लबालब होती हैं, हर तरफ से आवाजें आने लगती हैं कि अरे, शहर डूब गया। लेकिन सच तो यह है कि शहर नहीं डूबा है, बल्कि नागरिकों और प्रशासन की सोच डूब चुकी है।

जिस नाली को साफ रखने की जिम्मेदारी सामूहिक थी, उसे हमने मिलकर एक बड़ा कूड़ेदान बना दिया। जिस नाले को जल निकासी का मुख्य स्रोत होना चाहिए था, उसे प्लास्टिक का गोदाम बना दिया गया और जिन तालाबों को शहर की खूबसूरती और जलस्तर का रक्षक होना चाहिए था, उन्हें कचरा घर में तब्दील कर दिया गया। जब जलभराव के सारे प्राकृतिक और कृत्रिम रास्ते बंद हो जाएंगे, तो पानी भला कहां जाएगा? पानी सड़क पर नहीं बहेगा, तो क्या हेलीकॉप्टर से उड़कर आसमान में जाएगा?

महान भारतीय परंपरा: दोषारोपण का खेल
बाढ़ और जलभराव के बाद शहर में एक और महान परंपरा की शुरुआत होती है, जिसे हम दोषारोपण का खेल कह सकते हैं। हर कोई अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए दूसरों पर उंगली उठाने लगता है। कोई नगर निगम के अधिकारियों को कोसता है, कोई राज्य सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराता है, कोई मौसम विभाग के पूर्वानुमान पर सवाल उठाता है, तो कोई सीधे बादलों और प्रकृति को ही दोषी मान लेता है।
इस पूरे खेल में सबसे मजेदार और दुखद पहलू यह है कि जो व्यक्ति सुबह-सुबह अपने घर का कचरा चुपचाप नाली में फेंककर आया था, वही शाम को सड़क पर पानी भरने के बाद सबसे आगे खड़ा होकर प्रशासन को नागरिक अधिकारों और प्रबंधन का ज्ञान देता हुआ नजर आता है।

आदतें बदलनी होंगी वरना हर साल गाड़ियां नाव बनेंगी
कड़वी सच्चाई यही है कि रायपुर की नालियां बारिश के पानी की अधिकता से नहीं, बल्कि हमारी खराब आदतों और लापरवाही से जाम होती हैं। जब तक बुनियादी ढांचा कचरे से अटा रहेगा, तब तक सड़कें नाले बनती रहेंगी और सड़कों पर चलने वाली महंगी गाड़ियां नाव की तरह तैरती नजर आएंगी। इसके बाद सोशल मीडिया पर जलभराव के वीडियो डालकर व्यंग्य कसना कि देखिए विकास बह रहा है, बेहद आसान है, लेकिन अपनी गलती को स्वीकार करना उतना ही कठिन।

जब तक पॉलीथीन बनाने वाली फैक्ट्रियों, इसे थोक में बेचने वाले व्यापारियों, धड़ल्ले से इस्तेमाल करने वाले दुकानदारों और इसे सड़कों-नालियों में फेंकने वाले आम नागरिकों पर सख्त से सख्त दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक हर बरसात में यही नौटंकी चलती रहेगी। पहले खुद नाली में कचरा डालना और फिर सड़क पर पानी जमा होने पर व्यवस्था को गाली देना, शायद आज के शहरी समाज का नया संस्कार बन चुका है।

प्रकृति का एक सीधा सा नियम है कि पानी कभी भी अपना रास्ता नहीं भूलता, वह अपना रास्ता खुद बना लेता है। हम इंसान ही हैं जो उसके प्राकृतिक रास्तों को कचरे से बंद कर देते हैं और जब वह हमारे घरों में घुसता है, तो हम हैरान होते हैं। रायपुर को अगर वाकई स्मार्ट और रहने लायक शहर बनाना है, तो सरकारी फाइलों के प्रतिबंध को धरातल पर लाना होगा और नागरिकों को भी जिम्मेदारी का परिचय देना होगा, वरना हर साल विकास इसी तरह नालियों के कचरे के ऊपर तैरता हुआ दिखाई देगा।

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